<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4148684920008435142</id><updated>2012-01-14T16:40:41.192+05:30</updated><category term='तौरेत'/><category term='उपनिषद'/><category term='bhodh metrey'/><category term='मुहम्‍मद'/><category term='वेद'/><category term='कुरआन'/><category term='इन्‍जील'/><category term='पुराण'/><category term='kalki avtar'/><category term='antim rishi'/><category term='awtar'/><category term='book narasansh aur antim rishi'/><category term='कुरान'/><category term='बौद्ध'/><category term='hindu'/><category term='सन्‍देष्‍टा'/><category term='इस्‍लाम'/><category term='इस्लामीकरण'/><category term='antim avtar'/><category term='अन्तिम'/><category term='narashans'/><category term='jain'/><title type='text'>अंतिम अवतार</title><subtitle type='html'>विचार करें कि हज़रत मुहम्‍मद सल्‍ल. ईसाई, बोद्ध् , हिन्‍दू, प्राणनाथी सम्‍प्रदाय, जैन और मूसा (यहूदी) धर्म के भी अवतार हैं? या यह big game against islam है?</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://antimawtar.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4148684920008435142/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://antimawtar.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Mohammed Umar Kairanvi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06899446414856525462</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_6kacm3QiWSA/Sxd7Q7WZMqI/AAAAAAAAAVY/iETHamqjm0M/S220/cyber-maulan-umar-kairanvi-new-dec09-c.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>5</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4148684920008435142.post-1565270073283150370</id><published>2009-10-30T15:35:00.008+05:30</published><updated>2010-10-18T16:08:24.244+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इन्‍जील'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्तिम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपनिषद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वेद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पुराण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बौद्ध'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तौरेत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सन्‍देष्‍टा'/><title type='text'>विषय सूची पुस्‍तकः ''अन्तिम सन्‍देष्‍टा कब, कहाँ और कौन?'antim-sandeshta</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_6kacm3QiWSA/Suq60a1o2_I/AAAAAAAAAUA/MYB8ddlOwlA/s1600-h/antim-sandeshta-sandesak-sandesta-kab-kahan-kaun.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 201px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_6kacm3QiWSA/Suq60a1o2_I/AAAAAAAAAUA/MYB8ddlOwlA/s320/antim-sandeshta-sandesak-sandesta-kab-kahan-kaun.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5398332513077222386" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;''हज़रत मुहम्‍मद सल्‍ल. ''वेद, पुराण, उपनिषद, बौद्ध, तौरेत, इन्‍जील, पारसी, अरब कवि, भारतीय कवि, विशेष रूप से तुलसीदास जी, कबीरदासजी की वाणियों सहित गुरू नानक जी की वाणियाँ तथा इतिहासकारों और पवित्र क़ुरआन की दृष्टि में अंतिम संदेष्‍टा &lt;a href="http://www.scribd.com/doc/39583365/Antim-Sandeshta-Hindi-Book-by-Sarwar-Nadwi"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;Online &lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;now&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;-------------------------------------------------------&lt;br /&gt;पुस्‍तकः ''अन्तिम सन्‍देष्‍टा कहाँ, कब और कौन?''&lt;br /&gt;मुफ्ती मुहम्‍मद सरवर फ़ारूक़ी नदवी&lt;br /&gt;(आचार्य, हिन्‍दू विश्‍व विद्यालय, बनारस)&lt;br /&gt;--------------&lt;br /&gt;Rs. 90/-  (272 Pages)&lt;br /&gt;प्रकाशकः फरीद बुक डिपोट (प्राइवेट) लिमिटिड&lt;br /&gt;2158, एम. पी. स्‍ट्रीट, पटौदी हाउस, दर्यागंज, नई दिल्‍ली-2,&lt;br /&gt;फोनः23247075, 23289786&lt;br /&gt;ईमेलः farid@ndf.vsnl.net.in&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;  विषय-सूची &lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.scribd.com/doc/39583365/Antim-Sandeshta-Hindi-Book-by-Sarwar-Nadwi"&gt;Online now&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सन्‍देश&lt;br /&gt;प्रस्‍तावना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  [[_ खण्‍ड 'क' भाग 1  _]]&lt;br /&gt;अन्तिम सन्‍देष्‍टा की खोज वेदों की दुनिया में&lt;br /&gt;नराशंस शब्‍द का अर्थ&lt;br /&gt;देवताओं की जातियाँ&lt;br /&gt;नराशंस मनुष्‍यों में से होगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शब्‍द नराशंस और मुहम्‍मद (सल्‍ल.)-तुलनात्‍मक दृ‍ष्टि से&lt;br /&gt;मुहम्‍मद (सल्‍ल.) शब्‍द का अर्थ&lt;br /&gt;मुहम्‍मद कब और कहाँ आयेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नराशंस और मुहम्‍मद (सल्‍ल.) का समय&lt;br /&gt;नराशंस के पैदा होने का स्‍थान&lt;br /&gt;नराशंस की विशेषताओं की भविष्‍यवाणियाँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नराशंस और ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.ऋ की विशेषताए तुलनात्‍मक दृष्टि से&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) की प्रशंसा&lt;br /&gt;अज़ान में ह. मुहम्‍द (सल्‍ल.) की प्रशंसा&lt;br /&gt;नमाज़ में ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) की प्रशंसा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने अनुयायियों से ही नहीं बल्कि दूसरे धार्मिक गुरूओं से भी प्रशन्सित&lt;br /&gt;प्रो. श्री राम कृष्‍ण राव जी के अनुसार&lt;br /&gt;एक यहूदी मनावैज्ञानिक जिसकी दृष्टि में ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.)&lt;br /&gt; ह. मुसा(अ.) से भी महान थे&lt;br /&gt;एक ईसाई का मत जो महामान्‍य मुहम्‍मद (सल्‍ल) को&lt;br /&gt;मान्‍य ईसा (अ.) से भी महान मानता है&lt;br /&gt;बौद्ध धर्म के आचार्य श्री माग तोग के अनुसार&lt;br /&gt;डा. डी. रायट के अनुसार&lt;br /&gt;नराशंस सबको प्रिय होगा&lt;br /&gt;नराशंस सवारी के रूप में ऊँटों का प्रयोगा करेगा&lt;br /&gt;नराशंस को परोक्ष का ज्ञान दिया जाएगा&lt;br /&gt;नराशंस अत्‍यधिक सुन्‍दर एवं ज्ञान के प्रसारक होंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप (सल्‍ल.) की सुन्‍दरता&lt;br /&gt;नराशंस लोगों को पापों से निकालेगा&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के आने से पूर्व की दशा&lt;br /&gt;नराशंस का एक सांसरिक नाम 'मामह) होगा&lt;br /&gt;नराशंस को सौ निष्‍क प्रदान किया जाऐंगे&lt;br /&gt;नराशंस को दस हज़ार मालाओं वाला कहा गया है&lt;br /&gt;नराशंस दस हज़ार गौओं से युक्‍त होगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[[_  भाग 2  _]]&lt;br /&gt;पुराणों की भविष्‍यवाणियाँ, कल्कि अवतार और हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल.)&lt;br /&gt;अवतार का अर्थ&lt;br /&gt;प. श्री राम शर्मा जी के अनुसार अवतार का अर्थ&lt;br /&gt;अवतार या सन्‍देष्‍टा की आवश्‍यकता और हमारी आशा&lt;br /&gt;अन्तिम संदेष्‍टा या अवतार के आने से पूर्व संसार की दशा कहा होगी&lt;br /&gt;श्रीमदभागवत महापुराण के अनुसार कल्कि अवतार&lt;br /&gt;अन्तिम या कल्कि अवतार कहाँ आयेगा&lt;br /&gt;शम्‍भल शब्‍द की खोज&lt;br /&gt;शम्‍भल का शाब्दिक अर्थ&lt;br /&gt;कल्कि अवतार के माता-पिता का नाम&lt;br /&gt;कल्कि अवतार की विशेषताएं&lt;br /&gt;कल्कि और ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) तुलनात्‍मक दृष्टि में&lt;br /&gt;अश्‍वरोहण करने वाला होगा&lt;br /&gt;जगदगुरू होगा&lt;br /&gt;असाधुदमद करेगा&lt;br /&gt;देवताओं द्वारा सहायता मिलेगी&lt;br /&gt;अनुपन क्रान्ति से युक्‍त होगा&lt;br /&gt;शरीर से सुगन्‍ध निकलेगी&lt;br /&gt;भविष्‍यपुराण के अनुसार कल्कि अवतार के आने से पूर्व की दशा&lt;br /&gt;वेदों में शब्‍द 'अहमद' व 'मुहम्‍मद' मौजूद हैं&lt;br /&gt;सरांश&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[[_  भाग 3  _]]&lt;br /&gt;उपनिषदों में शब्‍द अल्‍लाह, रसूल व मुहम्‍मद&lt;br /&gt;एक ओर स्‍थान पर अल्‍लाह व रसूल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[[_  भाग 4  _]]&lt;br /&gt;गौतम बुद्धजी की भविष्‍यवाणियाँ&lt;br /&gt;आने वाले बुद्ध की विशेषताएँ&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) और अन्तिम बुद्ध तुलनात्‍मक दृष्टि से&lt;br /&gt;वह जगत को सत्‍य और परोपकार की शिक्षा देगा&lt;br /&gt;अन्तिम ईशदूत जगतनायक होगा&lt;br /&gt;वह जगत को जीवन का ऐसा मार्ग दिखाएगा जो सत्‍य त्था पूर्ण होगा&lt;br /&gt;वह अपने समय पर आएगा&lt;br /&gt;उसका हृदय शुद्ध होगा तथा वह ज्ञान और बुद्धि‍ से सम्‍पन्‍न होगा&lt;br /&gt;महात्‍मा बुद्ध ने बताया कि अन्तिम बुद्ध का नाम मैत्रेय होगा&lt;br /&gt; बुद्ध मैत्रेय की विशेषताएं और ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) तुलनात्‍मक दृष्टि में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[[_  भाग 5  _]]&lt;br /&gt;पारसी धर्म के अनुसार अन्तिम ऋषि की भविष्‍यवाणियाँ&lt;br /&gt;पारसी धर्म का संक्षिप्‍त परिचय&lt;br /&gt;पारसी ग्रन्‍थों की भविष्‍यवाणियाँ&lt;br /&gt;सोइश्‍यान्‍त शब्‍द की व्‍याख्‍या&lt;br /&gt;स्‍तेवेत एरेता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[[_  भाग 6 _]]&lt;br /&gt;अन्तिम सन्‍देष्‍टा की भविष्‍यवाणियाँ तौरेत के पन्‍नों में&lt;br /&gt;उनके (अर्थात इसराईलियों के) भाइयों के बीच में होगा&lt;br /&gt;शब्‍द महामदेय की व्‍याख्‍या&lt;br /&gt;तेरे (अर्थात मूसा अ. के) समान एक नबी आएगा&lt;br /&gt;हज़रत मूसा (अ.) और हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल.) में समानता&lt;br /&gt;ईश्‍वरीय वचनों को प्राप्‍त करके उन्‍हें प्रसारित करना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[[_  भाग 7 _]]&lt;br /&gt;इंजील के अनुसार अन्तिम सन्‍देष्‍टा की भविष्‍यवाणियाँ&lt;br /&gt;ह. ईसा मसीह (अलै.) द्वारा की गयी भविष्‍यवाणियाँ&lt;br /&gt;पैराक्‍लीट की वास्‍तविकता&lt;br /&gt;बाइबिल में संशोधन&lt;br /&gt;पैराक्‍लीट का अर्थ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[[_  भाग 8 _]]&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के आने से पूर्व अरब कवियों की भविष्‍यवाणियाँ&lt;br /&gt;अरब कवियों और तुजूमियों की भविष्‍यवाणियाँ  और हजरत मुहम्‍मद (सल्‍ल.)&lt;br /&gt;राइश के अनुसार ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.)&lt;br /&gt;वरक़ा बिन नौफल के अनुसार ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.)&lt;br /&gt;फ़ातिमा बिन्‍त मुर्रह की भविष्‍यवाणियाँ&lt;br /&gt;हज़र बिन मालिक की भविष्‍यवाणियाँ&lt;br /&gt;कअब बिन लुवई की भविष्‍यवाणियाँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[[_  भाग 9 _]]&lt;br /&gt; हिन्‍दी कवियों और सन्‍तों की भविष्‍यवाणियाँ&lt;br /&gt;भक्ति काल के कवियों का गुणगान&lt;br /&gt;क़ुरआन में मुहममद (सल्‍ल.) के विषय में&lt;br /&gt;इसी बात को जायसी ने पदमावत में स्‍पष्‍ट रूप से कहा&lt;br /&gt;इसी प्रकार अखरावट में लिखा है&lt;br /&gt;सूफी कवि मंझन मधुमालती में लिखते हैं&lt;br /&gt;सूफी प्राणनाथ ने ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) को ईशदूत स्‍वीकारते हुए लिखा है&lt;br /&gt;कबीरदास जी के अनुसार&lt;br /&gt;महाराजा सरकिशन प्रसाद जी के अनुसार&lt;br /&gt;मुशी शंकर लाल साक़ी के अनुसार&lt;br /&gt;लक्ष्‍मी नारायण श्री वास्‍तव के अनुसार&lt;br /&gt;चौधरी दल्‍लू राम कौसरी के अनुसार&lt;br /&gt;तिलोक चन्‍द महरूम के अनुसार&lt;br /&gt;पंडित हरिचन्‍द्र अख्‍़तर की ज़बानी&lt;br /&gt;पंडित देवी प्रसाद मस्‍त के अनुसार&lt;br /&gt;योगेन्‍द पाल साबिर के अनुसार&lt;br /&gt;जगन्‍नाथ प्रसाद के अनुसार&lt;br /&gt;चन्‍द प्रकाश जौहर बिजनौरी के अनुसार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन्‍तों की भविष्‍यवाणियाँ&lt;br /&gt;तुल्‍सीदासजी के अनुसार ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.)&lt;br /&gt;बाबा गुरू नानक जी के अनुसार ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[[_  भाग 10 _]]&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) प्रसिद्ध गैर मुस्लिम इतिहासकारों की दृष्टि में&lt;br /&gt; हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल.) का स्‍तर (दर्जा)&lt;br /&gt;डी. डब्‍ल्‍यू. लाइट्ज के अनुसार&lt;br /&gt;आर. डब्‍ल्‍यू.  स्‍टूअर्ट के अनुसार&lt;br /&gt;लामार्टिन के अनुसार&lt;br /&gt;गिबन के अनुसार&lt;br /&gt;जी. हिगिन्‍स के अनुसार&lt;br /&gt;स्‍टेन्‍ले लेनपूल के अनुसार&lt;br /&gt;डा. गेस्‍टोंव लीबान के अनुसार&lt;br /&gt;जान डेविन पोर्ट के अनुसार&lt;br /&gt;यार्क्‍स डाड के अनुसार&lt;br /&gt;विश्‍वमान्‍य गाँधी जी के विचार&lt;br /&gt;'इन्‍साइक्‍लोपीडिया ब्रिटानिका' के रचयिताओं के अनुसार&lt;br /&gt;मुहलरजी के अनुसार&lt;br /&gt;मिस्‍टर थाम्‍स कारलायल के अनुसार&lt;br /&gt;जर्मन इतिहासकार डोश के अनुसार&lt;br /&gt;मिस्‍टर वास्‍वार्थ स्मिथ के अनुसार&lt;br /&gt;एक स्‍थान पर मिस्‍टर थामस लिखते हैं&lt;br /&gt;एक ईसाई डा. स्पिरिंगर के अनुसार&lt;br /&gt;रेवरेण्‍ड राडवेल के अनुसार&lt;br /&gt;मिसेज एनीबेसेन्‍ट के अनुसार&lt;br /&gt;जार्ज बर्नाशॅ के अनुसार ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[[_  भाग 11 _]]&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) वैज्ञानिकों की दृष्टि में&lt;br /&gt;वैज्ञानिकों का विश्‍लेषण&lt;br /&gt;प्रो. मूरे के अनुसार ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.)&lt;br /&gt;प्रो. तेगासन के अनुसार ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.)&lt;br /&gt;प्रो. कार्नर के अनुसार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साराँश&lt;br /&gt;प्रो. हे के अनुसार ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.)&lt;br /&gt;प्रो. सिम्‍पसन के अनुसार&lt;br /&gt;प्रो. मार्शल जानसन के अनुसार&lt;br /&gt;प्रो. यश्‍युदी कुसान के अनुसार&lt;br /&gt;प्रो. टी़. वी़. एऩ. प्रसाद के अनुसार&lt;br /&gt;प्रो. शोडर के अनुसार&lt;br /&gt;प्रो. आर्मस्‍ट्रांग के अनुसार&lt;br /&gt;पवित्र क़ुरआन और विज्ञान&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[[_  भाग 12 _]]&lt;br /&gt;ईशदूतत्‍व विश्‍वास&lt;br /&gt;पवित्र क़ुरआन के अनुसार ईशदूत की धारणा&lt;br /&gt;महाईशदूत ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) सारी मानव जाति के उद्धारक&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) अन्तिम सन्‍देष्‍टा के रूप में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[[_  खण्‍ड 'ख' भाग 1 _]]&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) का वंश&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के जन्‍म से पूर्व संसार की दशा&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के जन्‍म से पूर्व यहूदी धर्म की दशा&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के जन्‍म से पूर्व ईसाई धर्म की दशा&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के जन्‍म से पूर्व मजूसी सम्‍प्रदाय की दशा&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के जन्‍म से पूर्व बौद्ध धर्म की दशा&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के जन्‍म से पूर्व हिन्‍दुस्‍तान की दशा&lt;br /&gt;भारत का अन्‍धकारमय युग&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के जन्‍म से पूर्व रोम की दशा&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के जन्‍म से पूर्व ईरानी साम्राज्‍य की दशा&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के जन्‍म से पूर्व अरब की दशा&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) अरब पायद्वीप में क्‍यों पैदा हुए&lt;br /&gt;ईरानी सभ्‍यता पर एक दृष्टि&lt;br /&gt;हिन्‍दुस्‍तानी सभ्‍यता पर एक दृष्टि&lt;br /&gt;रोम और ईरानियों की सभ्‍यता&lt;br /&gt;अरब प्रायद्वीप में अन्तिम नबी के अभ्‍युदय का दूसरा कारण&lt;br /&gt;अरब प्रायद्वीप की भौगोलिक स्थिति&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) का जन्‍म&lt;br /&gt;नुबूवत के ताज (अर्थात ईशदूतत्‍व पद)&lt;br /&gt;इस्‍लाम की किरण&lt;br /&gt;इस्‍लाम&lt;br /&gt;सर्वप्रथम इस्‍लाम ग्रहण करने वाले&lt;br /&gt;मुसलमानों का घोर विरोध&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाईशदूत ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) पर मक्‍का निवासियों का अत्‍याचार&lt;br /&gt;महाईश दूत ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) को प्रलोभन&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) का सामाजिक बाईकाट&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मक्‍का के काफिरों का अत्‍याचार मुसलमानों पर&lt;br /&gt;हजरत बिलाल (रजि.) का इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;हज़रत ख़ब्‍बाब (रजि.) का इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;हज़रत सुहेब (रजि.)  का इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;हज़रत अबू फ़कीह (रजि.)  का इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;हज़रत सुमैया सुहेब (रजि.)  का इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;हज़रत अबू ज़र गि़फारी(रजि.) का इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;हज़रत अब्‍दुल्‍लाह बिन मसऊद(रजि.)  का इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;हज़रत उस्‍मान ग़नी (रजि.)  का इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;हज़रत ज़ुबैर बिन अव्‍वाम (रजि.)  का इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;हज़रत सईद बिन ज़ैद (रजि.)  का इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;हज़रत आईशा बिन रबीअः (रजि.)  का इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रजि.)  का इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री नाथू राम जी उस युग का वास्‍तविक चित्र इस प्रकार प्रस्‍तुत करते हैं&lt;br /&gt;इस घोर अत्‍याचार के बाद मुसलमानों की हिजरत&lt;br /&gt;इस्‍लाम का प्रकाश मदीने में&lt;br /&gt;मदीने की ओर हिजरत&lt;br /&gt;मक्‍का की ओर हिजरत&lt;br /&gt;मक्‍का निवासियों से युद्ध&lt;br /&gt;कृत्‍ल (युद्ध) की अनुमति का कारण&lt;br /&gt;जिहाद का अर्थ इस्‍लाम धर्म में&lt;br /&gt;शिक्षा प्राप्त करना भी एक जिहाद है&lt;br /&gt;माल के ज़रिये पवित्र क़ुरआन में जिहाद&lt;br /&gt;जान के ज़रिये जिहाद&lt;br /&gt;तलवार का प्रयोग, इस्‍लाम धर्म में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुरआन पर आरोप की वास्‍तविकता&lt;br /&gt;बाबू मुकुटधारी प्रसाद जी के अनुसार इस्‍लाम की तलवार&lt;br /&gt;महात्‍मा गाँधी जी के अनुसार इस्‍लाम की तलवार&lt;br /&gt;स्‍वामी विवेकानन्‍द जी के अनुसार&lt;br /&gt;डी. लेसी ओ. लेरी के अनुसार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस्‍लाम की नैतिकता&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) का पहला युद्ध&lt;br /&gt;लेनपूल के अनुसार ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.)&lt;br /&gt;मि. लारेंस ई. ब्राउन के अनुसार&lt;br /&gt;इस्‍लाम का सिद्धान्‍त गैर मुस्लिम भाइयों के हित में&lt;br /&gt;श्री सुन्‍दर लाल जी के अनुसार इस्‍लामी सिद्धांत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुरआन के प्रभाव से इस्‍लाम क़ुबूल करने वाले&lt;br /&gt;हज़रत उस्‍मान मज़ऊन (रजि.) का इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;हज़रत ज़ुबैर बिन तुतइम (‍रजि.) का इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के आचरण से प्रभावित होकर इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;आप (सल्‍ल.) के भाषण के प्रभाव से इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;आप (सल्‍ल.) को केवल देखने से इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;आप (सल्‍ल.) के आचरण के प्रभाव से इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;आप (सल्‍ल.) के चमत्‍कार के प्रभाव से इस्‍लाम स्‍वीकार करना&lt;br /&gt;मक्‍का विजय और शत्रुओं के साथ व्‍यवहार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) द्वारा दिये गये सेना को उपदेश&lt;br /&gt;मानवता पूर्ण नियम&lt;br /&gt;अन्तिम हज और उसका खुत्‍बा&lt;br /&gt;अन्तिम अन्‍तर्राष्‍ट्रीय भाषण&lt;br /&gt;आप (सल्‍ल.) की बीमारी और अन्तिम समय&lt;br /&gt;आप (सल्‍ल.) के अन्तिम शब्‍द&lt;br /&gt;आप (सल्‍ल.) के निधन के बाद&lt;br /&gt;आप (सल्‍ल.) की क़ब्र मुबारक (रौज़-ए-अतहर)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[[_  भाग 2 _]]&lt;br /&gt;हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के आचरण और गुणों का वर्णन&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) का आचरण और स्‍वभाव&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) के गुणों का वर्णन&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) का स्‍वभाव&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) की दयालुता&lt;br /&gt;ह. मुहम्‍मद (सल्‍ल.) की सादगी&lt;br /&gt;जानवरों पर दया&lt;br /&gt;सेवकों के साथ दया&lt;br /&gt;आप (सल्‍ल.) का पहनावा&lt;br /&gt;आप (सल्‍ल.) का भोजन&lt;br /&gt;आप (सल्‍ल.)को शुश्‍बू पसन्‍द थी&lt;br /&gt;आप (सल्‍ल.) के आराम करने का तरीक़ा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[[_  भाग 3 _]]&lt;br /&gt;हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल्.) के उपदेश&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[[_  खण्‍ड 'ग' भाग 1 _]]&lt;br /&gt;  इस्‍लाम धर्म का अर्थ और उसके कुछ मूल विश्‍वास&lt;br /&gt;इस्‍लाम धर्म का शाब्दिक अर्थ&lt;br /&gt;इस्‍लाम धर्म की प्रचीनता और उसके संस्‍थापक&lt;br /&gt;विश्‍वव्‍यापी धर्म (global way of Life)&lt;br /&gt;इस्‍लाम धर्म के मूल विश्‍वास&lt;br /&gt;तौहीद (एकेश्‍वरवाद)&lt;br /&gt;रिसालत (ईशदूत्‍व विश्‍वास)&lt;br /&gt;अल्‍लाह की ओर से अवतरित ईशवाणी या ईशग्रंथों पर विश्‍वास&lt;br /&gt;अल्‍लाह के फरिश्‍तों (देव दूतों) पर आस्‍‍था&lt;br /&gt;तक़दीर पर आस्‍था&lt;br /&gt;कि़याम और मरने के बाद दूबारा उठाए जाने पर आस्‍था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिर्क न करना&lt;br /&gt;सहाबा के विषय में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस्‍लाम के प्रमुख आधार&lt;br /&gt;मुसलमान किसे कहते हैं&lt;br /&gt;काफि़र का अर्थ&lt;br /&gt;अन्तिम शब्‍द&lt;br /&gt;=================================================================&lt;div&gt;नमूना1:&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;p&gt;बाबा गुरू नानक जी के अनुसार हजरत मुहम्‍मद &lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 16px; "&gt;&lt;span style="font-family:Arial;font-size:85%;"&gt;(&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;सल्‍ल&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Arial;font-size:85%;"&gt;.)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Arial;font-size:85%;"&gt;&lt;p&gt;''&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Times New Roman'; "&gt;पहला नाम खुदा का दूजा  नाम रसूल&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;p&gt;तीजा कलमा पढ़ नानका दरगे पावें क़बूल&lt;/p&gt; &lt;p&gt;डेहता नूरे मुहम्‍मदी डेहता नबीं रसूल&lt;/p&gt; &lt;p&gt;नानक कुदरत देख कर खुदी गई सब भूल&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; "&gt;''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;p&gt;पुस्‍तक &lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 16px; "&gt;&lt;span style="font-family:Arial;font-size:85%;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;अन्तिम  सन्‍देष्‍टा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Arial;font-size:85%;"&gt;' - &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;कब कहाँ और  कौन&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Arial;font-size:85%;"&gt;" &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;प्रष्‍ठ &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Arial;font-size:85%;"&gt;121 &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;प्रकाशकः फरीद बुक डिपोट (प्राइवेट) लिमिटिड&lt;br /&gt;2158, एम. पी. स्‍ट्रीट, पटौदी हाउस, दर्यागंज, नई दिल्‍ली-2,&lt;br /&gt;फोनः23247075, 23289786&lt;br /&gt;ईमेलः farid@ndf.vsnl.net.in&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;You Can Read &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;online &lt;span class="Apple-style-span"&gt;Now&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;&lt;a href="http://www.scribd.com/doc/39583365/Antim-Sandeshta-Hindi-Book-by-Sarwar-Nadwi"&gt;पुस्‍तकः ''अन्तिम सन्‍देष्‍टा कहाँ, कब और कौन?'&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.scribd.com/doc/39583365/Antim-Sandeshta-Hindi-Book-by-Sarwar-Nadwi"&gt;'&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4148684920008435142-1565270073283150370?l=antimawtar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://antimawtar.blogspot.com/feeds/1565270073283150370/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4148684920008435142&amp;postID=1565270073283150370' title='23 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4148684920008435142/posts/default/1565270073283150370'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4148684920008435142/posts/default/1565270073283150370'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://antimawtar.blogspot.com/2009/10/antim-sandeshta.html' title='विषय सूची पुस्‍तकः &apos;&apos;अन्तिम सन्‍देष्‍टा कब, कहाँ और कौन?&apos;antim-sandeshta'/><author><name>Mohammed Umar Kairanvi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06899446414856525462</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_6kacm3QiWSA/Sxd7Q7WZMqI/AAAAAAAAAVY/iETHamqjm0M/S220/cyber-maulan-umar-kairanvi-new-dec09-c.jpg'/></author><media:thumbnail 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href="http://1.bp.blogspot.com/_6kacm3QiWSA/SpeDruTF6nI/AAAAAAAAANw/ttfYxNIF_hQ/s1600-h/antim-avtar-4th-book.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 225px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_6kacm3QiWSA/SpeDruTF6nI/AAAAAAAAANw/ttfYxNIF_hQ/s320/antim-avtar-4th-book.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5374909467475700338" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;हे मनुष्‍य अब उठ &lt;span&gt;जाओ&lt;/span&gt;, निद्रा भंग करो, जाग जाओ--'कठ' उपनिषद-1-3-14 मन्‍त्र&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;प्रस्‍तावना&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;जगत के रचयिता परमात्मा ने मनुष्य की सृष्टि करने से पूर्व ही मनुष्यों के समग्र प्रयोजानीय वस्तुओं का धरती में सजा के रखा था, ताकि मनुष्यों को किसी प्रकार का कष्ट एवं असुविधा न हो पाये। इसके बाद पहला मानव और मानवी की सृष्टि की, विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में कुछ नाम तो पृथक वर्णन है लेकिन उद्देश्य वही सृष्टि में प्रथम मानव-मानवी ही है। जैसे आर्य हिन्दू धर्म ग्रंथावली के अनुसार स्वयम्भू मनु एवं शतरूपा कहा गया है, इस्लाम धर्म ग्रंथ के अनुसार आदम (अ.) एवं मा हव्वा कहा गया है। ईसाई धर्म ग्रंथ के अनुसार आदम एवं ईभ कहा कहा है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href="http://www.scribd.com/doc/19134791/Hindi-Book-Antim-Avtar-Preeche"&gt;online  hindi book "antim avtar preeche"&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt; www.scribd.com&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आज समग्र धरती उसी पहले मानव मानवी की संतान से भर गयी, इस धरती पर जितने भी जाति धर्म संप्रदाय में विभिन्नता हो वास्तविकता  तो यह है कि हम सभी एक ही मां बाप की संतान हैं, अर्थात एक दूसरे से भाईचारे के सम्बंध हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस समय समग्र धरती में अन्याय, अधर्म, अत्याचार हिंसा, मारकाट चल रही है, फलस्वरूप दुख, कष्ट अशांति की बाढ़ जैसी चल रही है। ऊपर से सांप्रदायकि होना-हानि में तो समग्र मनुष्य समाज अस्थिर है;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस अवस्था से मुक्ति के लिए एक ही उपाय है। क्योकि धरती में जिस-जिस समय अशांति अधर्म अन्याय भर गये, उस समय परमकरूणामय सृष्टिकर्ता (परब्रह्म) ने अपना दूत भेजकर जगत में सत्य धर्म संस्थापन, अशांति अधर्म अन्याय को नष्ट करके सुंदर समाज की स्थापना की;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मनुष्य बार-बार बिगड़ते गये, परमकरूणामय ईश्वर (परब्रह्म) बार-बार शांति का दूत भी भेजे हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अगर हम उस दूत के विष्य में बेखबर है तो ईशदूत ने कौन सा शांति संदेश दिया, मालूम नहीं होगा, इसलिए हमें शांति मिलना भी कठिन होता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब भी समय है, समग्र ईशदूत धरती पर आये और अपना कार्य सम्पूर्ण करके वापस चले गये, केवल मात्रा अंतिम ईशदूत के उपदेश के अनुसार जिंदगी चलाना ही इस समय शांति मिलने का सघन उपाय है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इसमें एक समस्या भी है क्योंकि लोगों मे एक यह विश्वास प्रचालित है कि अंतिम अवतार तो भविष्य में होंगे, यह धारणा ठीक नहीं है, पाठक विचार बुद्धि के द्वारा ही इसका समाधान कर पायेंगे , इसलिए सृष्टिकर्ता (परब्रह्म) का अंतिम संदेश पहुंचाने वाला अंतिम अवतार/अंतिम नराशंस/ अंतिम पैगम्बर/अंतिम नवी या रसूल के विषय में वर्णन करना है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उदार मन एवं विचार के साथ आप अगर खोज करे तो अवश्य मिल पायेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;महान करूणामय सृष्टिकर्ता (परब्रह्म) हम सबको सत्य समझने की सदबुद्धि प्रदान करे। साथ-साथ इस कार्य को स्वीकार करे।&lt;/div&gt;&lt;div style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;भूमिका&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अवतारवाद की भूमिका में अवतार शब्द को प्रथम समझना है। ईशदूत/ईश्वर के संदेश वाहक के विषय में अवतार शब्द का प्रयोग पुराणों में किया गया है, वेद संहिता निरूक्त आदि में इसका उल्लेख नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वेद संहिता में संदेश वाहक के लिए दूत, देवदूत या अग्नि दूत आदि शब्द का प्रयोग है। आचार्य यास्क ने निरूकत में ‘दूत’ शब्द का अर्थ संदेश वाहक या अनर्थ निवारक लिया है। (निः 5/1)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पुराण का रचना करने वालों ने संदेश वाहक को दूत के बदले अवतार कर दिया जिसके कारण अंतिम भ्रांति उत्पन्न हुई है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;व्याकरण की दृष्टि से अवतार शब्द का अर्थ कृत प्रकरण में धज प्रत्यय प्रयोग वर्णन में अव उपसर्ग पूर्वक ‘तृ’ धातु में ‘धान’ प्रत्यय लगातार अवतार शब्द की उत्पत्ति है। (जैसे अव़तृ़ध× - अवतार)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;- व्याकरण कौमुदी - ईश्वर चंद्र विद्यासाग।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पं. गिरिश चंद्र विद्यारत्न ने भी शब्द सार ग्रंथ में वही कहा है। अग्निदूत या ईश्वरावतार शब्द का अर्थ करते समय यह स्मरण रखना है कि इसमें एक ‘का’ शब्द छुपा है, ईश्वरावतार - ईश्वर का अवतार।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अतः इसमें ‘का’ शब्द सम्बंध कारक का चिन्ह है। अर्थात ईश्वर से सम्बंध से युक्त किसी मनुष्य को मनुष्य लोक में आना है, जो कि सृष्टि कर्ता (परब्रह्म) की ओर से प्राप्त हुए संदेश को लोगों तक पहुंचाते हैं। इस अर्थ के साथ वेद संहिता में दूत/देवदूत-2/6/6 एवं 1/12/1 अग्निदूत - 10/122/25 और 1/36/5, 1/44/2 में कहे गये शब्द में समानता है। पुराणकार गणों ने जिस प्रकार अवतार शब्द का प्रयोग किया है। वह उनका मत है, व्याकरण शुद्ध नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;1. क्योंकि पुराण वर्णन के अनुसार अवतार का श्रेणी विभाग करके पुराणकार गणों ने अपना मत स्थापन करने के लिये प्रयास किया है। इस श्रृंखला में पूर्णावतार, अशावतार, कलावतार, लिलावतार, भक्तात्यावेशवतार आदि बहुत सी श्रेणियों में बांट कर अवतार को ईश्वर का अंश समझा गया हैं। यह एक संकीर्ण भावना की सोच है। उपास्य भेद में जैसा पुराण एवं सम्प्रदाय भेद है, इसी प्रकार ईश्वर क विभाजन किया है जो कि सर्वथा अन्याय है। श्री विष्णुपुराण के अनुसार 18 पुराणों के नाम - 1. ब्रह्म, 2. अग्नि, 3. विष्णु(शिव) 5. भागवत 6. नारदीप 7. मार्कण्डेय 8. अग्नि 9. भविष्य 10. ब्रह्मवैवर्त 11. लिंग 12. बाराह, 13. स्कंद 14. वामन 15. कुर्मा 16. मत्स्य 17. गरूड़ 18. ब्रह्माण्ड  इसके अतिरिक्त 18 उपपुराण एवं 18 संख्या औप पुराण है कुल मिलाकर 54 पुराण है। (वि.पु. 3/6/21-24) स्कंद पुराण केदार खण्ड के अनुसार 18 महापुराणों में से 10 शिव विषयक पुराण, 4 ब्राह्म, 2 शाक्त एवं 2 वैष्णव पुराण हैं। इसी के आधार पर शाक्त शैव वैष्णव आदि संप्रदाय का विवाद चल रहा है। प्रत्येक सम्प्रदाय के उपास्य को श्रेष्ठता दान करने के लिए पूर्ण, अंश आदि अवतार की कल्पना है। अतः सृष्टिकर्ता (परब्रह्म) कभी जन्म नहीं लेते हैं, क्योंकि वेद संहिता उपनिषद आदि ग्रन्थ में ईश्वर (परब्रह्म) अज, अव्यक्त, सर्वव्यापी अनन्त आदि कहा गया है। (ऋ 1/6/3, यजुः 40/8, मुण्डक उपः 2/1/2 श्वेता: उप: 3/21 वृृःआःउपः- 4/4/20 ईश उपः 8, गीता-13/14-15)&lt;/div&gt;&lt;div style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;पुराणों में अवतार&lt;/div&gt;&lt;div&gt;विभिन्न पुराणों में अवतार का वर्णन है तथा इनके नाम एवं संख्या में भिन्नता पाये जाते हैं। इसमें भागवत पुराण सबसे आगे है, इसमें कई स्थानों में अवतार वर्णन किया है। जैसे-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;1. भागवत पुराण - 1 स्कंध 3 अध्याय में 22 अवतारों के नामों के उल्लेख पाये जाते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;2. भागवत पुराण - 2 स्कंध 7 अध्याय में 24 अवतारों के नामों के उल्लेख पाये जाते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;3. भागवत पुराण - 10 स्कंध 7 अध्याय में 10 अवतारों के नामों का उल्लेख पाये जाते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;4. भागवत पुराण - 11 स्कंध 4 अध्याय में 19 अवतारों के नामों के उल्लेख किया गया है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भागवत कार अंत में अवतारों की संख्या असंख्य कह गए हैं। (मा: 1/3/26) वायु पुराण - 98 अध्याय 70-104 श्लोक में 10 अवतार कहा। वाराह पुराण - 4 अध्याय 2 श्लोक में 10 अवतार कहा है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;1. मत्स्य पुराण - 285 अध्याय 6 श्लोक में 10 अवतारों के नाम दिये गये हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;2. मत्स्य पुराण - 49 अध्याय 237 - 248 श्लोक में 10 अवतारों के नाम दिये गये हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अग्नि पुराण - 10 अवतारों का वर्णन किया गया है/11-16/8 तक।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ब्रह्म पुराण - इस पुराण में 180/26-27 श्लोः के गीता 4/7-8 जैसा है और 180/22/32 श्लोक में 6 अवतारों के उल्लेख है। श्राविष्णु पुराण-1/4/8 श्लोः में 3 अवतार के नाम।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्राविष्णु पुराण - 1/9/143-144 में 4 अवतार के नाम&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्राविष्णु पुराण 7 2/2/50 में 4 अवतार के नाम हैं&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल्क्यी अवतार(विः पुः 4/24/98) हरिवंश पुराण - 1/41 अध्याय में 10 अवतार का उल्लेख है। महाभारत - वन पर्व 272/52-74 में 4 अवतारों का नाम है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वन पर्व - 187 अध्याय। अवतार एवं वन पर्व 190-191 अध्याय में अंतिम अवतार कल्कि का वर्णन है। महा: शांति पर्व 339/103-104 में 10 अवतारों का उल्लेख है। पिफर शांति पर्व 339/77-102 तक 6 अवतारों का उल्लेख है। मेरा मूल विषय तो अंतिम अवतार का वर्णन करना है। जो कि सभी पुराणों में अवतार के वर्णन करना है जो कि सभी पुराणों में अवतार के वर्णन में कल्की अंतिम अवतार है। लेकिन अन्य का भी संक्षेप वर्णन किया जाता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="font-weight: bold;"&gt;क्रम&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;अवतारों के नाम&lt;span class="Apple-tab-span"&gt;  &lt;/span&gt;उल्लिखित ग्रन्थों के नाम&lt;/div&gt;&lt;div&gt;1.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;चर्तुःसन&lt;span class="Apple-tab-span"&gt;   &lt;/span&gt;भागवत पुराण में तीन स्थान में,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;2.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;वराह (यज्ञवराह)&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;भागवत, विष्णु, हरिवंश, अग्नि मत्स्य महाभारत&lt;/div&gt;&lt;div&gt;3.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;नारद&lt;span class="Apple-tab-span"&gt;  &lt;/span&gt;भागवत पुराण में एक स्थान पर&lt;/div&gt;&lt;div&gt;4.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;नर-नारायण&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;भागवत पुराण, अन्य पुराण में ऋषि है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;5.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;कपिल&lt;span class="Apple-tab-span"&gt;  &lt;/span&gt;भागवत पुराण, अन्य पुराण में ऋषि है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;6.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;दत्रात्रोय&lt;span class="Apple-tab-span"&gt;  &lt;/span&gt;भागवत हरिवंश, मत्स्य, ब्रह्म, वायु&lt;/div&gt;&lt;div&gt;7.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;यज्ञ (सुयज्ञ)&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;भागवत पुराण में दो स्थान पर&lt;/div&gt;&lt;div&gt;8.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;ऋषभ&lt;span class="Apple-tab-span"&gt;  &lt;/span&gt;भागवत पुराण, अन्य पुराणों में धार्मिक राजा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;9.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;पृथु&lt;span class="Apple-tab-span"&gt;  &lt;/span&gt;भागवत पुराण, अन्य में धार्मिक राजा है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;10.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;मत्स्यावतार&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;प्रायः सभी पुराणों में।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;11.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;कुम्र्मावतार&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;भागवत, वायु, मत्स्य, अग्नि, श्रीविष्णु, महाभारत शाःपः&lt;/div&gt;&lt;div&gt;12.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;धन्वन्तरी&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;भागवत पुराण एक स्थान में,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;13.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;मोहिनी&lt;span class="Apple-tab-span"&gt;  &lt;/span&gt;भागवत पुराण एक स्थान में&lt;/div&gt;&lt;div&gt;14.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;नरसिंह (नृसिंह)&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;प्राय- सभी पुराणों में&lt;/div&gt;&lt;div&gt;15.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;वामनावतार&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;भागवत, वायु, मत्स्य, हरिवंश,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अग्नि, ब्रह्मः, महाभारत शाःपः&lt;/div&gt;&lt;div&gt;16.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;परशुरामावतार&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;प्रायः सभी पुराणों में&lt;/div&gt;&lt;div&gt;17.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;व्यासावतार&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;भागवत पुराण दोनों स्थान, हरिवंश&lt;/div&gt;&lt;div&gt;18.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;राजाराम&lt;span class="Apple-tab-span"&gt;  &lt;/span&gt;प्रायः सभी पुराणों में&lt;/div&gt;&lt;div&gt;19.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;बलराम&lt;span class="Apple-tab-span"&gt;  &lt;/span&gt;भागवत पुराण, वराह पुराण&lt;/div&gt;&lt;div&gt;20.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;श्रीकृष्णावतार&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;भागवत, विष्णु, हरिवंश, अग्नि मत्स्य,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ब्रह्म वराह, महाभारत&lt;/div&gt;&lt;div&gt;21.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;बुद्ध (गौतम बुद्ध)भागवत, वराह, मत्स्य, अग्नि।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;22.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;कल्क्यी अवतार&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;सभी पुराणों के साथ महाभारत&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एवं कल्क्यी नाम में उपपुराण में।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;23.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;ध्रुव प्रिय हरि&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;भागवत पुराण, अन्य में देवता,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;24.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;हयग्रीव&lt;span class="Apple-tab-span"&gt;  &lt;/span&gt;भागवत पुराण, विष्णु&lt;/div&gt;&lt;div&gt;25.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;गजेंद्र मोक्षण&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;भागवत पुराण&lt;/div&gt;&lt;div&gt;26.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;हंस&lt;span class="Apple-tab-span"&gt;  &lt;/span&gt;भागवत पुराण, महाभारत शाः पः&lt;/div&gt;&lt;div&gt;27.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;मनु अवतार&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;प्राय सभी पुराणों में (14 संख्या है)&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;28.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;पुरुष (नारायण)&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;भागवत पुः एवं वायु पुराण&lt;/div&gt;&lt;div&gt;29.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;आदित्यावतार&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;श्रीविष्णु पुराण&lt;/div&gt;&lt;div&gt;30.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;पौष्कर&lt;span class="Apple-tab-span"&gt;  &lt;/span&gt;हरिवंश पुराण&lt;/div&gt;&lt;div&gt;31.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;मान्धाता&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;मत्स्य पुराण (49/243)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;32.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;पन्चदशी पुऋ&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;वायु पुराण&lt;/div&gt;&lt;div&gt;33.&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;वाल्य खिल्ल&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;भागवत पुराण&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उक्त अवतारों की तालिका में अधिकंाश अवतार मनुष्य नहीं है। इसी कारण से इन अवतारों का मनुष्य समाज का धार्मिक गुरू होना सम्भव नहीं है। क्योंकि अति मानव या देवता अथवा अमानव के साथ मनुष्यों की शक्ति बुद्धि रहन-सहन, चाल-चलन आदि में बहुत अंतर है। इसलिये मनुष्य में जन्म होकर मनुष्य व्यवहार द्वारा जो शिक्षा दी गयी मनुष्य उस शिक्षा को सम्पूर्ण रूप के ग्रहण कर लेगा, इसलिये अवतार का मनुष्य होना अत्यंत आवश्यक है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वेद संहिता में दूत/अग्रिदूत के लिये जो कार्य भार दिया उसके अनुसार तालिका में अधिकंाश नाम निकल जायेगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वेद संहिता का कथन है - प्रत्येक युग में अग्नि मनुष्यों के लिए देवदूत है। इस स्थान पर अग्नि शब्द में आत्मा समझना है। (ऋ 6/16/23) अग्नि शब्द के अर्थ में वैदिक कोष ग्रंथ में 185 अर्थ दिये गये हैं। अग्नि - आत्मा शतः ब्राह्मण - 6/7/1/20, 10/1/2/4, 7/3/1/2 में उल्लेख है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इसी देवदूत को ही अग्नि ऋषि/नरशंस/अवतार/ईशदूत/सन्देष्टा आदि कहा गया है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;1. अग्नि (दूत) लोकों का रक्षाकारी है। लोगों को पथ प्रदर्शन हेतु नवीन पथ से कल्याण करने के लिए जन्म लेते हैं। (ऋः 5/11/1) 2. अग्नि (दूत) ऋषि है। लोगों के हित के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं। (ऋः 1/66/3-4)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;3. अग्नि ऋषि पवित्रा एवं महान है। पज्वजनों के लिए हितकारी है। (ऋः 9/66/20)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;4. अग्नि देवदूत (सन्देशवाहक) उपयुक्त उपदेश करने वाला है। (लोगों को शिक्षा  देते हैं) ऋ 8/44/20, निः 5/1&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अग्नि (दूत) धरती एवं आकाश का सेतु है। (2/2/4)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;6. अवतार उस समय जन्म लेते हैं, जिस समय धर्म का पतन और अधर्म की वृद्धि हो जाती है। (ब्रह्म पुराण - 180/26-27)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस सूत्रानुसार जांच किया जाये तो अवतारों के नामों में 3/4 खरी उतरता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पुराणों में विभिन्न सम्प्रदायिक पुराणकारों द्वारा अवतार प्रक्षिप्त हुए हैं, इसलिए पौराणिक वर्णन के साथ वेद संहिता का वर्णन मिलाकर जांच करके देखने का भी प्रयोजन है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक ही पुराण में परस्पर विरोध वर्णन मौजूद है। जैसे भगवान कृष्ण जी के विषय में भागवत पुराण में रास लीला आदि का वर्णन किया गया है। जिस कारण कृष्णजी में लाम्पटय कलंक लग गया, वहीं भागवत पुराण ही कहता है कि श्रीकृष्ण जी वृंदावन में मात्रा 11 साल आयु तक रहे, इसके बाद वृन्दावन से चले गये फिर कभी गये ही नहीं। (भाः पुः - 3/2/26)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्रीकृष्णजी के अतिरिक्त और भी बहुतों को नाम में भगवान शब्द जोड़ा जाता है। इसमें गलत नहीं क्योंकि भगवान शब्द का अर्थ ईश्वर/परब्रह्म/सृष्टिकर्ता/सृष्टि का मालिक आदि नहीं होता है, इस विषय में श्रीविष्णु पुराण -&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उत्पत्ति प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वेत्ति विदयामविदयां च स वाच्यो भगवानिति।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्री विष्णुपुराण 6/5/78&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जो समस्त प्राणियों का उत्पत्ति और नाश, आना और जाना तथा विद्या और अविद्दया को जानता है वही भगवान कहलाने योग्य है। (गीताप्रस संस्करण)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पुराण कार के वर्णन के अनुसार कृष्णजी को ईश्वर का आसन दे दिया, लेकिन वही पुराण वर्णन वर्णन में श्री कृष्ण जी खुद को मनुष्य मानते थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नाहं देवो न गन्धर्वो यक्षो न च दानवः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अहं वो बान्धवो जातो नैतच्चिन्त्यमितोहन्यथा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;(श्री विष्णु पुराण 5/13/12)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्री भगवान ने कहा - मैं न देव हूं न गंधर्व हूं, न यक्ष हूं और न दानव हूं। मैं तो आपके वांधव (दोस्त) स्वरूप से ही उत्पन्न हुआ हूं, आप लोगों को इस विषय में और कुछ विचार न करना चाहिए। पुराणों में प्रायशः परस्पर विरोधी वर्णन पाये जाते हैं इसलिये किसी महान विषय को वेद संहिता से जांच कर लिया जाये तो वही अच्छा होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आइये आगे चलिये मेरे साथ मिल कर अंतिम सन्देष्टा क अनुसंधान करे। क्योंकि हम सब आज कलियुग से गुजर रहे हैं। इस युग में सृष्टिकर्ता (परब्रह्म) ने जिसको शांति का सन्देश देकर भेजा था, उसका खोज करना सभी का परम कर्तव्य है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अगर किसी को शांति का प्रयोजन है तो अब भी अनुसंधान करे तो ईशदूत को पा जाएगा और शांति भी प्राप्त कर लेगा &lt;/div&gt;&lt;div style="font-weight: bold; color: rgb(51, 102, 255);"&gt;पौराणिक भाग&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span&gt;कल्की&lt;/span&gt;/&lt;span&gt;नराशंस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऋषि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अंतिम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अवतार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्रायः सभी पुराणों में जिस स्थान पर ईशदूत या अवतारों का वर्णन किया गया, उस वर्णन में कल्की को अंतिम अवतार के रूप में इंगित किया गया हैं पुराणों में 33 अवतारों के नाम मिलते हैं, इसमें अधिक वर्णन 10 अवतारों का है। वर्णन में कल्की ही अंतिम माना गया है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जैसा कि वराह पुराण में -&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मत्स्य कूर्मों वराहश्च  नरसिंहोहथ वामनः ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्की चते दश ।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बराह पुराण 4/2 श्लोक&lt;/div&gt;&lt;div&gt;फिर मत्स्य पुराण में -&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मत्स्य कूम्र्मों वराहश्च नरसिंहोथ वामनः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;रामो रामोश्च कृष्णश्च बुद्ध कल्कीति च क्रमात्।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मत्स्य पुराण 285/6 श्लोक&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात: कल्की अंतिम अवतार है, अवतारों के वर्णन में सभी जगहों पर कल्की को ही अंत में रखा है, जैसा कि नामों में बदल कर मत्स्य पुराण ही में देखे-मत्स्य पुराण 47 अध्याय 237 से 248 तक 10 संख्या अवतार का वर्णन है। इस स्थान पर भी कल्की को अंतिम अवतार कहा गया है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल्की तु विष्णु यशसः पाराश्चर्य पुरः सरः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दशमो भाव्यसम्मुतो ................. ।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अतः पौराणिक वर्णनों में कल्की अंतिम अवतार है। अर्थव वेद संहिता में अंतिम सम्वाद वाहक को नराशंस/ऋषि के नाम से सम्बोधित किया गया है, यह ही अंतिम नराशंस है। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;अवतार क्यों आते हैं -&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अवतार/ईशदूत मनुष्य लोक में मनुष्यों की भलाई के लिए जन्म लेते हैं। श्रीमद भगवद गीता में-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यदायदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अभ्युत्थानमधर्मस्यतदात्यानं सृजाम्यहम।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;परित्राणाय साधूनां विनाशय च दुष्कृताम्।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;धर्म संस्थापनाथाय समभावामि युगे युगे।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;(श्रीमद भगवद गीता 4/7-8)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जिस समय धर्म का पतन एवं अधर्म का उत्थान होता है अर्थात लोगों की अधर्म में रूची अधिक बढ़ जाती है, धर्म में कमी होती है, धर्म में कलुषता घुस जाती है, धर्म के नाम पर अधर्म होता रहता है, धर्म को अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग किया जाती है, तब परब्रह्म मनुष्य लोक के लिए अवतार भेजते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह अवतार (पुरुष) उस समय के धार्मिक लोगों की रक्षा एवं अधार्मिक पापी गणों का विनाश करके शुद्ध सत्य धर्म की शिक्षा देकर समाज में संस्थापन करते हैं, जब भी भयंकर धार्मिक पतन होता है, तब सृष्टिकर्ता ने अवतार/सन्देष्टा भेजा कर धर्म को शुद्ध सत्य रूप रक्षा की है यह व्यवस्था सृष्टि में मनुष्य के साथ-साथ आरम्भ हुई और अंतिम सन्देष्टा (कल्की अवतार) पर शेष (खत्म) हो गयी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऋक संहिता के अनुसार-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जनस्य गोपा अजनिष्ट जागृविरग्निः सुदक्षः&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सुविताय नव्य से। (ऋग्वेद संहिता 5 मण्डल 11/1 मः) अर्थात - प्रजा (लोगों) की रक्षा करने जागृति एवं दक्षता प्रदान करने, याजोकों (धार्मिकों) को प्रगति का नवीन पथ प्रशस्त करने के लिए जन्म लेते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जब सृष्टिकर्ता (परब्रह्म) के आदेशानुसार भोग्य वस्तु का भोग न करके स्वेच्छाचार से करते हैं तो उस समय अवतार (पुरुष) जन्म  लेकर फिर समग्र भोग्य वस्तु का भोग किस प्रकार करना है, इस की शिक्षा देते हैं। ईश उपनिषद में -&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ईशावास्य मिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तेन त्यक्तेन भुज्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ईश उपनिषद - 1 मंत्रा (यजुः 40/1)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात इस सृष्टि में जो कुछ भी जड़ अथवा चेतन हो वह सब ईश (सृष्टि का मालिक) द्वारा ढका हैं (सृष्टिकर्ता के अधिकार में है) केवल उसके द्वारा उपयोगार्थ जो आदेश है, वैसे ही उपभोग करो। अधिक के लिये लोभ लालच न करो। क्योंकि यह धन-सम्पद और किसिकी  नहीं है। इस सभी सम्पदा का मालिक सृष्टिकर्ता परब्रह्म है।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पुराणों के वर्णन के अनुसार कलियुग&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल्की अवतार कलियुग में जन्म लेगा, उस युग के लोग कैसे होंगे, कैसे आचरण करने वाले होंगे, इस विषय में पुराणों में उल्लेख है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्री विष्णुपुराण - 6 अंश 1 अध्याय में वर्णन है। महाभारत वन पर्व 190 अध्याय में वर्णन है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल्की विषयक वर्णन करने वाला उपपुराण कल्की पुराण इस पुराण के प्रथम अध्याय में वर्णन है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कलि (पापि/शयतान) के अनुचर गणों में चंचल, कामुक मनुष्य रूप में जन्म लिया। यह घोर दम्भी, दुराचारी मातृ पितृ हिंसक हुए। वेद हिन, कुतर्क वादि शुद्र के सेवक, धर्म वेदादि विक्रेता, शिश्नोदर, परदारा, परायण, उन्मत्त, वर्ण शंकर सन्तान उत्पन्न करने वाले हुए, शूद्र का दान लेने और पर सम्पद हरने वाले, स्त्रिा-पुरूष की सहमति ही विवाह, न्यायाधीश दण्ड देने में असमर्थ, धनवान ही साधु पुरुष मानना आदि। (1अः23.....)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अल्पशस्या वसुमति ........................... ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;स्त्रिायों वेश्यालय सुखा स्वपुंसा त्वक्त त्यक्तमानसा ।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चित्रावृष्टिकरा मेघा मंदशस्या च मेदिनी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्रजा भक्षा नृपा लोका: कर पीडाप्रपीडिता।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल्की पुराण - अध्याय 33.35 श्लोः&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पृथ्वी अल्पशस्या (अनाज की कमी) हो जायेगी, नारियां वेश्यालय में सुख मानने लगेंगी, भार्या पति से अनुराग नहीं रखेंगे, मेघ खण्ड वृष्टि वाले होगा, धान गेहूं आदि कम पैदा होगा। राजा गण प्रजा भक्षक होगा, प्रजा कर के बोझ से पीड़ित होती जायेगी। महाभारत में उपरोक्त कथन के साथ और कुछ कहां पुऋ पितृवधं कृता पिता पुत्रा वधं तथा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;महाभारत - वन पर्व 190/28 श्लोः&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - पुत्रा पिता का एवं पिता नुत्रा का वध करके भी उद्धिग्न (दुखी) नहीं होंगे। (आगे और भी कहां गया)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आक्रम्याक्रम्य साधूनां दारांश्चापि धनानि च।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भोक्षन्ते निरकुक्रोशा रूदतामपि भारत&lt;/div&gt;&lt;div&gt;महाभारत वन पर्व - 190/35&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हे भारत (भरतवंशी राजा) लोग इतने निर्दयी हो जायंेगे कि सज्जन पुरूषों पर भी बार-बार आक्रमण करके उनके धन और स्त्रिायों का बलपूर्वक उपभोग करेंगे तथा रोने बिलखने पर भी दया नहीं करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्री विष्णुपुराण में भी कल्की अवतार जन्म से पहले की युगावस्था का वर्णन है। (कारण)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उस समय अर्थ ही कुलीनता (श्रृष्ठता) को हेतु (कारण) होगा। बल ही धर्म का कंेद्र होगा, स्त्राी उपभोग की वस्तु होगी। मिथ्या भाषण ही सफलता का हेतु होगा। अन्याय ही अजीविका का माध्यम होगा। स्वीकार करना ही विवाह होगा, भली प्रकार बन ठन कर रहने वाला ही सुपात्रा होगा, बलवान ही राजा होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;1. श्रीविष्णु पुराण - 4 अंश/24 अध्याय/74-92)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बुराई का वर्णन प्रत्येक पुराण में कुछ न कुछ दिया है। ऐसी अवस्था में समाज जब दुख कष्ट अशांति मार-काट में गुजर रहा होगा, उस समय अंतिम अवतार/कल्की महाराजा/अंतिम नराशंस का जन्म होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पुराण वर्णन में अंतिम अवतार का नाम कल्की&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पौराणिक वर्णन में चारों युग में कलियुग अंतिम युग है। अंतिम अवतार ने कलियुग के उस समय जन्म लिया जबकि उसके आगे और अवतारों का आना बंद हो गया था, अतः वह अवतार ही कलियुग का शेष अवतार है। कलियुग का पाप-अधर्म को नाश करके फिर से धर्म संस्थापन करने के कारण उनका नाम कल्की कहा जाता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात कलियुग का पाप/अधर्म - ‘कल्क’ एवं इस ‘कल्क’ को विनाश करने वाला ‘कल्की’ है। कल्कि कल्कविनाशर्थमाविर्भूत&lt;span class="Apple-tab-span"&gt; &lt;/span&gt;विदुबुधाः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल्की पुराण - 2/28 श्लोः&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस पुराण में अन्यत्रा भ ऐसी बात मिलती हैं - कल्कीः कलिकुल नशानार्थाय अवतार: (4/48) अंतिम अवतार की अविभाव का प्रथम उद्देश्य कलियुग में अधर्म - अन्याय पाप को नष्ट करके शांति सुख एवं सत्य धर्म का संस्थापन करना है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पुराणों में अंतिम/कल्की अवतार विषय में वर्णन&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सर्व प्रथम हम पुराणों का अध्ययन करते हैं। इसमें अंतिम अवतार (कल्की अवतार) के सम्बंध में क्या कहा गया है। (कल्की परिचय पुराणों से)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्रथम ब्रह्म पुराण - 213 (अध्याय 164 1/2 - 165 1/2 श्लोः)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल्की विष्णुयशा नाम शम्भल ग्राम सम्भव।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सर्वलोक हितार्थाय भूयो देवो महायशाः।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;(अर्थात विष्णुयश के पुत्रा विष्णुयशा कल्की महायशस्वी देव निखिल लोक कल्याण-मंगल के लिये (सम्पूर्ण सृष्टि के लिये) शम्भल ग्राम में अवतार होंगे।)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;द्वितीय मत्स्य पुराण - 47 अध्याय 248 - 251 श्लोक &lt;/div&gt;&lt;div&gt;तस्मिन्नेष युगे सन्ध्याशिष्टो भविष्यति।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल्की तु विष्णुयशसंः पारश्चर्य पुरसरः।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सर्वश्च भूतांस्तिमितान पाषण्डाश्चैव सव्र्वः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्रगृहीता युथैर्वि प्रैबृतः शतसहस्रशः।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;निःशेषान शुद्र राजस्तु तथा स तु करिष्यति।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ब्रह्माद्विषः सपत्नास्तु संहृव्यैव च तद्वपुः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अष्टविंशो स्थितः कल्कीश्चरितार्थ स सैनिक&lt;/div&gt;&lt;div&gt;शुद्रान संशोधयित्वा तु समुद्रान्तज्व वै स्वयम्।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात युग की सन्ध्या में विष्णुयशा कल्की अवतार होंगे, वह विष्णु यश के पुत्रा होंगे। यज्ञवल्क्य इसका पुराहित होगा, पाखण्ड एवं अधार्मिक राजाओं को समाप्त करने के लिए सैकड़ों हज़ारों ब्राह्मण अस्त्रा धारण करके उस अवतार के साथ चलेंगे। ब्रह्मद्वेषी (ईश्वर विरोधी) को ध्वंस करना इसका मूल उद्देश्य होगा। कलियुग में कल्की अवतार अपना कार्य समाप्त करके सेना के साथ विश्राम करेंगे धर्माचार का संशोधन करके समुद्र के निकट स्थापना करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मत्स्य पुराण - 47 अध्याय 253 श्लोः&lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्रजास्तां साधयित्वा समृद्धास्तेन वै स्वयम्।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात उनके कारण प्रजा को समृद्धि प्राप्त होगी। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;आगे चलकर मत्स्य पुराण 47 - अध्याय 61-62 श्लो एवं कष्टमनु प्रातः काले सन्ध्यांश के तदा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ततः क्षयं गमिष्यन्ति सिर्द्ध कलियुगेन च।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्षीणे कलियुग तस्मिंस्ततः कृतमवर्तत।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - (उस समय अवतार के प्रयाण के बाद धीरे-धीरे पुनः धर्म नष्ट हो जायेगा) कलि सन्धांश में मनुष्य गणों को भयानक दुख कष्ट भोगना पड़ेगा। इसके बाद युग के साथ प्रजा (लोग) भी नष्ट हो जायेगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तृतीय अग्नि पुराण - 16 अध्याय 7 श्लो&lt;/div&gt;&lt;div&gt;धर्म कज्युक संवीता अधर्म रूचसस्तथा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मानुषान भक्षयिष्यन्ति म्लेच्छाः पार्थिव रूपिणः।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल्की विष्णु यशः पुत्रो याज्ञ वल्क्य पुरोहितः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उत्सादयिष्यति म्लेच्छान गृहीतास्त्रा कृतायुधः।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;स्थायिष्यति मथ्र्यादात चातुवर्णे यथोचितम्।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आश्रमेषु च सर्वेषु प्रजाः सद्धर्म वत्र्मनि।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - कलियुग के अंत में मनुष्य धर्म हीन व अधोमिक होगा, उस समय अधार्मिक राजा होकर मनुष्य को खा जायेगा। उस अवस्था में ‘कल्की’ विष्णुयशः के पुत्रा बनकर अस्त्रा धारण करके अधार्मिक को मार डालेंगे। याज्ञवल्वय उनका पुरोहित होगा। पुनः प्रजाओं का संस्थापन होगा, धर्म और सत् कमानुष्ठान में संसार भर जायेगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चतुर्थ - वायु पुराण - 98 अध्याय 104-109 (अग्नि पुराण में जो वर्णन पाये जाते वही वर्णन मिलते हैं)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पंचम श्रीविष्णु पुराण - 3 अंश 2 अध्याय 59 में उल्लेख मात्रा करके 4/24/98 में थोड़ा वर्णन पाया जाता है। लेकिन वह भी अग्नि पुराण के समान है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;षष्ठ महाभारत - वनपर्व 190 अध्याय 93 से 191 अध्याय के 13 श्लोक तक वर्णन है। कल्की विष्णुयशा नाम द्विजः कालप्रचोदित।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उत्पत्स्यते महावीर्यो महाबुद्धि पराक्रमः।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सम्मुतः सम्भल ग्रामे ब्राह्मणावसथे शुभे। अर्थात - कलि युग के अंतिम अंश में, कल्की सम्भल नामक ग्राम में किसी ब्राह्मण के मंगलमय गृह में एक महान शक्तिशाली बालक जन्म लेगा जिसका नाम हेागा विष्णुयशा कल्की। वह महान बुद्धि एवं पराक्रम से सम्पन्न महात्मा सदाचारी तथा प्रजावर्ग का हितैषी होगा। (93 1/2) आगे-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मनसा तस्य सर्वाणि वाहनान्यायु धानि च।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उपस्थास्यन्ति योधाश्च शस्त्राणि कवचानि च।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;स धर्म विजयी राज चक्रवर्ती भविष्यति।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात मन के द्वारा चिंतन करते ही उसके पास अस्त्रा-शस्त्रा, योद्धा और कवच उपस्थित हो जायेंगे वह धर्म विजयी चक्रवर्ती राजा होगा। (94-95) आगे-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;से चेमं संकुलं लोकं प्रसादमुपनेष्यति।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उत्थितो ब्राह्मणो दीप्तिः क्षयान्तकृदुदारधीः।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात वह उदार बुद्धि तेजस्वी ब्राह्मण दुःख से व्याप्त हुए इस जगत को आनंद प्रदान करेगा, कलि का अंत करने के लिए ही उसका आविर्भाव है।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;स्थापयित्वा च मार्यादा स्वयम्भु विहिताः शुभाः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वन पुण्य यशः कर्मा रमणीयं प्रवेक्षति।। (महाः वनः 191/2)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात उनका यश तथा कर्म परम पवित्रा होगा। वे स्वयम्भु से चलायी हुई मंगलमयी मर्यादा (धर्म) को स्थापना करके रमणीय वन में प्रवेश करेंगे। (191/2) आगे तच्छीलम नुुवत्स्र्यन्ति मनुष्या लोक वासिनः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;विप्रैश्चोरक्षये चैव कृते क्षेमं भविष्यति।। (191/3)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - इस जगत के निवासी मनुष्य उनके शील स्वभाव क अनुकरण करेंगे। इस प्रकार ब्राह्मणों द्वार पापी दस्यु गणों का विनाश हो जाने पर जगत का मंगल होगा। (महाः वनः 191/3)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सप्तम - श्रीमद् भागवत पुराण - 12 स्कंध 2 अध्याय 18-2।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सम्भल ग्राम मुखस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भवने विष्णुयशसः कल्की प्रादुर्भविष्यति।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अश्व माशुगमारूध्य देवदत्तं जगव्यतिः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;असिनासाधुदम अष्टैश्रुय श्रुर्य गुणान्वितः।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;विचरन्नाशुना क्षोण्यां हयेनाप्रतिमदयुतिः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नृपलिंगच्छदा दस्युन कोटिशो निहनिष्यति।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;.....। वासुदेवांगरागति पुण्यगन्धानिल स्पशाम्।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात-कलि युग के अंत में, शम्भल ग्राम में विष्णुयशः नाम के एक श्रेष्ठ ब्राहमण होंगे उनका हृदय बड़ा उदार एवं ईश्वर भक्ति से भरा होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उन्हीं के घर में कल्की अवतार का जन्म होगा। वे देवदत्त शीघ्रगामी घोड़े पर सवार होकर दुष्टोका तलवार से दमण करेंगे। सम्पूर्ण जगत के रक्षक कल्की अष्ट एश्वर्य गुण युक्त होंगे। (14-20)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल्की अवतार के शरीर की सुगन्ध वायु को पवित्रा कर देगी। (21)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उप पुराण में वर्णित - पुराण के अतिरिक्त उप पुराण में भी कल्की अवतार का उल्लेख है। इस पुराण का नाम ही कल्की पुराण है। इस पुराण के तीन अंश हैं। इसमें कुलमिलाकर 35 अध्याय हैं। कल्की अवतार विषयक वर्णन ही इस उपपुराण का उद्देश्य है। पहला अध्याय में धर्म के नष्ट होने पर जो भीषण अवस्था समाज में लोगों में होगी उसका वर्णन है। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल्की विष्णुयशसों गृहे प्रादुभावाम्हम्।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सुमत्यां मातरि विभोपत्नीयांत्वन्निदेशतः।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल्की पुराण - 2/4 श्लोक।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;(इस प्रकार परिचय वर्णन 2 अध्याय 10-11 में भी मिलते हैं)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात-शम्भल ग्राम में विष्‍णुयशः के घर में उनकी पत्नी सुमति के गर्भ से उत्पन्न होंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;(इस वर्णन में जन्म समय भी उल्लेख है)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;द्वादशयां शुक पक्षस्य माधवे मासि माधवः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल्की पुराण-15 1/2 श्लो।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात- माधव माह (वैष्णव मतानुसार ’माध’ का महीना एवं शब्दसार कोष ग्रन्थ के अनुसार ‘वैसाख’ का महीना) शुक्ला द्वादशी तिथि के दिन, कल्की अवतार का जन्म होगा। आगे&lt;/div&gt;&lt;div&gt;रत्नत्सरं करालज्व कर वालं महाप्रभम्।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;गृहाण गुरू भारयाः पृथिव्याः भारसाधनम्।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;(कल्की पुराण-3/27 श्लोक।)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात-शिवजी ने कल्की अवतार को एक अश्व (घोड़े) एवं एक रत्नमय तलवार दी थी। आगे-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल्की: कलि कुल नाशनवासनावतारः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;(कल्की पुराण - 3/46 श्लोः)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कलि (अधार्मिक/पापि) कुल नाश करने के कारण ही कल्की अवतार का अविर्भाव होगा। आगे&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चतुर्भिभ्र्रातृभि देव करिष्पामिकलिक्षयम्।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;(कल्की पुराण - 2/5 श्लोक)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - चारों भाई मिलकर कलि (अधर्म) कानाश करने का उल्लेख हैं। आगे-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कल्कि अवतार को देवगणों द्वारा सहायता का भी उल्लेख है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;(कल्कि पुराण - 2/7 श्लोः)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पर्वत गुम्फा में परशुराम द्वारा शिक्षावेद (ईशवाणी) प्राप्त होने का उल्लेख है। कल्की पुराण - 3/1-4) पुराणों के वर्णनानुसार कल्की अवतार के विषय में जो-जो बातें मिलीं वह एक नजर में-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;1. कल्की अंतिम अवतार है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;2. कलियुग प्राय बीत जाने या कुछ बीत जाने पर कल्की अवतार होगा। (इत्यं कलौ गत प्रायो...)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भागः पुराण - 12 स्कंध 2 अध्याय 16 श्लो)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;3. शमभल नामक ग्राम में आविर्भाव होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;4. कल्की अवतार की पिता का नाम विष्णुयश होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;5. कल्की अवतार की माता का नाम सुमति होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;6. कल्की अवतार का पिता श्रेष्ठ ब्राह्मण वंश का होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;7. कल्की अवतार का जन्म समय तिथि का उल्लेख किया है माधव (माघ/वैशाख) महीना के 12 चांद में&lt;/div&gt;&lt;div&gt;8. कल्की अवतार कलि (अधर्म/पाप) को विनाश करके सत्य धर्म की स्थापना करेगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;9. कल्की अवतार की सेनाबल में केवल अस्त्राधारी ब्राहमण ही होगे। (ब्राहमण-ब्रहम-ज्ञ (जाननेवाला)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;10. कल्की अवतार के कारण उस समय प्रजाओं का समृद्धि होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;11. कल्की अवतार सयम्भु से चलाई हुई मार्यादा (धर्म) को स्थापित करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;12. कल्की अवतार के शील (संस्कार) को संपूर्ण जगत अनुकरण करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;13. सम्पूर्ण सृष्टि जगत के मंगल के लिए कल्की अवतार का आविर्भाव है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;14. कल्की अवतार सबको सम्मान देंगे और उन्हें समग्र मनुष्यों से सम्मान प्राप्त होगा। युद्धबन्दि को भी अवतार ने सम्मान दिया। (महाः वनः 191/4-5)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;15. कल्की अवतार  देवता से दिये हुए देवदत्त छोड़े पर सवार होंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;16. कल्की अवतार देवता से दी हुए तलवार लेकर युद्ध में दुष्टों अधर्मी गणों को विनाश करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;17. कल्की अवतार अष्ट (8) ऐश्वर्य गुण युक्त होंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;महाभारत गंन्थ के अनुसार-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अष्टो गुणः पुरुष दीपयन्ति प्रज्ञा च&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कौल्यं च दमः श्रुतं च पराक्रमश्चबहुभाषिता च&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात 1. प्रज्ञा 2. कुलीनता 3. इंद्रिय दमन 4. श्रुतिज्ञान 5. पराक्रम 6. कम बोलना 7. दान करना 8. कृतज्ञता (उपकार करने वाले को न भुलाना)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;18. कल्की अवतार के शरीर से सुगन्ध निकलकर वायु को सुगन्धित कर देगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;19. अधार्मिक जनों के साथ युद्ध में कल्की अवतार को देवगण सहायता करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;20. कल्की अवतार चार भाइयों के साथ कलि (अधर्म/पाप) को विनाश करके सत्यधर्म की स्थापना करेंगे। पौराणिक वर्णन में और एक बात मिलती यह भी ध्यान देने योग्य है। धारणा के अनुसार कल्की अवतार भविष्य है। कलियुग के बिल्कुल अंत में अविर्भाव एवं कलियुग का अंत करके सत्ययुग का प्रवर्तन करना उका कार्य है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब इस धारणा को बदलना है क्योंकि पुराणों की जब रचना हुई उस समय कल्की अवतार वास्तविक भविष्य ही थे। अब भविष्य नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भागवत पुराण के अनुसार (इत्थं कलौ गत प्राये.......) श्लोक के अर्थ में, कलियुग का कुछ भाग बीत जाने पर अर्थ करना ही ठीक है। क्योंकि वायु पुराण में कहा गया है कि कल्की अवतार हानेे से पहले संसार की अवस्था भयानक अधर्म युक्त हो जायेगा, तब कल्की अवतार होंगे और कल्की अवतार प्रयाण के बाद धीरे-धीरे खत्म हो जायेगा एवं युग का अंत होगा। (भाग पु. 12/2/16, मत्स्य पु. 47/253 वायु पुराण-98/120-123)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वास्तविक बात तो यह है कि युद्ध में घोड़े एवं युद्धशस्त्रा में तलवार प्रयोग का जमाना खत्म तो बहुत ही हो चुका है। अब तो परमाणु युद्ध का युग है। अगर आपको कल्की अवतार को अनुसंधान करना है तो ढाल, तलवार घोड़े से युद्ध काल में खोज करना होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अतः अब कल्की अवतार भविष्य नहीं है, अतीत हो गये हैं। कल्की अवतार अविर्भव होकर अपना कार्य सम्पूर्ण करके परम धाम चले गये।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अगर अब भी आप भविष्य समझे हैं तो आप को अंतिम अवतार कल्की को खोज पाना मुश्किल है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यह तो पौराणिक वर्णन है, आगे ‘वेद’ मंत्रा में अनुसंधान करना है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वेद संहिताओं में अंतिम अवतार का अनुसंधान:&lt;/div&gt;&lt;div&gt;‘वेद’ संहिताओं में अंतिम अवतार का अनुसंधान में एक बात ऐसी है कि वेद मंत्रा  एवं पुराणों के श्लोक में जिस प्रकार वर्णन है, उन दोनों के मध्य कुछ अंतर है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जैसे-पुराणों में जिसका वर्णन राजा के रूप में पाया जाता है। वेद मंत्रा में उसको ऋषि के रूप में वर्णन देखा जाता है। वह निम्न प्रकार है-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मान्धाता - एक सूर्यवंशी राजा का नाम ऋक मंत्रा में ऋषि - 10/134 सुक्त&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कक्षीवान - एक क्षत्रिय राजा, ऋक मंत्र में ऋषि - 9/74 सुक्त&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नहुष - एक क्षत्रिय राजा, ऋक मंत्रा में ऋषि 9/101 सुक्त&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पुरुखा - एक क्षत्रिय राजा, ऋक मंत्रा में ऋषि 10/95 सुक्त&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पृथु - एक क्षत्रिय राजा, ऋक मंत्रा में ऋषि 10/148 सुक्त&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ययाति - एक क्षत्रिय राजा, ऋक मंत्रा में ऋषि 9/101 सुक्त&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सुरदास - एक क्षत्रिय राजा, ऋक मंत्रा में ऋषि 10रु133 सुक्त&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पुरु - एक क्षत्रिय राजा, ऋक मंत्रा में ऋषि 5/16 सुक्त&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस प्रकार और भी बहुत से नाम है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दूसरी बात यह है कि पौराणिक एवं वेद संहिताओं के उल्लेख में नामों का भी कुछ अंतर है। जैसा कि जलप्लावन मनु एक विख्यात मनु है। (मनु शब्द द्वारा सन्देष्टा ही समझा जाता है।) सभी पुराणों में इसकी संख्या - 14 है। (विःपुः 3/1-2 अः) ‘मनु’ का कार्य-ईश्वर की प्रेरणा से अपने समय पर बड़ी सावधानी से सब के सब मनु पृथ्वी पर चारों चरण से परिपूर्ण धर्म का अनुष्ठान करवाते हैं। प्रजा पालन और धर्म पालन करते हैं (भाग: 8/14/5-6) ‘मनु’ होकर कोई पैदा नहीं होता। ईश्वर की इच्छा से मनुत्व प्राप्त होता। (भाग 8/24/11)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सातवंे मनु (जल प्लावन मनु) विवस्वान के पुत्रा श्राद्धदेव हुये। (विःपुः-3/1/30 श्लोः) विवस्वान के पुत्रा होेने के कारण श्राद्धदेव कोे वैवस्वत् मनु भी कहा जाता है। भागवत पुराण के अनुसार राजर्षि सत्यव्रत को ईश्वर ने ‘मनु’ बना दिया। (भाग पु. 8/24/11) यह ही सत्यव्रत विवस्वान के पुत्रा श्राद्ध देव हैं। यह सब पौराणिक वर्णन हैं ऋग्वेद संहिता में वैवस्वत एक प्राचीन एवं दीर्घायु ऋषि है। ऋ: 8/27 सुक्त&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तीसरी बात यह है कि वेद संहिता में अवतार शब्द का प्रयोग नहीं है। मंत्रा मंे अवतार समझने के लि अग्नि दूत - (ऋ: 1/12/1, 10/122/5)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अग्नि ऋषि (ऋ 1/31/9) देवदूत - (ऋ 1/36/3) इसके अतिरिक्त नराशंस शब्द के रूप में व्यक्त किय गया है। (ऋः 1/13/3, 1/18/9, 1/106/4, 5/5/2, 7/2/2, 9/5/3, 10/64/3, 10/92/11 सम सं. 1349 मंत्रा यजुः-20/37, 28/19, 28/42, 29/27 एवं अथर्व सं. 5/27/3 आदि में नराशंस का उल्लेख है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ईशदूत के लिए ईश्वर की ओर से सत्य-दर्शन के साथ दूतत्व प्राप्त होती है। कभी ईशवाणी भी प्राप्त होती है। (ऋ 1/164/37-37 मंत्रा)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऐसे तो ‘नराशंस’ का वर्णन-ऋक-साम-यजुः वं अथर्व चारों वेद संहिता में ही मिलते हैं। इसमें से अंतिम/भविष्य नराशंस के लिए वर्णन अथर्व वेद संहिता के 20 काण्ड 127 सुक्त से शुरू है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कौशिक सूत्रानुसार अथर्व वेद में वर्णीत विषयों की संख्या 14 हैं। 1-3 तक विभिन्न विषय वर्णन है और 14वां विषय भविष्य वर्णन है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अतः अर्थव वेद संहिता के 20 काण्ड में जिस सुक्त का अंतिम नराशंस वर्णन है उसका नाम ‘कुन्ताप सुक्त’ है इस सुक्त का भी अत्यंत प्रयोजन है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कुछ पण्डित इसको प्रक्षिप्त मानते हैं। (20/129/136)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्व वेद का और एक नाम ब्रह्मवेद है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;(चारों वा इसे वेदा ऋग्वेदा यजुर्वेदः साम वेदों ब्रह्म वेदः। गोः ब्राः 2/16 एवं उपनिषद में छान्दोग्य-1/7/5)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्व वेद के साथ अन्य सभी वेद जानने वाला ही यज्ञ में प्रधाना पुराहित होता है, क्योंकि एकमात्रा पायश्चित विधान अर्थव वेद में है। (निः 1/3 पाद ऐतरेय ब्राह्मण - 5/5/8, अथर्व वेद का महत्म और वेदों से कम नहीं)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;‘कुन्ताप सुकत’ (अथर्व वेद 20 काण्ड 127-136 सुक्त का नाम है) नाम में जो सूक्त हैं यह भी प्रक्षिप्र नहीं है। ‘कुन्ताप’ शब्द का अर्थ - ‘कुर्यात तप्यते’ अर्थात कुत्सीत पापों को तपा कर नष्ट करने वाला है। इसलिए पापों और अनिष्ट निवारण के लिए पाठ का महत्व लिया गया है। देखिये -&lt;/div&gt;&lt;div&gt;(आश्वलायण श्रौत सूत्रा - 8/3/7-8)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आवहनीय यज्ञ में 12 दिवसीय अनुष्ठान में छठे दिन ‘कुन्ताप’ सुक्त पाठ का उल्लेख मिलता है। ऋक संहिता के ब्राह्मण ‘ऐतेरेय ब्राह्मण 6/5/6-10 तक खण्ड में, ‘कुन्ताप’ सुक्त मंत्रा का प्रयोग है। अतः अथर्व वेद संहिता का 20 काण्ड तथा कुन्ताप सुक्त (127-136 सुक्त) प्रक्षिप्त नहीं हैं। प्रक्षिप्त होता तो यज्ञ में पाठ का उल्लेख प्राचीन ब्राह्मण ऐतरेय में  नहीं होता। यह ऋक वेदसंहिता का ब्राह्मण है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नराशंस शब्द का अर्थ-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;‘नराशंस’ शब्द ‘नर’ एवं आशंस इन दोनों शब्दों को मिलाकर बना है। ‘नर’ शब्दका अर्थ मनुष्य होता है। ‘आशंस’ शब्द का अर्थ प्रशंसित होता है। इसका अर्थ करते समय अगर ‘मनुष्य की प्रशंसा’ किया जाये अथवा ‘मनुष्य द्वारा प्रसंसित’ किया जाये यह दोनों ही ठीक नहीं बैठते है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्योंकि नराशंस सूत्रों में किसी विशेष व्यक्ति की प्रशंसा है। जिसकी प्रशंसा ‘नराशंस’ विषयक  वर्णन है। ‘नराशंस ’  शब्द से उसी का बोध होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अतः ‘नराशंस’ शब्द न तो तृतीया तत्पुरुष है और न तो षष्ठी ततपुरुष, इसको कर्म धारय समास करना है, जिसका विच्छेद-नरश्चासौ आशंस अर्थात ‘प्रशंसित मनुष्य होगा, यह किसी देवता का नाम नहीं है, क्योंकि ‘नर’ देवतावाची शब्द नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भविष्य ‘नराशंस’ के विषय में अथर्व वेद -&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्व वेद संहिता का 20 काण्ड 127-136 सुक्त अर्थात इन 10 सूक्तों का नाम कुन्ताप सुक्त है, यह 20 काण्ड में कुल मिलाकर 142 सुक्त मौजूद है।प्रत्येक सुक्त से पहले ऋषि (वक्ता) देवता (विषय) छंद (उच्चारण का कानून) प्रयोग (व्याकरण) आदि दिया गया है लेकिन कुन्ताप सुक्त (127-136 सुक्त) 10 सुक्त कुल मिलाकर 147 मंत्रा हैं। इन सुक्तों मेंत्रा का कोई ऋषि दवेता छंद एवं प्रयोग उल्लेख नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यह मंत्रा भाववाची होने के कारण भाव अर्थ होगा।1. इंद जनाउप श्रुत नराशंस स्वतविष्यते।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पष्टिं सहस्रा नवतिं च कौरम आ रूषमेषु दद्महे।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्व वेद संहिता 20/127/1 मंत्रा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - हे जनों - लोगों नर (मनुष्य) की प्रशंसा में स्तवन किये जाते हैं, उन्हें सुनो, हे कौरम (कर्मठ नायक) हम 60090 रूशमो (वीरों) से नियुक्त करते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उष्ट्रा यस्य प्रवाहणों वधूमंत्रो द्विर्दश।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वष्र्मा रथस्यनि जिडीडते दिव ईषमाणा उपस्पृशः।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्व वेद संहिता - 20/127/2 मंत्रा&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात ऊंट जिसका वाहन (सवारी) होगा। 12 उनकी वधु होगी, उसके रथ दिवलोक (आसमान) पर पहुंच जायेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एष इषाय मामहे शंत निष्कान, दश स्रजः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;त्राीणि शतान्नार्वतां सहस्रा दश गोनाम्&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्ववेद संहिता - 20/127/2 मंत्रा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - इस (नराशंस) मामह कृषि को सौ निष्क (स्वर्णमुद्रा)  दश स्रज (हारों), तीन सौ अर्वम (अश्व) तथा दश हाजार गौओं का दान दिया जायेगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उपरोक्त मंत्रा में कुछ भाववाची शब्द प्रयोग है, इसका अर्थ कुछ अन्य प्रकार से होता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कोष ग्रन्थानुसार ‘निष्क’ शब्द का अर्थ स्वर्णमुद्रा है। ‘स्रज’ का अर्थ माला है, अर्व/अर्वण का अर्थ घोड़े है। ‘गो’ का अर्थ गाय/वृष होता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब यह देखना है कि प्रसंग के अनुसार अर्थ होता है या नहीं, अगर प्रसंग से समानता नहीं होता है तो भाव प्रकाशक अर्थ ही लेना ठीक है। यह बात सभी विद्वानों को मालूम है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक ही शब्द का आलंकारिक प्रयोग में भाव अर्थ बदल जाते हैं, इसलिये भाव अर्थ प्रयोग, प्रसंग, अवस्था वाक्य से संगती रख कर करना पड़ेगा, नहीं तो अर्थ के बदले अनर्थ हो जायेगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;निष्कः स्वर्णमुद्रा - इहलोक में एक मूल्यवान सम्प्रदा है। यदि किसी मनुष्य की सभी धन-सम्पत्ति नष्ट हो जाये और निष्क (स्वर्ण मुद्रा) उसके पास अधिक हो तो निष्क द्वारा समस्त धन-सम्पत्ति पुनः प्राप्त कर सकता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मंत्रा में परब्रह्म की ओर से 100 निष्क देने का तात्पर्य यह है कि 100 महाज्ञानी परम धार्मिक अनुयायी होगा, क्योंकि अंतिम नराशंस का नष्ट हुए सत्य धर्म पुनः स्थापना ही मूल उद्देश्य है। जैसे निष्क द्वारा नष्ट सम्पदा पुनः प्राप्त होती है। वैसे महाज्ञानी धार्मिक अनुयायी द्वारा नष्ट प्राय धर्म की स्थापना करना होगा। कार्य समानता के कारण निष्क कहा गया है। अगर आप निष्क को निष्क ही समझें तो अंतिम अवतार का महत्व ही खत्म हो जायेगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दशस्रज - स्रज का अर्थ माला, माला; की स्थापना मनुष्य के गले में होता है। यह प्रेम  एवं सम्मान का प्रतीक है। आलंकारिक अर्थ में किसी की निकटता प्रदर्शित करने के लिए माला शब्द का प्रयोग किया जाता है। अतः परब्रह्म की ओर से अंतिम अवतार को 10 ऐसे मनुष्य दिये जो कि माला (हार) के समान सदैव अवतार के साथ रहेंगे। 10 ऐसी मालायें हैं (मनुष्य) जो अवतार को घेर के रहते हैं। अर्व/अर्वा/अवर्ण-वेगवान/दु्रतगति से चलने वाले होता है। इसका अर्थ घोड़ा समझा जाता है। अंतिम अवतार का मूल कार्य धर्म की पुनः स्थापना करना है। वहीं ईशदूत का मूल कार्य भी है। इसलिए यहां पर वास्तविक वेगवान सवारी का उद्देश्य नहीं है। धर्म संस्थापन कार्य को द्रुत गतित से आगे बढ़ाने के लिये जिन लोगों ने पहले अवतार का साथ दिया उन्हें अवर्ण (तेज/दु्रत चलने वाले) कहा गया है। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;त्राीणिशता: इस शब्द के द्वारा 300 अथवा 300 से अधिक परंतु 400 से कम संख्या समझी जाती है। उदाहरण जैसा-सप्तशती शब्द को देखे जो कि 700 या 700 से ज्यादा से कम संख्या के लोग पहले अंतिम अवतार का साथ देंगे, दशहाजर गौ-गौ/गो शब्द में बहुत अर्थ होता है इसमें से एक अर्थ किरण अर्थात प्रकाश है। वेद मंत्रा में सूर्य किरण को गो कहा है। (ऋ 1/84/15 एवं 1/54/6 देखे।)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;रश्मि/किरण का भाव अर्थ में ज्ञान लिया जाता है। कारण वही है कार्य समानता ही कारण है। किरण भी अंाधार को मिटाता है। ज्ञान भी अज्ञान आंधार को मिटाता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;(गो के अर्थ में मनुष्य भी होता है - शतः ब्राः - 12/9/1/4) अतः 10,000 धर्म ज्ञानी या ब्रह्मज्ञानी नराशंस ऋषि मामह के साथ होंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ईशदूत के विषय में कहा गया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वच्यस्व रेभ वच्यस्व वृक्षेन पक्के शकुनः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नष्टे जिह्वा चर्चरीतिक्षुरो न भुरिजोरिव।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्व वेद संहिता - 20/127/4 मात्रा&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - हे रेभ (ज्ञान युक्त पवित्रा ऋ 9/96/6, 10/92/15 ऋचा - 10/85/6 देखें) अर्थात ईशवाणी का पाठ करने वाले/पाठ करो। ओष्ठ और जिहवा दु्रत गति चले जैसे पक्के फल वाले पेड़ में पक्षी की चोंच।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्र रेभासो मनीषा वृषा गावइवेरते।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अमोत पुत्राका एषाममोत गाइवासते।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्व वेद संहिता - 20/127/5 मक्ष&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - ईशवाणी पाठ करने वाला शक्ति सम्पन्न वृषभों के समान गतिमान होगा। इनका गृह सुसन्तान एवं गवादि पशुओं से युक्त होगा। (आगे विश्वास की बात है।)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्र रेभ घीं भरस्व गोविंद वसुविदम।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;देवत्रोमां बाचं श्रीणीहीषुर्नावीरस्तारम्।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्व वेद संहिता 20/127/6 मंत्रा&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - हे ईशवाणी पाठ करने वाले आप गो धन (स्वर्गधाम) प्राप्त करने वाले ऐश्वर्य सम्पदा की प्राप्ति के मूल प्रेरक बुद्धि को धारण करें। अर्थात ईश्वर पर विश्वास को मजबूती से धारण करें। वाण जैसा धनुष चलाने वाले को रक्षा करता है, उसी प्रकार वाणी (ईश्वाणी) आपको संरक्षण प्रदान करेगा। देवता/ईश्वर की समीप आप ईशवाणी को पाठ करें। (अवतार का कार्य)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इन्द्रः कारूमबुबुध्दुत्रिष्ट वि चरा जनम।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ममेदुग्रस्य चर्कृधि सर्व इत् ते पृणादरिः।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्व वेद संहिता 20/127/11 मात्रा&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - इंद्र देव (ईश्वर - ऋ 1/164/46)  ने प्रिय स्तोता (अवतार) को प्रेरित किया कि वे उठ खड़े हो जाये और जन-जागरण हेतु समाज में विचरें। उग्र स्वभाव (अधाार्मिक) वाले भी एक मात्रा इंद्र (ईश्वर) की स्तुति करें, सभी विरोधी आपके सामने आत्मसमर्पण करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;‘‘उप नो न रमसि सुक्तेन वचसा वयं भ्रदण वचसा वयम वनादधिध्वनो गिरो न रिष्येम कदा चन।।’’&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थव वेद संहिता - 20/127/14 मंत्रा&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात् - हे इंद्र देव (ईश्वर/परब्रह्म) हम आपको कल्याणकारी वाणी (ईशवाणी) द्वार तुष्ट करते हैं। हम आपको सुक्त मंत्रा (ईशवाणी) द्वारा उपासना करते हैं आप अंतरिक्ष से हमार प्रार्थना का श्रवण करें हम सब कभी विनष्ट न हों।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कंुताप सुक्त के अंतर्गत नराशंस ऋचा 30 मंत्रा माना जाता है। ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार कुन्ताप सुक्त में कुल 127-136-10 सुक्त तथा 147 मंत्रा है। इसमें से पहला 30 मंत्रा को नराशंस ऋचा कहा गया है। (तत्रा कुन्तापाध्याये बादौ नाराशंस्यस्तिस्त्राः, ऐतरेय ब्राह्मण - 6/5/6 मंत्रा)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;30 मंत्रों में से 14 मंत्रा 127 सुक्त  एवं 128 में 16 मंत्रा है। इन दोनों सुक्त (अध्याय) में से 127 को देखा गया है। इसमें बहुत बातें मिलती हैं 128 में भी अंतिम अवतार नराशंस कल्की की कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्ववेद संहिता - 20 काण्ड 128 सुक्त इस सुक्त में कुछ नीति परक मंत्रा है। जैेसे-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जो जाम्या अप्रथयस्तद् यत् सखायं दुधूर्षति।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ज्येष्ठो यद प्रचेतास्तदाहुरथरागिति।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्ववेद संहिता - 20/128/2 मंत्रा&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - जो लोग स्त्रिायों के साथ  दुव्र्यवहार करते हैं। मित्रों को हानि पहुंचाते हैं और श्रेष्ठ होकर भी दुष्ट स्वभाव वाले होते हैं ऐसे मनुष्यों कापतना हेागा। (स्वर्ग से पतना हो तो नरक में गिरेगा)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यश्श्रपाि रघुजिष्ठयो यश्च देवां, अदाशुरिः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;धीराणां शश्रतामहं तदपागिति शुश्रुम।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्ववेद संहिता 20/128/4 मंत्रा&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - जो वणिक (उपार्जन करने वाला) स्वयं उपभोग करता है लेकिन देव उद्देश्य में दान की भावना से रहित है। वह धार्मिक होकर भी पतित होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ये च देवा अयजन्ताथो ये च पयददिः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सूयी दिवमिव गत्वाय मधवा नो वि रप्शते।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्व वेद संहिता - 20/128/5&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात जो स्त्रोतागण (परब्रह्म की प्रसन्नता करने वाले)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ईश्वर (परब्रह्म/सृष्टिकर्ता) की उपासना करते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दूसरों को दान देते हैं। वह लोग सूर्य के समान शोभा धारण करके स्वर्ग में स्थान प्राप्त करते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दोनों महत्म पुर्ण घटना का उल्लेख।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यदिन्द्रादो दाशराज्ञे मानुषं वि गाहथाः।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;विरूप: सर्वस्मा आसीत सह यक्षाय कल्पते।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्व वेद संहिता - 20/128/12 मंत्रा&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात् - हे इंद्र देव (अंतिम अवतार नराशंस) ही इंद्र शब्द का उद्देश्य है। कुंताप सुक्त मं पहला 30 नाराशंस ऋचा है, इस मंत्रों में किसी देवता की प्रशंसा नहीं, केवल नराशंस विषय का ही वर्णन है। इंद्र शब्द में अंतिम अवतार ही समझना है। अतएव इसका अर्थ निम्न प्रकार है। हे इंद्र देव (अंतिम अवतार), आपने दासराज के साथ युद्ध में प्रवेश करके आपने मनुष्यों को मथ डाला, इसी युद्ध के बाद आप सभी के लिए सम्माति हुए, ईश्वर ने यक्ष (एक प्रकार बलशाली देवता) को भेजा था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक बात स्मरण रखना है कि अतीत के रूप में वर्णन किया गया मूलतः भविष्य वर्णन ही है। साधारण में दास/दाश शब्द में कृतदास, नौकर आदि अर्थ समझा जाता है, धार्मिक संदर्भ मंे इंद्रियों को दास का भी ‘दास’ कहा गया है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस स्थान पर वेद संहिता में दस्यु, अनार्य, अधार्मिक आदि अर्थ किया है। (ऋ-2/12/4, 3/34/4, 4/16/3, 10/22/8, 10/49/3, 10/102/3, 10/69/6 आदि देखे।)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - दास राज का अर्थ दस्यु/अधार्मिक गणों या अधार्मिक राजा के साथ युद्धों में देवता उतर आयेंगे। इस युद्ध में जय लाभ के वाद अवतार का सम्मान बढ़ जायेगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पृष्ठं धावन्तं हर्योरौच्चैः श्रवसमब्रवन।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;स्वस्त्यश्व जैत्रायेन्द्रमा वह सुस्रजम्।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अथर्व वेद संहिता - 20/128/15 मंत्रा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - हे दु्रतगामी उच्चै: श्रवा (यह इंद्र अर्थात ईश्वर के परवाले घोड़े का नाम है) सभी के कल्याण के लिए मालाधारी इंद्र (अवतार) को यहां लाओ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अंतिम ऋक 128 सुक्त में कहा कि अजश्रवा (यह उसी घोड़े का नाम है) मालाधारी इंद्र (अवतार) को लेकर अनुकूलता के साथ और भी शुभ्रता प्राप्त हुए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इसके साथ नाराशंस ऋचा का 30 मंत्र समाप्त होता हैं। आगे कुन्ताप सुक्त का 117 मंत्रा है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उस मंत्रा के साथ नराशंस का सम्बंध नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अंतिम नराशंस/अंतिम अवतार के विषय में अथर्व वेद संहिता में भविष्य वाणी के रूप में जो बाते मिली हैं, वह एक नजर में-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;1. नराशंस ऋषि (अवतार) को परब्रह्म की ओर से नियोग का उल्लेख है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;2. नराशंस ऋषि (अवतार) को 60.090 कर्मठ वीरों से चुना गया है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;3. नराशंस ऋषि (अवतार) की सवारी में ऊंट प्रधान होगा,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;4. नराशंस ऋषि (अवतार) की 12 वधुएं होंगी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;5. नराशंस ऋषि (अवतार) की कार्य महिमा स्वर्ग तक पहुंच जायेगी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;6. नराशंस ऋषि (अवतार) का और एक नाम मामह है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;7. नराशंस ऋषि (अवतार) के साथ 100 महान, ब्रह्माज्ञानी 300 से&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कुछ ज्यादा या 300 होंगे। पहला साथी मुख्य सहयोगी होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;10. अतिप्रिय साथी तथा 10,000 ब्रह्मज्ञानी साथ होंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;11. नराशंस ऋषि (अवतार) पर ईशवाणी उतरेगी। पढ़ने का आदेश होगा। द्रुत पढ़ने का उल्लेख है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;12. नराशंस ऋषि (अवतार) को मिला स्त्रोत्रा (ईशवाणी) पाठकारी को ज्ञान, स्वर्ग, धन पुत्रा-सम्पत्ति आदि प्राप्त होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;13. नराशंस ऋषि (अवतार) अनुगामी केलिए कहा गया कि ज्ञान स्वर्ग धनादि प्राप्ति के कारण मूल प्रेरक बुद्धि (विश्वास) को धारण करे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;14. नराशंस ऋषि अंतिम अवतार जगत का हितकारी है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;15. नराशंस ऋषि अंतिम अवतार को परब्रह्म ने भेजा है कि वह जन जागरण के लिए समाज में घूमे (अर्थात विचरे) क्योंकि जितने अधार्मिक जन हो वह सभी एक ईश्वर पर विश्वास रखें।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;16. नराशंस ऋषि अंतिम अवतार के पास सभी विरोधी आत्मसमर्पण करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;17.  नराशंस ऋषि अंतिम अवतार अधार्मिक दस्युयो से युद्ध के समय देवताओं की सहायता प्राप्त होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;18. नराशंस ऋषि (अंतिम अवतार) के अनुगामी स्त्रोताओं के नष्ट न होने का उल्लेख है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;19. नराशंस ऋषि (अंतिम अवतार) के सम्पूर्ण जगत के कल्याण के लिये उच्चेश्रवा घोड़े से ईश्वर द्वारा अपने पास यले जाना।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इसके साथ कुछ नीति (नियम-व्यवहार) का उल्लेख मिलता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वेद संहिता के वर्णन के साथ पौराणिक वर्णन में विरोध नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वेद पुराणों में समानता और अंतिम अवतार का विशेषतायें -&lt;/div&gt;&lt;div&gt;1. प्रथम-पुराणों में प्राचीन श्रीविष्णुपुराण को माना जाता है। इस पुराण के अनुसार कल्की अवतार का जन्म स्थान ‘‘शम्भल’’ कहा गया है। (वि.पु. 4/24/98)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span&gt;अन्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुराणों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वेद में तो किसी स्थान का उल्लेख ही नहीं है लेकिन सवारी को बता दिया कि ‘उष्ट्र प्रवाहनों यस्स’ अर्थात जिस स्थान मंे सवारी के रूप में ऊंट ही प्रधान माना जाता है अर्थात रेगिस्तान भू-भाग, इसके साथ शम्भल अर्थ जोड़ने पर समाधान हो जायेगा। ‘रलयोरभेद’ इस सूत्रानुसार सम्भल/शम्भर एक ही शब्द माना जाता है। अतः शम्भल किसी ग्राम/स्थान का नाम नहीं, यह तो किसी स्थान का विशेषण है। विशेषण के रूप में अर्थ जल के समीपवर्ती स्थान या ग्राम होगा। अर्थात - अंतिम अवतार का जन्म स्थान जल के समीपवर्ती कोई मरूस्थान है, जहां अधिकतर ऊट का प्रयोग होता होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;2. समय - अंतिम अवतार का समय, जब युद्ध में अस्त्रा के लिए ढाल तलवार, वाहन (सवारी) के रूप में घोड़े आदि का प्रयोग होता था अर्थात कलि युग का ढाल तलवार का समय है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;3. अंतिम अवतार की 12 वधुए होना।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;4. ईशवाणी प्राप्त होना। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;5. अधार्मिक गणों के साथ युद्ध होना। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;6. युद्ध में देवताओं की सहायत प्राप्त होना। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;7. उच्चैःश्रवा घोड़े पर सवार हो कर परब्रह्म से साक्षात करना।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;8. कल्की अवतार/अंतिम अवतार में अष्ट गुण होंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;1. प्रज्ञा, 2. कुलिनता, 3. इंद्रियां दमन, 4. श्रुति ज्ञान, 5. पराक्रत, 6. कम बोलना, 7. दान करना, 8. कृतज्ञता (उपकार करने वाले को न भूलना)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यह तो अंतिम अवतार की खास विशेषताएं हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब देखना यह है कि कल्की अवतार दावा करने वाले में किस के साथ उपरोक्त विशेषताएं पायी जाती हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अंतिम अवतार का दाव करने वालों में अनुसंधान -&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आज तक अंतिम या कलियुग का अवतार होने का दावा अनेक व्यक्तियों ने किया है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऐसे &lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span&gt;अवतार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दावेदारों&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;में से कुछ का उल्लेख निम्न में किया जाता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;1. प्रथम उल्लेख में एक निष्कलंकी दल नाम में एक संस्था है। इसके संस्थापक बालमुकुन्दजी कहे जाते हैं। वह भारत के निवासी हैं, उनके अनुयायी उनके अवतार होने की प्रतिक्षा में हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;2. ठाकुर दयानन्द का ‘‘अरूणा चल मिशन’’ यह मिशन आसाम राज्य के सिलचर नामक स्थान में 1909 में स्थापित किया गया था। उन्होंने स्वयं तो अवतार होने का दावा नहीं किया किन्तु अनुयायी गणों ने माना, वह मिशन आज भी चल रहा है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;3. मात आनन्दमयी - इनको हजारों लोग आदि शक्ति जगदम्बा का अवतार मानते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;4. मध्य प्रदेश वर्धा के सत्य समाज के संचालक स्वामी सत्य भक्त जी अवतार बन गये थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;5. ब्रह्मकुमारियों के दादा गुरू-दादा लेखराज जिनका पूर्व नाम खूब चंद्रकृपलानी था। 1937 में आम मण्डली नाम की संस्था की स्थापना की। उन्होंने स्वयं ही ब्रह्मा विष्णु आदि होने का दावा किय था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;6. कृष्णानन्द जी दादा धुनी वाले ने अपने आपको शंकर जी का अवतार कहा था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;7. स्वामी प्रणवानन्द जी भी अवतार बन बैठे थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;8. हंसावतार - इनके समन्ध में इनके प्रचारकों का कहना है कि जो त्रोता में राम, द्वापर में कृष्ण, वही भगवान अब हंसावतर है। (कल्कि पुराण भूमिका से)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अन्य और दावा करने वाले&lt;/div&gt;&lt;div&gt;9. आनन्द मार्ग करने वाले&lt;/div&gt;&lt;div&gt;10. अखिल ब्रह्माण्ड पति&lt;/div&gt;&lt;div&gt;11. सत् संघ आश्रम श्री अनुकूल चंद्र ठाकुर, थोड़ा आगे देखें तो-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;12. सीता राम ओंकार नाथ,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;13. श्री राम कृष्ण परमहंस देव ठाकुर।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;14. श्री लोक नाथ ब्रह्मचारी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;15. बालक ब्रह्मचारी, आदि को लेकर अवतार मानते थे। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऐतिहासिक रूप से समाज में प्रेम-भक्ति का जो विचार लाया था उनका नाम&lt;/div&gt;&lt;div&gt;16. श्री कृष्ण चैतन्य था, आज तक वैष्णव सम्प्रदाय उनके ही कलियुग का अवतार मानता है। इनका पूर्व नाम निमाइमिश्र, पिता जगन्नाथ मिश्र, माता शची देवी, जन्म स्थान बंगाल के नदीया जिले में।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वर्तमान समय में नकली अवतारों की संख्या बहुत है। नकली अवतार का दावा करने वाले केवल कलि युग में ही नहीं द्वापर युग में भी अवतार का दावा करनेवाले भी थे। (देखें भागवत पु. - 10/66/अ.)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अंतिम अवतार का दावा पेश करने में एक व्यक्ति बड़ी जोर शोर के साथ खड़ा हुआ वह मुसलमान घराने में पैदा हुआ उनका परिचय: वह पंजाब के गुरूदास पुर, जिला कादियां का मिर्जा गोलाम अहमद है। आश्चर्य की बात तो यह है कि बहुत से हिन्दू-मुसलमान उसको अवतार मानने लगे हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऊपर कहे गये तमाम दावेदार झूठे अवतार हैं, यह कहने के लिए विचार का प्रयोजन नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बौद्ध समाज में अनुसंधान&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अंतिम अवतार जबकि समग्र जगत के लिए अवतार होते हैं तो पृथ्वी में किसी भी सम्प्रदाय एवं किसी भी स्थान पर हो सकता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जब हिन्दू समाज में न मिले तो चलिए बौद्ध समाज में अनुसंधान कर लिया जाये-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बौद्ध सम्प्रदाय में गौतम बुद्ध की वाणी के अनुसार उने बाद एक अंतिम बुद्ध होगा। जिसका नाम मैत्रोय होगा। वह जगत को शिक्षा देकर ऐसा मार्ग देखायेगा जो शुद्ध एवं पूर्ण होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अतः यह समाज भी प्रतीक्षा कर रहा है कब अंतिम बुद्ध मैत्रेय का आविर्भाव होगा। अब तक इस समाज में किसी ने अंतिम बुद्ध होने का दावा नहीं किया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आर्य क्षेत्र तथा आर्य सम्प्रदाय में न मिले तो अनार्य/म्लेच्छ सम्प्रदाय तथा पृथ्वी के अन्य स्थान में अनुसंधान करना है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऐसा करने के दो कारण हैं। जैसे -&lt;/div&gt;&lt;div&gt;1. वेदपुराणों मं वर्णन के अनुसार ‘अंतिम अवतार का जन्म स्थान रेगिस्तान भू भाग होगा। जो जल (समुद्र) के समीप हो। भारत में रेगिस्तानी भूभाग तो है जैसे राजस्थान में ‘थार’ लेकिन जल के समीप नहीं। अतः पृथ्वी से दक्षिण ओर (पं. गिरिश चंद्र विदयारत्न) जल के समीप किसी रेगिस्तानी भू भाग में अंतिम अवतार का अनुसंधान करना है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;2. दूसरा कारण यह है कि जब आर्यों में आज तक अंतिम अवतार का आविर्भाव नहीं हुआ तो ऐसा भी हो सकता है कि म्लेच्छ कुल मं आविर्भाव हुआ है। इस का सम्भावना के एक से अधिक कारण है। 1. अंतिम अवतार सम्पूर्ण विश्व के लिए अवतार है तथा समग्र मनुष्य जाति में से किसी भी लिए अवतार है तथा समग्र मनुष्य जाति में से किसी भी सम्प्रदाय में जन्म हो सकता है। 2. ईश्वर की दृष्टि में सत्य-असत्य तथा धर्म-अधर्म का ही भेद है, मनुष्य दृष्टि जैसा जाति वर्ण-भाषा सम्प्रदाय आदि भेदाभेद नहीं हैं। इस कारण किसी सम्प्रदाय में जन्म हो सकता है। 3. मनुस्मृति 10/43-44 श्लोक के अनुसार क्षत्रीय उपनयन संस्कार (जनेऊ) का लोप एवं वेद त्याग करने के कारण क्षत्रीयोंगण शुद्र/म्लेच्छत्व प्राप्त हुए, जैसा कि पौण्डक, औड़, द्रविड़, चीन कम्बोज यवन, शक, पारद, पल्लव आदि जाति इन सभी का वैदिक संस्कार नहीं है। इसलिए म्लेच्छ भी कहा जाता है। (वेदाचार हीन म्लेच्छ है-(अगर कोष-2/56, शब्दसार-पं. गिरिश चंद्र विद्यारत्न) अर्थात म्लेच्छ अनार्थ नहीं है। श्री विष्णुपुराण 4/10/1-6 श्लोक के अनुसार नहुष राजा के 6 पुत्रों में से ‘ययाति’ राजा हुए थे। विष्णु पुराण 4/17 अध्याय के अनुसार ययाति के 5 पुत्रों में से द्रुहयु वंश वर्णन में द्रुहयु वंश को म्लेच्छा वंश कहा गया है। अतः म्लेच्छ वंश मूलतः क्षत्रिय का वंश है, इसलिये अवतार इस वंश में भी आ सकते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;4. 18 महापुराणों में से एक पुराण का नाम भविष्य पुराण है, इस पुराण में प्रतिसर्ग पर्व तृतीय खण्ड-तृतीय अध्याय में महामद नाम के एक ईशदूत का उल्लेख मिलता है। इसको म्लेच्छ आचार्य भी कहा गया है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;5. अल्लोपनिषद नाम से एक उपनिषद है। इस उपनिषद का श्रीलक्ष्म्युपनिषद भी कहा जाता है। इस उपनिषद के 6 एवं 9 मंत्रा में महमद शब्द का उल्लेख रसूल के रूप में अर्थात अवतार के रूप में पाया जाता हैं। (हांस, अल्लाह़रसूऱमहमदरक वरस्य, अल्लो अल्लाम।(अल्लोपनिषद 6 मंत्रा) एवं हरिओम, अस्य इल्लाम इल्लाले मित्रा वरूणो राजा पुनर्दध्यु हवयानि मित्रो इल्लां कवर इल्लां रसुरमहमदकमंवरस्य अल्लेअल्लो पुनदध्युः। अल्लोपनिषद 9 मंत्रा) पं. गिरिश चंद्र विद्यारत्न के शब्दसार में अल्ला शब्द का अर्थ है परम देवता (ईश्वर किया है)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उपरोक्त कारणों में भविष्यपुराण तथा अल्लोपनिषद में कहा गया महामद नाम में म्लेच्छ आचार्य (जो इस्लामिक समाज में पैगम्बर हजरत मुहम्मद सल्ल. हैं) का अनुसंधान करना है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span&gt;अंतिम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अवतार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हजरत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुहम्मद&lt;/span&gt; (&lt;span&gt;सल्ल&lt;/span&gt;.) &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 102, 255);font-size:130%;" &gt;&lt;span&gt;अंतिम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अवतार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धारणाएं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एवं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समानताएं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;1.नामगत साम्य: पुराणों में कल्की अंतिम अवतार का नाम है। इसका काारण कल्की पुराण 2/28 श्लोक में कहा गया है कि कलियुग का कल्कि (अधर्म/पापों) का विनाश करके सत्य धर्म संस्थापन करने वाला है। अतः कल्की एक गुण् वाचक नाम है, जो कि वह ईशदूत समझा जाता है जिनके द्वारा कलियुग का शेषांश में अधर्म को मिटाकर सत्य धर्म संस्थापन होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वेद संहिता में नराशंस नाम का उल्लेख है। जिसका अर्थ प्रशंसित नर (मनुष्य) है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वैसे ही हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के नाम में महम्मद शब्द भी गुणवाचक शब्द है। अरबी भाषा के अनुसार हम्द शब्द से महम्मद शब्द बना है। हम्द का अर्थ प्रशंसित है। नामगत साम्य के साथ और भी एक समानता है कि कल्कि भी अंतिम अवतार है, महम्मद (सल्ल.) भी अंतिम पैगम्बर या अंतिम सन्देश वाहक हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;2. स्थान गत साम्य: अंतिम अवतार नराशंस कल्की का अविर्भाव पृथ्वी के दक्षिण ओर किसी जल (समुद्र) के समीप रेगिस्तानी भू-भाग में होने की बत कही गयी है, वेदानुसार यहां पर ऊंट का प्रयोग अधिक मात्रा में होगा। हजरत मुहम्मद (सल्ल.) जल के समीप रेगिस्तानी भूभाग अरब देश के मक्का में पैदा हुए थे। यहां पर ऊंट का प्रयोग अधिक है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;3. काल/समय: वर्णन के अनुसार कल्की अवतार का उस समय अविर्भाव होगा जब युद्ध में सवारी घोड़े एवं अस्त्रा में ढाल-तलवार आदि का प्रयोग होता था अथवा भागवत पुराण के अनुसार कलियुग कुछ बीत जाने पर (12/2/16 श्लोः) कल्की अवतार का समय है। इस हिसाब से आज से प्राय 1400 साल पहले युद्ध में तलवार आदि अस्त्रा एवं घोड़े आदि का प्रयोग होता था। वही कल्की अवतार का समय है। हजरत मुहम्मद (सल्ल.)  उसी ढाल-तलवार से युद्ध करने के जमाने में ही पैदा हुए थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;4. माता-पिता का परिचय में साम्य: वेद संहिता में तो इसका उल्लेख नहीं है लेकिन पुराणों में पिता विष्णुयश एवं माता सुमती कहा गया है। विष्णुयश-इसका अरबी में बदल दिया जाये तो विष्णु-अल्लाह, यश-प्रशंसा करने वाला भक्त अर्थात अरबी में बंदा कहा जाता है, इस प्रकार अल्लाह का बंदा-अब्दुल्लाह, माता-सुमति-सुंदर शांति मनवाली स्त्री, अरबी में आमिना कहा जाता है। हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की मा-बाप का नाम वही था पिता अब्दुल्ला एवं माता का नाम आमिना था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;5. श्रेष्ठ ब्राहमण वंश में जन्म होना - हजरत मुहम्मद (सल्ल.) अरब देश के मक्का शहर में कुरैश वंश े हाशिम गोत्रा में जन्मे इस वंश के  दायित्व मक्का को प्रधान उपासना गृह काबा के पुरोहित थे। यह सभी वर्णन हजरत महम्मद (सल्ल.) पर सत्यापित होता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;6. अंतिम अवतार 8 गुणों युक्त होंगे - जैसा कि 1. प्रज्ञा, 2. कुलिनता, 3. इंद्रिय दमन, 4. श्रुति ज्ञान, 5. पराक्रम 6. कम बोलना, 7.  दान करना, 8. कृतज्ञता।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्रज्ञा: परोक्षा ज्ञान, वह ज्ञान मुहम्मद (सल्ल.) का एक महान गुण था, इसी कारण भूत-भविष्य वर्तमान को बताते थे। प्रमाण 627 ई. में युद्ध में रूमियों के विजयी होने की बात मुहम्मद (सल्ल.) न 9 वर्ष पहले बता दी थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कुलीनता: मुहम्मद (सल्ल.) ऐसे कुलीन थे कि उस समय मक्का के कुरैश गोत्रा के हाशिम वंश में जन्म हुआ था। जिसे उनका गोत्रा को अरब में सर्वश्रेष्ठ माना जाता था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इंद्रिय दमन: मुहम्मद (स.) के विषय में सम्पूर्ण इस्लामी इतिहास तथा अन्य धर्म के विद्वानों का कथन है कि इंद्रिय-दमन उनका एक महान गुण था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्रुत: ईश्वर द्वारा सुनाया गया एवं ऋषि/अवतार द्वारा सुना गया हो उसी को श्रुत कहा जाता है जिस कारण ‘ईशवाणी’ की और एक नाम ‘श्रुति’ है। हजरत मुहम्मद (सल्ल.) में यह गुण होने का प्रमाण कुरआन मजीद नाम के ईश्वरीय गं्रथ है जो कि देवता (फरिश्ता) द्वारा सुनाया गया एवं मुहम्मद (सल्ल.) द्वारा सुना गया। यह ही अंतिम ईश ग्रंथ है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पराक्रम: वीरता, महम्मद (सल्ल.) उस समय एक ऐसे वीर थे, जिन्होंने पहलवान रूकाना को दो बार परास्त किया, इस कारण कोई भी वीर मुहम्मद (सल्ल.) का सामना करने का साहस  नहीं रखता था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कम बोलना: सम्पूर्ण इस्लामी इतिहास में यह प्रमाण है कि मुहम्मद (सल्ल.) अधिकतर मौन रहा करते थे जब बोलते तो कम शब्दों में ही सबको प्रभावित कर लेते।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दान करना: दान करना धर्म का एक महत्वपूर्ण अंग है एवं सर्ववादि द्वारा सम्मत है। हजरत महम्मद (सल्ल.) ऐसे दानी थे, कि उनके घर में गरीब दुखियों की भीड़ लगी रहती थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कृतज्ञता - अपने साथी किये गये उपकार को नहीं भूलना। मुहम्मद (सल्ल.) की कृतज्ञता को कोई भी इतिहास कार अस्वीकार नहीं कर सकता। सर्वप्रथम साथ देने वाले 313 साथी एवं सबसे पहले सहायता करने वाले अंसार के विषय में कहे गये वाक्य ही प्रमाण देंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;9. शरीर में सुगंध निकलना: भागवत पुराण के अनुसार कल्की अवतार के शरीर से सुगंध निकलने का वर्णन मिलता है। वह बात हजरत मुहम्मद (सल्ल.) पर ही घटित होती है। मुहम्मद (सल्ल.) के शरीर की सुगंध तो प्रसिद्ध है। (भागवत पुराण - 12/2/21 शिमाएल त्रिमिजी - अनुवाद मो. जकरिया पृ. 208)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;10. देवदत्त घोड़े पर सवार होेना: भागवत और कल्की पुराण में देवता से दिये गये घोड़े पर सवार होने का वर्णन मिलता है। इसके साथ वेद संहिता में भी देव अश्व उचैः श्रवा पर सवार होने का उल्लेख है। जगत के मंगल के लिए उस घोड़े पर सवार होकर अंतिम अवतार ईश्वर के पास गये थे। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के पास देवदत्त अश्व (बुर्राक) भेजकर ईश्वर ने अपने पास बुलाया था। (स्पमि व िडनींउउंक इल ैपत ॅपससपंउ डनसतण्च्ण्125)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;11. युद्ध में देवों द्वारा अंतिम अवतार का सहायता प्राप्त होना और युद्ध विजित करना (कल्की पु.-2/7 एवं अथर्व संहिता 20/128/12 मंत्रा) इसी वर्णन के अनुसार महम्मद (सल्ल.) की सहायता के लिये युद्ध में फरिश्तों ने उनकी सहायता की थी। उसी युद्ध के पश्चात इस्लाम तेज गति से बढ़ना आरम्भ हुआ। (सूरा-आल इमरान - 123-125 आ)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वेद संहिता से प्राप्त विषय&lt;/div&gt;&lt;div&gt;12. ऊंट सवारी होना - मुहम्मद (सल्ल.) ऊंट की सवारी पसंद करते थे। ऊंट पर सवर होकर मक्का से मदीना गये थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;13. 12 वुधुओं वाला बताया गया - अथर्व वेद संहिता 20/127/2 मंत्रा में अंतिम अवतार का 12 पत्नियों का उल्लेख है। हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की 12 पत्नियां थी। जैसे - निम्न प्रकार कहा गया -&lt;/div&gt;&lt;div&gt;1. हजरत मुहम्मद (सल्ल.) का पत्नी खदीजा (राः) खुवैलिद की पुत्री थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;2. हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की पत्नी सौदः (राः) जमअः की पुत्री थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;3. हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की पत्नी आएशा (राः) अबूबक्र की पुत्री थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;4. हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की पत्नी हफसा (राः)  उमर की पुत्री थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;5. हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की पत्नी जैनब (राः) खजोम की पुत्री थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;6. हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की पत्नी उम्मे सलमा (राः) अवी उमय्या की पुत्री थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;7. हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की पत्नी जैनब (राः) जहरा की पुत्राी थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;8. हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की पत्नी जुवैरिया (राः) हारिस की पुत्री थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;9. हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की पत्नी रैहाना (राः) शमगन की पुत्राी थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;10. हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की पत्नी उम्मे हबीबा (राः) अबू सुफियान की पुत्राी थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;11. हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की पत्नी सफिया (राः) हययी की पुत्री थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;12. हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की पत्नी मैमूना (राः) हारिस की पुत्री थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;12 पत्नी वाली बात भी मुहम्मद (सल्ल.) पर ही घटित होती है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;14.   10 मालायें - 10 अतिप्रिय साथी जैसा -&lt;/div&gt;&lt;div&gt;1. अबू बक्र बिन अबू कहाफा, 2. उमर बिन खत्ताब&lt;/div&gt;&lt;div&gt;3.  उस्मान बिन अफफान 4. अली बिन आबूतालिब&lt;/div&gt;&lt;div&gt;5. तलहा बिना अब्दुल्लाह 6. जुबैर बिना अव्वाम&lt;/div&gt;&lt;div&gt;7. सअद बिन अबू वक्कास 8. सई बिन जैद&lt;/div&gt;&lt;div&gt;9. अब्दुर्रहमान बिन औफ 10. अबू उबैदह बिन जर्राह&lt;/div&gt;&lt;div&gt;15. 100 निष्क: अर्थात 100 महाज्ञानी अनुयायी है। वह 100 महाज्ञानी मुहम्मद (सल्ल.) के साथ ही थे। जिसको असहाबे-सुफ्फा कहा जाता है उन्होंने लोगों को सदा धर्म की शिक्षा दी, जिसका सत्य धर्म अंतिम अवतार ने स्थापना की।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;16. 300 अवर्ण: अर्थात अग्रगामी साथी, अंतिम अवतार का पहला साथ देगा, मुहम्मद (सल्ल.) के पहले साथियों की संख्या 313 थी, जो न तो 300 है और न 400 है, जब अधर्मियों से पहला मुकाबिला हुआ उस समय 313 साथी युद्ध के मैदान में निकल आये थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;17. 10000 गौ. अर्थात 10000 ब्रह्मज्ञानी, हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के साथ मक्का विजय के दिन 10,000 साथी थे। जो कि सब के सब ब्रह्म/ईश ज्ञान युक्त महाज्ञानी थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वेद-पुराणों में जिसकी अंतिम अवतार के रूप में भविष्य वाणी की है। अब वह भविष्य नहीं रहा। वह अतीत का विषय हो चुका है। अधिकांश मनुष्य जिस नराशंस की प्रतीक्षा कर रहे हैं वह अंतिम अवतार अरब देश के मक्का नगर में आविर्भूत होकर अपना कार्य सम्पूर्ण करके चले गये। मानने वाले पर आदेश है कि समग्र मानव समाज का यह समचार/सन्देश पहुंचा दिया जाये कि अंतिम अवतार हो चुके एवं अपना कार्य पूरा करके चले गये।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उपसंहार&lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्रत्येक मनुष्य का मूल लक्ष्य है कि ईश्वर की कृपा से इहलोक एवं परलोक में सुख शांति, खुशी मिले, ईश्वर पर भक्ति-विश्वास रखने वाले को चाहिए कि सम्पूर्ण धर्म-विश्वास-भक्ति द्वारा ईश्वर को प्रसन्न करें। अब सवाल है सम्पूर्ण धर्मविश्वास-भक्ति क्या है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात: सृष्टि के प्रारम्भ से आखिर तक ईश्वर द्वारा किये गये आदेश पर विश्वास रखना, उनके भेजे गये अवतारों को अवतार ही समझना, जब-जब जैसा हकुम दिया ऐसे ही जिन्देगी को व्यतीत करना। ईश्वर के बहुत अवतार है, अगर कुछ को मानें और कुछ की न मानें तो यह ईश्वर पर विश्वास एवं भक्ति में असम्पूर्णता (कमी) है। जानबूझ कर ऐसा न करना चाहिए। ईश्वर ने जो आदेश दिया है, वह सीधा प्रत्येक मनुष्य के पास नहीं पहुंचता है। ईश्वर का आदेश (हुकुम) किसी माध्यम से मनुष्यों के पास भेजा जाता है। उसी माध्यम को ही देवदूत/अवतार/नबी (रसूल)/सन्देष्टा आदि कहा जाता है। अवतार को इसलिए भेजा जाता है कि हम सब संकीर्ण बुद्धि स्वार्थी मानसिकता से प्रभावित होकर, ईश्वर आदेश को भूल गये या फिर मनमानी अर्थ निकाल कर चल रहे, इसको सम्पूर्ण धर्म भक्ति समझते हैं। ऐसी अवस्था से निकलवाकर हम सब को सत्य धर्म को समझाते और ईश्वर की आदेश के अनुसार जिन्दगी चलाने का उपदेश करते। मनुष्यों कलि (शयतान) के बहकावे में आकर धर्म से अधर्म को ओर मन बना लेते, अतः ईश्वर ने अवतार भेजा कर सत्य धर्म मार्ग दिखाता।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यह सिलसिला तो अंतिम अवतार आने सेपहले बहुत बार-बार चला, लेकिन वह अवतार एक सीमित स्थान के लिए होता था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सब जो अंतिम अवतार का आविर्भाव हुआ था। यह कोई सीमित स्थान के लिए नहीं, वह तो समग्र जगत के मंगल के लिए भेजा गया था। क्योंकि इसे बाद और कोई अवतार का आविर्भाव नहीं होगा, अंतिम अवतार ही अंतिम है। अगर आप अभी भी यह सोचते रहे कि अंतिम अवतार तो भविष्य है तो यह धारणा ठीक नहीं। क्योंकि अंतिम अवतार भविष्य नहीं र&lt;br /&gt;ा, अतीत का विषय हो गया। युद्ध में ढाल-तलवार का युग नहीं है। अगर आप ऐसा सोचते हैं कि अंतिम अवतार का भारत में आविर्भाव होगा तो तो यह भी ठीक नहीं है। क्योंकि अंतिम अवतार समग्र जगत के मंगल करने के लिए अवतरित होता है, इसलिए समग्र जगत के किसी भी स्थान पर आ सकते हैं, भारत के जो निर्दिष्ट अवतार थे वह अवश्य भारत में आये थे, भारत में तो संस्कृत भाषा को पवित्रा माना जाता है, ऐसा भी जरूरी नहीं कि अंतिम अवतार की भाषा संस्कृत हो, सृष्टिकर्ता ने समग्र सृष्टि जगत को बनाया। समग्र प्राणी मनुष्य आदि सृष्टिकर्ता ही की सृष्टि है। भाषा भी सृष्टिकर्ता ही की सृष्टि है। भाषा भी सृष्टिकर्ता ने ही दी। जो भाषा पसंद होगी अवतार भी वही भाषा का होगा, स्थान भी उसी भाषा बोलने का स्थान होगा, यह तो ईश्वर की मर्जी है, इस पर आप की मेरी बात तो लेगी नहीं। इसलिए भारत के बाहर एवं संस्कृत भाषा से निकलना प्रयोजन है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अगर ऐसा नहीं किया जाये तो भारत से सुदूर अबर मुल्क के मक्का नगर में अंतिम अवतार का आविर्भाव समझना मुश्किल होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऐसा न सोचा जाये कि जब अवतार नया है, तो धर्म कुछ नया होगा, यह ठीक नहीं, कि धर्म के नया-पुराना होता नहीं। सत्य सनातन धर्म सृष्टि के आरम्भ से आज तक चला आ रहा है। प्रत्येक अवतार उसी सत्य सनातन धर्म को ही पुनः संस्थापन करता था। केवल अपनी संकीर्ण बुद्धि स्वार्थ और शयतान के चक्कर में हम लोगों ने जो बिगाड़ आया उसे पवित्रा करके (शुद्ध करके) उसी पुराने धर्म की ही स्थापना करना अवतार का कार्य है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आदि मनु (स्वयम्भु) से जलप्रावन मनु (वैवस्वत) तक 6 मनु का समय निकल जाने के बाद सप्तम मनु हुए। (श्रविष्णुपुराण-3/1/6-7 श्लोः) मनु वैवस्वत का एक प्रार्थना मंत्रा पाये जाते हैं, जिसमें कहा गया है कि आदि मनु अवतार से दिय गये मागे (धर्म) से हमें भ्रष्ट न करे। (ऋ 8/30/3)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यह धारणा भी ठीक नहीं है कि नया अवतार नया धर्म लेकर आता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अंतिम अवतार का नाम नराशंस है, अरबी भाषा में महम्मद है। अंतिम अवतार द्वारा संस्थापित किया गया धर्म का नाम इस्लाम है। हिन्दी भाषा में सनातन धर्म अर्थात चिरन्तन सत्य धर्म है। वही सत्य सनातन धर्म सृष्टि  के आरम्भ से आज तक विभिन्न नामें  से चला आ रहा है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह सनातन धर्म भक्त प्रहलाद द्वारा जब प्रतिष्ठित हुआ तब एकेश्वर वैष्णव धर्म नाम में हुआ था। जब भगवान श्रीकृष्ण जी द्वारा प्रतिष्ठित हुआ तब एकेश्वर भागवत धर्म  नाम में हुआ था। वही सनातन धर्म अब इस्लाम नाम में प्रतिष्ठित है। इसमें केवल भाषा (जबान) का ही अंतर है। पानी को वाटर कहने से शरबत नहीं होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अगर हम अंतिम अवतार का अनुसंधान न करें तो ईश्वर ने उनके माध्यम से जो आदेश उपदेश एवं धार्मिक संस्कार किया, उसका लाभ हमें  नहीं हो पायेगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अतः जीन्देगी में ईश्वर में दिया गया सम्पूर्ण आदेश का पालन नहीं होता है। जिस कारण मेरा विश्वास सम्पूर्ण नहीं है। सम्पूर्ण विश्वास भक्ति ईश्वर के पास मान्य है। अंश विश्वास/आंशिक धर्म मान्य नहीं। क्योंकि जब से अंतिम अवतार के पास ईश्वर की ओर से ईशवाणी आना शुरू हुई उसी दिन से धर्म/विश्वास/सम्पूर्ण होने लगा, जब अंतिम अवतार का कार्य सम्पूर्ण हो गया तो उनके द्वारा कहा गया उपदेश/आदेश मानकर ही धर्म/विश्वास सम्पूर्ण होगा। अंतिम अवतार से पहले जितने अवतार आये थे वह समग्र विश्व के अवतार नहीं थे। सीमित क्षेत्रा के लिए आये थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अतः समग्र विश्व का मंगल करने वाला अंतिम अवतार समग्र विश्व मानव के लिए मान्य है। ईश्वर/परब्रह्म की प्रसन्नता चाहिए तो परब्रह्म से दिया गया समस्त असमानी ग्रथ (ईश्वाणी) पर विश्वास रखने के साथ समग्र अवतार पर विश्वास रखना है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आदेश भी वही दिया जो कि प्रत्येक अवतार कहते हैं। श्रीकृष्णजी से उदाहरण दिया जाता है। श्री भगवान कृष्ण जी ने गीता में कहा-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सर्वधर्मान परितथ्य मामेक शरणं ब्रज।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्री गीता 18 अध्याय 66 श्लोक का प्रथमांश।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात - समस्त धर्म को परित्याग करो, केवल मात्रा मेरा अनुशरण करो अर्थात मेरे कहने के अनुसार चलो। यह संदेश प्रत्येक अवतार देता है। क्योंकि पूर्व धर्म में अधर्म घुस गया, जिसलिये अवतार भेज कर शुद्ध पवित्रा सत्य धर्म में अधर्म घुस गया, जिस लिये अवतार भेज कर शुद्ध पवित्रा सत्य धर्म को संस्थापन किया जाता है। अतः पूर्वकाल के समस्त धर्म को त्याग दो, मैं जो कहता हूं वही करो। इसके आगे की बात कह कर, यह विषय समाप्त करूंगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्री कृष्ण जी  ने पूर्व कालिन समस्त धर्म त्याग करने का आदेश कर दिया, अब क्या करना है। यह ही तो शुद्ध सत्य धर्म है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तमेव शरणं गच्छ सर्व भावेन भारत।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तत् प्रसादात पर शांति स्थान प्राप्यसि शाश्वतम्।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;श्री गीता 18 अध्याय 62 श्लोक&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अर्थात हे अर्जुन तुम सब प्रकार भाव से केवल मात्रा उनकी (परब्रह्म/सृष्टिकर्ता की) शरण में जाओ, उन्हीं के कृपा द्वारा तुम परम शांति प्राप्त कर सकते हो।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब सोच विचार आप के लिये है, आप जैसा अच्छा समझो ऐसा ही करें, अंतिम अवतार होने का संदेश देना था, वह मैंने दे दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;परम करूणा मय ईश्वर (सृष्टिकर्ता) हम सब को सत्य समझने की सदबुद्धि दान करें, हम सभी को शांति सुख तथा अंत में मुक्ति (मोक्ष)  दान करें।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इसी प्रार्थना के साथ यह पुस्तिका समाप्त है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4148684920008435142-6514185736743646806?l=antimawtar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://antimawtar.blogspot.com/feeds/6514185736743646806/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4148684920008435142&amp;postID=6514185736743646806' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4148684920008435142/posts/default/6514185736743646806'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4148684920008435142/posts/default/6514185736743646806'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://antimawtar.blogspot.com/2009/08/4th-book.html' title='अंतिम अवतार परिचय- महाराज विकाशानन्‍द-(ब्‍लागः-4th-book'/><author><name>Mohammed Umar Kairanvi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06899446414856525462</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_6kacm3QiWSA/Sxd7Q7WZMqI/AAAAAAAAAVY/iETHamqjm0M/S220/cyber-maulan-umar-kairanvi-new-dec09-c.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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की ज्योति)&lt;br /&gt;'कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब'&lt;br /&gt;Kalki incarnation and Sir Muhammad&lt;a href="http://www.4shared.com/file/110554579/282dd1d1/kalki-avtar-aur-muhammad-S.html"&gt; पी डी एफ &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.4shared.com/file/110554579/282dd1d1/kalki-avtar-aur-muhammad-S.html" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355965716279958674" src="http://1.bp.blogspot.com/_6kacm3QiWSA/SlQ2cRwJnJI/AAAAAAAAAHc/b6MPVYzZ9Tw/s320/kalki-avtar-aur-mohamad.jpg" style="cursor: pointer; height: 187px; width: 137px;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक -डा. वेदप्रकाश उपाध्याय&lt;br /&gt;एम. ए. संस्कृत (वेद), डी. फिल्, धर्मशास्त्राचार्य, डिप्. इन जर्मन&lt;br /&gt;सहायकः अनुसन्धान अधिकारी,वी. आई. एस. एण्ड आई. एस.&lt;br /&gt;पंजाब युनिवर्सिटी , पो. आ. साधु आश्रम, होशियारपुर (पंजाब)&lt;br /&gt;आनरेरी डायरेक्टर सारस्वत,वेदान्त प्रकाश संघ (भारत)&lt;br /&gt;..............................................&lt;br /&gt;प्रकाशक&lt;br /&gt;जम्हूर बुक डिपो,&lt;br /&gt;देवबन्द- 247554&lt;br /&gt;..............................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समर्पणम&lt;br /&gt;श्रीम्रतां विद्वद्धुरिधौरेयाणां सारस्वतानां पण्डितम्मन्यदारुणद -&lt;br /&gt;पंज्वरविदारणायौघरूपाणां मानवैक्यप्रतिपादकमतविभूषितमानसाना&lt;br /&gt;दर्शनेन सन्मार्ग प्रदर्शनकारिणां दर्शनशास्त्राकृतनिर्मलान्त:&lt;br /&gt;करणानां प्रयागविश्वविद्यालयीयसंस्कृतविभागाध्यक्षाणां&lt;br /&gt;गुरूवर्याणां डा. आद्याप्रसादमिश्रमहोदयानां&lt;br /&gt;करकमले समर्प्यते शोधपुस्तकमिदम् ।&lt;br /&gt;..............................................&lt;br /&gt;साभार:&lt;br /&gt;वेदप्रकाशोपाध्यायः&lt;br /&gt;उपाध्यक्ष:&lt;br /&gt;सारस्वतवेदान्तप्रकाशसंघः&lt;br /&gt;..............................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विषय-सूची&lt;br /&gt;1.    विद्वानों के विचार                 &lt;br /&gt;2.    सहायक ग्रन्थों की सूची             &lt;br /&gt;3.    प्रस्तावना                     &lt;br /&gt;4.    अवतार का अर्थ                 &lt;br /&gt;5.    अवतार के कारण                 &lt;br /&gt;6.    अन्तिम अवतार के कारण             &lt;br /&gt;7.    अन्तिम अवतार की विशेषताएं         &lt;br /&gt;8.    अन्तिम अवतार का समय             &lt;br /&gt;9.    स्थाननिरुपण         &lt;br /&gt;10.संसार के सामाजिक और धार्मिक पतन का काल &lt;br /&gt;11.अन्तिम अवतार सिद्धि &lt;br /&gt;12.वेदों और कुरआन की शिक्षाएं &lt;br /&gt;13. उपसंहार                 &lt;br /&gt;..............................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शोध पुस्तक पर विद्वानों के विचार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डा. गोविन्द कविराज&lt;br /&gt;एम्. ए. एम्. ए. एम्. एस., एच. एम्. डी., पी. एच्. डी.,&lt;br /&gt;सर्वदर्शनाचार्य व्याकरणाचार्य, साहित्याचार्य, आयुर्वेदविज्ञानाचार्य,&lt;br /&gt;भिषगाचार्य, वैद्यरत्न, हिन्दी साहित्यरत्न, वेदान्तशास्त्री (अंग्रेजी सहित)&lt;br /&gt;प्रोफेसर वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय,&lt;br /&gt;पिंसिपल नेपाली, संस्कृत महाविद्यालय वाराणसी - 1&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रिय महाशय,&lt;br /&gt;‘कल्कि अवतार और मोहम्मद साहब’ ग्रन्थ को मैंने पढ़ा। समस्त संसार में विस्तृत पारस्परिक सैद्धान्तिक वैमनस्य को हटाकर मानव मात्र को एक सूत्र में आबद्ध करने के लिये आपने जो अथक प्रयास किया है वह अतीव प्रशंसनीय है।&lt;br /&gt;भवदीय&lt;br /&gt;गोविन्द&lt;br /&gt;19-10-70&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेवा में&lt;br /&gt;श्री पं. वेद प्रकाश उपाध्याय             &lt;br /&gt;संचालक - सारस्वत वेदान्त प्रकाश संघ         &lt;br /&gt;प्रयाग                 &lt;br /&gt;............................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रो. डा. श्री गोपाल चन्द मिश्र&lt;br /&gt;एम. ए., पी. एच. डी. धर्मशास्त्राचार्य, वेदाचार्य&lt;br /&gt;वेदविभागाध्यक्ष, संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी - 2&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईश्वरीय सृष्टि में मानवता समान है। उसके उत्थान और पतन के नियम एवं स्वरूप भी समान हैं। सभी देशों में महापुरूष या महामानव की आवश्यकता भी समय समय पर पड़ती है। किसी व्यक्ति का अवतार या महापुरूष या महामानव होना बिना ईश्वरांश के प्रकाश के सर्वथा असम्भव है। मोहम्मद साहब अरब देश की आवश्यकता के अनुरूप ईश्वरांशीय महापुरूष थे इस सत्य को मानने में किसी भी व्यक्ति को हिचक नहीं हो सकता। महापुरूष देशकाल परिस्थिति की अनुरूप भले ही एक भूभाग में सम्मानित या उपदेष्टा हो, पर उसकी महत्ता का वर्णन दूसरे देशवासी अपनी भाषा एवम् संस्कृति के अनुरूप शब्दों में करते हैं। इस भावना को डा. वेदप्रकाश उपाध्याय एम. ए. की कल्कि अवतार और मोहम्मद साहब पुस्तक विश्वास दिलाती है। यद्यपि लेखक ने हिन्दू शब्द को भारतीय का पर्यायवाची सिद्ध किया है। पर हम जन प्रसिद्धि की भ्रम को ठीक भी मानें तो इस पुस्तक में सिद्ध हुई बात मुसलमान भाइयों के विचार में दृढ़ हो जाय, हिन्दू मुसलमान नाम के दो घर मानने पर भी एक मूल पुरूष मुहम्मद साहब या कल्कि के मानने वाले होने के नाते अभिन्नता का भाईचारा बढ़ जायगा, जो दोनों सम्प्रदायों के अनुयायियों के लिये अविरोधी सहअस्तित्व को जगा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति की आभ्यान्तरिक विभिन्नता तब तक घृणित नहीं हो सकती जब तक व्यवहार अर्थात सुरक्षा, सुख दुःख सहयोग, खेलकूद आदि में भेद बुद्धि नहीं पनपती। भारत के हिन्दुओं में तथा मुसलमानों में भी अनेक सिद्धांत विचार एवं सम्प्रदाय हैं। पर वे आभ्यान्तरिक भेद, व्यवहार को प्रभावित नहीं करते इसलिये सभी हिन्दू या मुसलमान अपने में एक हैं। उसी प्रकार आभ्यान्तरिक या आध्यात्मिक सिद्धांत विचार के भेद रहने पर भी यदि मुसलमान हिन्दू व्यवहार में सुरक्षा दुःख सहयोग खेल कूद में एकता हृदय से मानने लगें - तो वह दिन दूर नहीं कि विश्वव्यापी मानवता के संहार का भय सर्वदा के लिये दूर भाग जाय।&lt;br /&gt;श्री गोपाल चन्द्र मिश्र&lt;br /&gt;4-11-1970&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभाशंसी&lt;br /&gt;संस्कृत विश्वविद्यालय             &lt;br /&gt;7 अध्यापक निवास             &lt;br /&gt;जगतगंज वाराणसी - 2&lt;br /&gt;फोन न. 67026&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;15.4.1969&lt;br /&gt;(1) श्री वेदप्रकाश उपाध्याय (शोधछात्र) ने हाल ही में ‘मोहम्मद साहब और कल्कि अवतार’ पर एक पुस्तिका प्रकाशित करने की योजना बनाई है। मैंने पुस्तक के प्रारूप को देखा है। लेखक ने एक विचारणीय विषय पर लेखनी उठाई है काफी खोज कर अपना मत सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। उनका अध्यवसाय तथा दृष्टिकोण सराहनीय है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स. प्र. चतुर्वेदी, एम. ए. (संस्कृत-वेद), व्याकरणाचार्य&lt;br /&gt;भूतपूर्व अध्यक्ष, संस्कृत विभाग, प्रयाग विश्वविद्यालय&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(2) कल्क्यवतार मोहम्मदयोस्तुलनात्मकाध्ययनवैशिष्ट् यबोधकनव्यशैली समीक्ष्य विशिष्ट तुष्यन् मदीयं मनः रचयितुर्विशिष्टविकासकासनतया आधुनिक युगीनजनैक्यसम्पादनतया च परं प्रसीदति, श्रीमानीशःरचयितारं वैशिष्टेनावलोकयत्वितिशम्।&lt;br /&gt;भव्यरचनमिदमद्य विलोक्य कस्य जनस्य न हृष्येच्चेतः।&lt;br /&gt;जयकिशोरविदुषः श्रीलस्य सम्मतिरस्तु रचयितुश्रियः।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झोपाह श्री जयकिशोर शर्मा, व्याकरणाचार्य&lt;br /&gt;प्रधानायार्य - सौदामिनी संस्कृत महाविद्यालय, इलाहाबाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(3) ‘कल्कि और मोहम्मद साहब का तुलनात्मक अध्ययन’ विषयक शोधपुस्तक को पढ़कर हृदय में सर्वधर्मसमन्वय की पूर्वप्रतिष्ठित भावना और भी दृढ़ हुई। पुस्तक में प्रस्तुत अन्यान्य प्रमाणों एवं उद्धरणों को देखकर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इस्लाम की उत्पत्ति का मूल बीज वैदिक धर्म में ही निहित है। उस (कल्कि) सन्देष्टा की धर्म विजयहेतु प्रयुक्त सामग्री में ‘घोड़ो व तलवार’ आदि का संकेत किसी भी बौद्धिक व्यक्ति को यह सोचने के लिये बाध्य कर सकता है, कि आज वह भविष्य की कल्पना का विषय नहीं अपितु भूतकाल का पात्र रह चुका है। पुस्तक का पर्यवेक्षक अन्ततः यही सिद्ध करता है, कि ‘भागवत्’ के कल्कि हमारे मोहम्मद साहब ही हैं।&lt;br /&gt;वस्तुतः उस परमसत्ता की सर्वमयंता के लिए इन प्रमाणों की कोई आवश्यकता तो नहीं है। परन्तु शुभशंसा के रूप में मैं यही कहूंगा कि उपाध्याय जी का यह प्रयास हिन्दूमुस्लिम विचार-वैभिन्नय को धो डालने में समर्थ हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री अशोक तिवारी&lt;br /&gt;लवेदी-इटावा (उ.प्र.)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(4) ‘कल्कि और मुहम्मद साहब साहब का तुलनात्मक अध्ययन’ विषयक शोध पुस्तक निःसन्देह नवीन, अन्वेष्णात्मक, तर्कपूर्ण विचारों से युक्त, मुसलमानों और हिन्दूओं के असमान दृष्टिकोण को एक सूत्र में बांधते हुए ऐसे संसार की स्थापना करेगी, जो कल्याण कारक, आनन्दपूर्ण एवं क्लेशरहित होगा।&lt;br /&gt;श्री राम भवन मिश्र&lt;br /&gt;भोज कोल्हुआ, चील्ह,&lt;br /&gt;मिर्जापुर (उ.प्र.)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(5) ‘कल्कि और मुहम्मद साहब का तुलनात्मक अध्ययन’ पुस्तक पढ़ने से मुझे यह विश्वास हो गया कि कल्कि और मुहम्मद एक ही है।&lt;br /&gt;श्री इन्द्रजीत शुक्ल, वर्दमान&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(6) पं. वेदप्रकाश उपाध्याय द्वारा किया गया ‘कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब का तुलनात्मक अध्ययन’ विषयक शोधकार्य मैंने भलीभांति देखा।&lt;br /&gt;इस लघुपुस्तक में विद्वान् शोधकर्ता ने भारतीय पौराणिक साहित्य और इस्लामी का तुलनात्मक अध्ययन करके कल्कि अवतार के सम्बंध में जो ‘महत्वपूर्ण अन्वेषणात्मक कार्य किया है वह वर्तमान धार्मिक संघर्षों का उन्मूलन करने में अत्याधिक उपकारी होगा 1 - इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व में एकेश्वरवाद का पुनः प्रसार होगी और समस्त मानवजाति में साधारण भाईचारे का प्रेम उत्पन्न होगा। हमें पूर्ण आशा है कि लघु ग्रंथ को सभी सम्प्रदाय के अनुयायी पसंद करेंगे और अपने यह प्रयास एक महान् समन्वय का सन्देश देगा।’&lt;br /&gt;हमारी यह शुभकामना है कि लेखक का यह प्रयास समाज के लिए कल्याणकारी हो।&lt;br /&gt;डा. रामसहाय मिश्र, शास्त्री&lt;br /&gt;बहादुरगंज, इलाहाबाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(7) इस शोधपुस्तक को पढ़ने मात्र से मुझे हिन्दू-मुसलमान दो व्यापक सम्प्रदायों के बीच उलझी गुत्थियों का सुलझना और साथ ही साथ हिन्दुत्व का वह प्राचीन व्यापक रूप पुनः समक्ष आता हुआ दिखाई पड़ रहा है।&lt;br /&gt;प. राम बहादुर मिश्र&lt;br /&gt;लौगावाँ, कुभियावाँ, इलाहाबाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(8) अभी तक ऐसी कोई भी अन्वेषणात्मक पुस्तक नहीं निकली, जिसने विभिन्न सम्प्रदायों को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया हो।&lt;br /&gt;अशोक कुमार जायावाल ‘सारस्वत’&lt;br /&gt;सदस्य, प्रयाग कार्यकारिणी समिति&lt;br /&gt;सारस्वत-वेदान्त प्रकाश संघ, इलाहाबाद (उ.प्र.)&lt;br /&gt;...........................................................&lt;br /&gt;...........................................................&lt;br /&gt;शोध पुस्तक सहायक ग्रन्थों की सूची&lt;br /&gt;संस्कृत -&lt;br /&gt;(1) ऋग्वेद संहिता (2) यजुर्वेद संहिता (3) सामवेद संहिता&lt;br /&gt;(4)अथर्ववेद संहिता (5) श्वेताश्वरोपनिषद् (6) केनोपनिषद्&lt;br /&gt;(7) महाभारतम् - महर्षिवेदव्यासप्रणीतम (8) श्रीमद भगवद् गीता&lt;br /&gt;(9) श्रीमद भगवद् पुराणम् - महर्षिवेदव्यासप्रणीतम, गीताप्रेस गोरखपुर, सं. 2021 (10) भविष्य पुराणम् - महर्षिवेदव्यासप्रणीतम&lt;br /&gt;खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेंकटेश्वर स्टीम् प्रेस, बम्बई, 1959&lt;br /&gt;(11) कल्किपुराणम् - महर्षिवेदव्यासप्रणीतम, सं. 1963 श्री वेंकटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई&lt;br /&gt;हिन्दी -&lt;br /&gt;(12) हिन्दूमुस्लिम एकता - पं. सुन्दरलाल जी, हिन्दुस्तानी कल्चर सोसाइटी, 145 मुट्ठीगंज, इलाहाबाद&lt;br /&gt;(13) कुरआन&lt;br /&gt;उर्दू और अंग्रेजी -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;14.  Shimail Tirmizi - Maulana Mohammad Zakaria&lt;br /&gt;15. Sarwar-e-Alam. - Mohammad Muslim, Published at Jabyyad Press, September, 1960 A.D. Kishanganj Delhi.&lt;br /&gt;16. Sirtunabi. - Shibi Nomani and Sayyad Sulaiman Nadawi, Published from - Matba Maarif, Azamgarha. Fourth Edition 1958 A.D.&lt;br /&gt;17. Asah-us-Siyar.- Hakim abdul Barkat, Adur-Rauf, Publisher Noor Mohammad, Asag-ul-Matba, Karachi, September 1932 A.D.&lt;br /&gt;18. Jannaul - Favaid - Sulaiman, Publisher Ashiqilahi, Khairia Press, Meratha&lt;br /&gt;19. Mohammad and Mohamedenism; by Rev. Bos-worth Smith.&lt;br /&gt;20. Decline and fall of the Roman Empire; by Edwerd Gibbon; Publisher from E.P. Dutton &amp;amp; Co. Newyork, 1210 A.D.&lt;br /&gt;21. The speeches of Monommad, by Lanepoole, Published by Macmillan &amp;amp; Co. (London) 1882.&lt;br /&gt;22. An Encyclopedia worid History-W.L.Langer, Published by George G. Harrap &amp;amp; Ltd. Printed in the U.S.A.&lt;br /&gt;23. A History of civilization in Ancient India - by R.C. Dutt, Revssed Edition, 1893, Published by Kegan Paul, Trench Trubner &amp;amp; Co. Ltd. (London).&lt;br /&gt;24. Apology for Mohammed - by Godfrey Higgins, Published by Allahabad Refrom Society, Dariyabad 1929 A.D.&lt;br /&gt;25. Life of Mohamet. - Sir William Muir Published from Smith, Elder &amp;amp; Co. (London) 1877 A.D.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;....................&lt;br /&gt;.....................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रस्तावना&lt;br /&gt;इस शोध पुस्तक में प्राचीन भारतीय परम्परा तथा इस्लामी परम्परा के समन्वय को प्रस्तुत किया गया है। इस्लामी परम्परा में जो स्थान रसूलों नबियों या पैगम्बरों का हो, वही स्थान भारतीय परम्परा में अवतारों का है। मुसलमान मोहम्मद साहब को अन्तिम सन्देष्टा मानते हैं और भारतीय परम्परा कल्कि को अन्तिम अवतार। विदेशों में केवल सन्देष्टा आते हैं और भारत में केवल अवतार, यह असम्भव है, क्योंकि सभी भूमि परमेश्वर की है उसमें वैषम्य का स्थान नहीं है। सभी देशों के तत्तद् साहित्यों में उन्हीं देशों की महिमा का गुणगान हुआ है अतः कोई भी स्वदेशी या विदेशी अपने देश को नीचा नहीं कहेगा। सन्देष्टा केवल अरब में ही आए, भारत में नहीं, यह भी एकांगी विचार है, और अवतार केवल भारत में ही नहीं, यह भी एकांगी विचार है। मोहम्मद साहब अन्तिम सन्देष्टा है, यह जानकर मुझे पुराणों में कल्कि विषयक चरित पढ़ने की उत्कणठा हुई। भारतीय परम्परा के अनुसार पहले कुछ कलियुग बीत गए, उनमें कल्कि के अवतार में जो घटनायें घटीं और इस कलियुग में जो घटनाएं घटनी हैं, उनकी तुलना मैंने मोहम्मद साहब के जीवन से की जो प्रायः समान उतरीं। अल्पमात्र जो कहीं कहीं कुछ अन्तर पड़ा वह जैसे राम के चरित्रों में अन्तर पड जाता है, उसी प्रकार हुआ, और उसका समाधान लोग यह कहकर देते हैं कि ‘‘हरि अनन्ता हरि कथा अनन्ता’’ वही कहकर मैं भी कर रहा हूँ। मैं कल्कि अवतार को कथा इसलिए नहीं कहना चाहता, क्योंकि ‘कथा कल्पितवृत्तान्ता सत्यार्थास्यायिका’ के सिद्धांत से इसको आख्यायिका ही मानना युक्तिसंगत है।&lt;br /&gt;वैज्ञानिक अणुविस्फोटकों से जो सत्यानाश सम्भव है, उसका निराकरण धार्मिक एकता सम्बंधी विचारों से हो जाता है। जल में रहकर मगर से बैर करना उचित नहीं। इस कारण मैंने वह शोध किया जो धार्मिक एकता का आधार (substratum) है राष्ट्रीय एकता (National intigration) के समर्थकों द्वारा इस शोधपत्र पर कोई आपत्ति नहीं होगी। आपत्ति होगी तो कूपमण्डूक लोगों को, यदि वे कूप के बाहर निकलकर संसार को देखें तो कूप को ही संसार मानने की उनकी भावना हीन हो जाएगी। ईश्वर की आज्ञा से ईश्वरीय वाणियों का प्रचार हो, इस उद्देश्य से मैंने इस प्रकार के शोधकार्यों में हाथ डाला है। इसके पूर्व कुछ लोगों ने इस विषय पर कुछ लिखा था, या नहीं यह स्पष्ट कहा नहीं जा सकता, परन्तु ‘सरवरे आलम’ (सरवरे आलम (मोहम्मद मुस्लिम, Published at jayyad press, sept. 1960, A. D. Kishanganj, Delhi.) में इतना संकेत है कि मोहम्मद साहब और कल्कि एक ही हैं। मेरे इस शोधपत्र का प्रचार होगा, स्वदेश और विदेशों में, क्योंकि ईश्वर की सहायता से यह पुस्तक लिखी गई है। इसमें जो तर्क संगत बातें आई हैं, वह मेरे विचार नहीं, या तो वे वेदों पुराणों के विचार हैं, या मेरे अन्दर हुई ईश्वरीय प्रेरणा के।&lt;br /&gt;मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस शोध पुस्तक के अवलोकन से भारतीय समाज में ही नहीं बल्कि निखिल भूमण्डल में एकता की लहर दौड़ पड़ेगी, और धर्म के नाम पर होने वाले कलह शान्त होंगे। यदि लोगों की बुद्धि काम करेगी, तो परस्पर एक दूसरे के पर्वो में हाथ बांटकर स्वयं एकता के प्रतीक बनेंगे। नाम से कोई हिन्दू, मुसलमान या ईसाइ नहीं बनता है। यदि मैं सिराजुल हक़ को सत्यदीप, अब्दुल्लाह को पं. रामदास या रामयश तथा अंदुर्रहमान को भगवानदास कहूंगा तो वे बुरा नहीं मानेंगे, क्योंकि उनके नामों का संस्कृत में अनुवाद यही होता है, यदि वे चाहें, तो मेरे नाम का अनुवाद अरबी भाषा में नूरूलहुदा भी कर सकते हैं। ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि सभी वर्गों में विशेषकर हिन्दू और मुसलमानों में पूर्ण मेल हो, तथा मेरा यह शोधपात्र लोगों में सद्भावना का संचार करे। विश्व में बंधुत्व हो और सभी का कल्याण हो। कल्कि और मोहम्मद साहब के तुलनात्मक अध्ययन को पढ़ कर कहीं लोगों को यह न शंका होने लगे कि मोहम्मद साहब के चरित्रों का आधार लेकर लोगों को ने कल्कि का भावी वृतान्त बना डाला है, इसलिए मैंने जिन सनातन धर्मग्रन्थों का आश्रय लिया है, उनमें से पुराणों के रचनाकाल के विषय में कोई भी लेखक किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा। पाश्चात्य इतिहासकारों ने श्रौतसूत्रों, उपनिषदों, पुराणों आदि के कालनिर्धारण करने के समय स्थान 2 पर शायद (probably) शब्द का प्रयोग प्रचुरता के किया है, जो उनके निर्णय की अनिश्चितता का प्रतीक है। सर्वप्रथम मैं ‘उन पाश्चात्य विद्वानों का मत पुराणों के रचनाकाल के विषय में क्या है’? इसका उल्लेख करके कालनिर्णय करूंगा तब विषय-वस्तु का प्रारम्भ करूंगा।&lt;br /&gt;पुराणों का समय डब्ल्यू. एल. लांगर के अनुसार ईसा के 400 पर्ष बाद का है। (Puranas dis-ordered genealogies of kings compunded with legends, put in present form, fourth century, A.D. and later) इनके अनुसार रामायण और महाभारत की रचना दो सौ ई. पूर्व की है। (The mahabharat and epic-poems composed by several generations of bards, seems to have taken form about the second century B. C. Although probably revised early in our era.) लांगर महोदय के उपर्युक्त कथन में ये विप्रतिपत्तियां हैं-&lt;br /&gt;1. रामायण के कर्ता बाल्मीकि और महाभारत के कर्ता व्यास जी का समकालीन होना रामायण और महाभारत की समकालीनता से पुष्ट होता है, जो नितान्त असंगत है, क्योंकि आदि कवि बाल्मीकि व्यास जी के समकालीन कभी नहीं हो सकते। इसका कारण यह हैं कि राम के ही समय के बाल्मीकि थे, जैसा कि ‘राम द्वारा परित्यक्त सीता के संरक्षण का कार्य बाल्मीकि को ही अपने आश्रम में करना पड़ता है’, इस बात से सिद्ध होता है। इतना ही नहीं, बल्कि अपने महाकाव्य की पूर्ति भी बाल्मीकि जी अपने आश्रम में करते हैं, इस बात की भी पुष्टि होती है।&lt;br /&gt;2. राम की जीवन घटना त्रोता युग की है, अतः त्रोता युग में तो बाल्मीकि द्वारा रामायण की रचना किया जना सम्भव है, और द्वापर युग में वेदव्यास जी द्वारा महाभारत की रचना।&lt;br /&gt;3. शकराज का ईसा से मिलन भविष्य पुराण से सिद्ध है,&lt;br /&gt;(एकदा तु शकाधीशों हिमतुंग समाययौ। 21&lt;br /&gt;हूणदेशस्य मध्ये वै गिरिस्थ पुरूषं शुभम्।&lt;br /&gt;ददर्श बलवान् राजा गोरागं श्वेतवस्त्राकम् ।। 22&lt;br /&gt;को भवानिति तं प्राह स होवाच मुदान्वितः।&lt;br /&gt;ईशपुत्रं च मां विद्धि कुमारीगर्भसम्भव् ।। 23&lt;br /&gt;ईशामसीह इति च मम नाम प्रतिष्ठितम् ।। 31&lt;br /&gt;भविष्य पुराण, प्रतिसर्गपर्व, तृतीय खण्ड, द्वितीय अध्याय) और वह शकराज विक्रमादित्य का परवर्ती (विक्रमादित्यपौत्राश्च पितृराज्यं गृहीतवान। जित्वा शकान् दुराधर्षा श्चीनतैत्तिरिदेशजान् ।। 18 , एकदा तु एकाधीशो हिमतुंगं समाययौ। 21) भविष्य पुराण, प्रतिसर्गपर्व, तृतीय खण्ड द्वितीय अध्याय) था, अतएव विक्रमादित्य का समय ईसा से पूर्व का सिद्ध होता है। विक्रमादित्य के समय में रामायण और महाभारत तथा पुराण श्रद्धा के विषय थे, अतः इन तीन कारणों से लांगर का कथन असत्य सिद्ध होता है।&lt;br /&gt;भाषा की दृष्टि से पुराण पाणिनी की अपेक्षा पर्याप्त प्राचीन हैं, क्योंकि वह भाषा पणिनीय व्याकरण के बंधनों से रहित हैं। उसमें संस्कृत के शब्दों का प्रयोग आर्ष प्रयोग है, जो वैदिक और लौकिक संस्कृत के मध्यकाल का है। पाणिनि का समय लांगर के अनुसार 350 ई.पू. से लेकर 300 ई.पू. के मध्य है (Panini (? G. 350300) Encylopedia of world history, By W.L. Langer, page42) इसके अतिरिक्त बुद्ध जी का समय 563 पू. से लेकर 483 ई. पू. के मध्य है (Budhism was founded in the same period and pegion by Siddhartha (?563-483?) of the clan of Gautama and the hill of tribe of Sakya, who attained "IIIumination" (bodhi) Encylopedia of world history, By W.L. Langer, page4) बुद्ध जी ने अपना धर्म प्रचार ‘पालि’ भाषा में किया, जो उस समय की बाले चला की भाषा थी, यह बौद्ध होता है, भाषा की विकासशीलता होने के कारण संस्कृत भाषा का रूप बिगड़ कर पालि से प्राकृत तथा प्राकृत से अपभ्रंश तथा आज हिन्दी हो गया। संस्कृत भाषा की स्थिति बुद्ध जी के पूर्व सिद्ध होती है। कोई भी भाषा बहुत ही शीघ्र नहीं बदल जाती है, बदलते बदलते हजारों वर्ष लग जाते हैं। बुद्ध जी के पहले व्याकरण के नियमों में बद्ध संस्कृत भाषा का बातचीत में प्रयोग होता था, उस निश्चित व्याकरण के संस्थापक पाणिनि का समय, बुद्ध जी के समय में एक हजार वर्ष जोड़कर 1563 ई.पू. के लगभग सिद्ध होता। पाणिनि के सूत्रों की रचना से यह भी सिद्ध होता है कि उस समय लेखन के अभाव के कारण केवल कण्ठाग्र कराने की प्रक्रिया थी, जो सूत्रों के माध्यम से सुगम थी। पुराणों की भाषा पाणिनि से पूर्व की है, अतः आर्ष संस्कृत में पुराणों की रचना ई.पू. 2502 से 2563 ई. पू. के मध्य में सिद्ध होती है। ये तो रहे ऊपरी प्रमाण जो, प्रायः निराधार से हैं, क्योंकि सभी विद्वानों का मत सन्देहपूर्ण हैं और वे उन मतों की स्थापना के समय स्वयं ‘शायद’, ‘सम्भव है’ या प्रश्नवाचक चिन्हों का प्रयोग करते हैं। अब हम पुराणों के अन्तरंग प्रमाण के आधार पर उनका रचनाकाल प्रस्तुत करते हैं।&lt;br /&gt;अट्ठारह पुराणों में भविष्य पुराण भी एक है, जिसमें भविष्य की बातें बतायी गई हैं। जिन स्थानों में ‘लृट’ के स्थान में ‘लट्’ लकार का या ‘लड’ लकार का प्रयोग हुआ है, वहां पर ‘व्यत्ययो बहुलम्’ सूत्र से वैदिक संस्कृत की तरह तिड् का व्यत्यय हो गया है, अतएव पुराणों की आर्ष भाषा निःसन्देह लौकिक संस्कृत से उत्कृष्ट है। भागवतपुराण द्वादश स्कन्ध, द्वितीय अध्याय में कल्कि के पैदा होने की भविष्यवाणी की गई है और उनकी विशेषता भी बताई गई है। प्रथम स्कन्ध में भी चैबीस अवतारों के प्रकरण में ‘कल्कि’ को अंतिम अवतार माना गया है। भविष्यपुराण प्रतिसर्ग पर्व से व्यास जी भविष्य में होने वाली गाथा को आदम से प्रारम्भ करते हैं कि हे मन! भविष्य में होने वाली सूत जी द्वार वर्णित कलियुग की पूर्ण गाथा सुनकर तृप्ति प्राप्त करो (‘मनः श्रृणु तता गाथां भावीं सूतेन वर्णिताम्। कलयुर्गस्य पूर्णा तां तच्छुत्वा तृप्तिमावह।। भविष्य पुराण, प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड, चतुर्थ अध्याय, श्लोक 25’)। इस कथन से यह सिद्ध होता है कि पुराण आदम के पूर्ववर्ती ठहरे। द्वापर युग को समाप्त होने में दो हजार दो आठ वर्ष शेष रह गये थे, तब आदम का जन्म हुआ था (‘द्विशष्ट सहस्रेद्वेशेषे तु द्वापरे युगे। बहुकीर्तिमती भूमिभविता कीर्तिमालिनी। 28। इन्द्रियाणि दमित्वा यो ह्मात्मध्यानपरावणः। तस्मादादमनामासौ पत्नी हव्यभवती तथा। 29। भविष्य पुराण, प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड, चतुर्थ अध्याय’)।&lt;br /&gt;कलयुग के बीते हुये 5070 वर्ष हो रहे हैं, अतएव आदम आज से 5070 जमा 2208=7278 वर्ष पहले हुये। उस समय लेखन कला थी नहीं, अतएव श्लोकों को कंठाग्र ही रखना पड़ता था। न्यूह के समय से संस्कृत भाषा का पतन होने लगा, क्योंकि विष्णु ने प्रसन्न होकर संस्कृत भाषा को अपशब्द करके न्यूह के लिये प्रदान किया। उस भाषा का नाम म्लेच्छ भाषा रखा गया (‘म्लेच्छभाषा कृता ते वेदवाक्यपरांड् मुखा। कलेश्वर वृद्धये ब्राह्मी भाषा कृत्वाण्शवदगाम्।। 3।। न्यूहाय दत्तवन्देवो बुद्धीशो बुद्धिमः स्वम्। विलोमं च कृतं नाम न्यूहेन त्रिसुतस्य वै ।। 4।। भविष्य पुराण, प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड’ पंचम अध्याय)। न्यूह के तीन पुत्र हुये - सिम हाम और याकूत (सिमश्च हामश्च तथा याकूतो नाम विश्रुतः ।।5। भविष्य पुराण, प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड पंचम अध्याय)। यहां से भाषा परिवार बंटा, सिम से सेमेटिक, हाम से हेमेटिक। आदम का पूर्ववर्ती होने के कारण पुराणों का रचना काल आज से 7278 वर्ष पूर्व सिद्ध होता है, जो सर्वथा सम्भाव्य है, भले ही कुछ लोगों को आपत्ति हो। आदम के पहले अर्थात् पुराणों के काल में 4 वर्ण थे, परन्तु वे गुण और कर्म के विभाग से थे, न कि जाति के विभाग से। शूद्र ब्राह्मण बन जाता था और ब्राह्मण भी शूद्र बन जाता था (शूद्रों ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्। क्षत्रियो याति विप्रत्वं विद्याद्वैश्यं तथैच च।। 47। भविष्य पुराण, ब्रह्मपर्व, 40 अध्याय)। जब प्रजाओं का पालक परमेश्वर एक है, तो जातिकृत भेद हो ही नहीं सकता (स एक एवात्रा पतिः प्रजानां, कथं पुनर्जा तिकृतः प्रभेदः। प्रमाणदृष्टान्तनयप्रवादैः परीक्ष्यमाणो विघटत्वेति ।। 44।। भविष्य पुराणए 40 अध्याय)। चलने-फिरने की क्रिया, शरीर, वर्ण, केश, सुख, दुःख, खून, त्वक्, मांस, मेदा, अस्थि और रस की दृष्टि से तो सभी मनुष्य बराबर हैं, फिर मनुष्यों में जातिगत चार भेद क्यों हो सकते हैं (पाद प्रचारैस्तनुवर्णकेशैः, सुखेन दुःखेन च शोणितेन। लड् मांसमेदो स्थिरसैः समाना। श्चतुष्प्रभेदा हि कथं भवन्ति’ ।। 42। भविष्य पुराण, ब्रह्मपर्व, 40 अध्याय)? जो ऋग्वेद में चार-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये नाम आये हैं, उनका तात्पर्य यह नहीं हैं, कि वे जाति के सूचक हैं। उनका अर्थ है कि गुण तथा कर्म के आधार पर चार वर्णों (ब्राह्मणोतस्य मुखमासीद् बाह् राजन्यः कृतः। उरू तदस्य युद्धैश्यः पद्भ्यां शूदो अजायत।। ऋग्वेद 10-90-12, अर्थवेद 19-6-6, बा.य. 31-11, तै.आ. 3-12-5।)। चार वर्णों के कृत्यों में से जिसे जो अच्छा लगता था, उसी को वह स्वीकृत करता था।&lt;br /&gt;इस प्रकार पुराणों के रचनाकाल एवं चातुर्वर्ण्य व्यवस्था का वर्णन करके यह बतलाना आवश्यक समझता हूं, कि पुराणों में क्षेपक को स्थान नहीं क्योंकि भागवतपुराण में एक अध्याय में अट्ठारहों पुराणों की श्लोक संख्या दी हुई है, जिसके कारण एक भी श्लोक बढ़ाने का किसी को साहस ही नहीं।&lt;br /&gt;अब मैं ईश्वर का नाम लेकर अंतिम अवतार का विवरण प्रस्तुत करूंगा जिसके लिये मुझे निर्देश विद्वर्य प्रोफेसर सरस्वती प्रसाद जी चतुर्वेदी, भूतपूर्व अध्यक्ष संस्कृत विभाग प्रयाग विश्वविद्यालय तथा 1008 स्वामी श्री रामानन्द जी सरस्वती से मिला है, अतएव मैं इन दोनों विद्यामूर्तियों का कृतज्ञ हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक&lt;br /&gt;पं. वेद प्रकाश उपाध्याय&lt;br /&gt;एम.ए., (संस्कृत-वेद)&lt;br /&gt;शोधछात्र, संस्कृत विभाग,&lt;br /&gt;प्रयाग विश्वविद्यालय।&lt;br /&gt;................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अवतार का अर्थ&lt;br /&gt;‘अवतार’ शब्द ‘अव’ उपसर्गपूर्वक ‘तृ’ धातु में ‘धण’ प्रत्यय लगाकर बना है। अवतार शब्द का अर्थ यह है कि पृथ्वी में आना। ‘ईश्वर का अवतार’ शब्द का अर्थ है कि ‘सब को सन्देश देने वाले महात्मा का पृथ्वी में जन्म लेना’। परमेश्वर सर्वव्यापी है, किसी निश्चित स्थान में उसका रहना और वहां से उसका कहीं आना जाना यह कथन उस असीम को सीमित बनाता है। कहीं उसका तेज विशेष सुव्यक्त नहीं होता, जैसे तुषाराच्छादित सूर्य का तेज मंद दीखने लगता है, परन्तु उससे सूर्य का तेज कम नहीं होता। ऊपर के सात लोकों में सर्वोच्च लोक (अर्थात् सातवें आसमान) में उसकी उपलब्धि है, जहां न तो सूर्य चमकता है और न ही चंद्रमा या तारों का दर्शन होता है (‘न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भाति कुतोण्यमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।। श्वेताश्वतरोनिषद्, अध्याय 6, मंत्रा 14’)।&lt;br /&gt;वहां पर ईश्वर का इतना अधिक प्रकाश (नूर) फैला हुआ है कि सूर्य और चंद्रमा की ज्योति उसके सामने क्या है। जिस प्रकार सूर्य के प्रकार से सभी ग्रह (प्लानेट) प्रकाशित होते हैं। उसी प्रकार उस परमपिता परमेश्वर के तेज से सभी प्रकाशित होते हैं। उसी से से सम्बद्ध अर्थात उनका कोई श्रेष्ट (बिलव्ड) महात्मा लोगों का कल्याण करने के लिये जगतीतल में अवतीर्ण होता है, जगतीतल में अवतीर्ण लोगों में से निर्मल हृदय एवं सच्चारित्रा किसी एक व्यक्ति या में ज्ञान भर दिया जाता है, और ईश्वर के तेज का उसे साक्षात्कार हो जाता है, जिसके कारण बिना अध्ययन किये हुए ही उसमें सर्वोत्कृष्ट ज्ञान भर जाता है। ‘ईश्वर का अवतार’ शब्द में ‘का’ शब्द सम्बंध कारक का चिन्ह है, अतः स्पष्ट ही है कि ईश्वर से सम्बद्ध व्यक्ति का अवतीर्ण होना। ईश्वर से सम्बद्ध कौन है? उससे सम्बद्ध वही है, जो उसक भक्त है। ऋग्वेद में ऐसे व्यक्ति को ‘कीरि’ (‘यो रघ्रस्य चोदिता यः कृशस्य, यो ब्रह्मणो नाघमनस्य कीरेः ऋग्वेद 2-12-6’) कहा गया है। ‘कीरि’ शब्द अर्थ हिन्दी में ‘ईश्वर का प्रशंसक’ और अरबी में ‘अहमद’ होता है। सन्देह यह उठता है, कि इस तरह तो जितने भी ईश्वर के प्रशंसक हैं, सभी अहमद कहे जाएंगे, परन्तु ऐसा नहीं है। ईश्वर की विशेष प्रशंसा करने वाले पर ‘कीरि’ शब्द या ‘अहमद’ शब्द रूढ़ हो गया। जिस पर शब्द की जो रूढ़ि हो जाती है, उससे उसी का बोध हो जाता है। ‘आदम’ भी तो ईश्वर के प्रशंसक थे, परन्तु उनका  नाम ‘अहमद’ नहीं हुआ। तात्पर्य यह निकला कि ईश्वर से सम्बद्ध प्रत्येक व्यक्ति ‘कीरि’ नहीं हो सकता। यहां हमें केवल अन्तिम अवतार का वर्णन करना है, न कि सन्देष्टाओं या अवतारों का इतिहास कहना। इतना तो कहना आवश्यक समझता हूं, कि ‘अवतार’ (हिन्दू-मुस्लिम एकता, लेखक सुन्दरलाल जी, पेज 29-30) शब्द संस्कृत भाषा में और ‘प्रोफेट’ अंग्रेजी भाषा में ‘नबी’ अरबी भाषा में संसार के उद्धारकों के लिये प्रयोजनीय विश्रुत शब्द है। हर देश के लिये अलग-अलग अवतार हुए हैं। क्योंकि एक अवतार से सम्पूर्ण देशों का हित असम्भव है। परन्तु अन्तिम अवतार की बात और है, उसका जब उद्घाटन होता है, तब उसका धर्म संसार के सभी धर्मों में सन्निहित हो जाता है। अब हम ‘अवतार’ के कारणों पर विचार करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अवतार के कारण&lt;br /&gt;1. लोगों की अधर्म में प्रवृत्ति, और धर्म के वास्तविक स्वरूप से दूर हो जाना है (यदा यदा हि धर्मस्य, ग्लोनिर्भवति भारत अभ्युत्थानमधर्मस्य, तदात्मानं सृजाम्यहम्।।-गीता)।&lt;br /&gt;2. मूलधर्म में मिश्रण (उपगजनतम) कर लेना अर्थात् अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिये धर्म में धर्माभास को मिला लेना।&lt;br /&gt;3. धर्म के नाम पर अधर्म करना।&lt;br /&gt;4. धर्म के स्वरूप से अनभिज्ञ लोगों को अधर्म का धर्म के रूप में उपदेश देना।&lt;br /&gt;5. ईश्वर के भक्तों को कष्ट देना।&lt;br /&gt;6. पापों एवं अत्याचारों का बढ़ना।&lt;br /&gt;7. घोर हिंसा तथा अराजकता का फैल जाना।&lt;br /&gt;8. अपने पेट तथा परिवार के पोषण तक ही धर्म को सीमित रखना।&lt;br /&gt;9. ईश्वर द्वारा प्रदत्त उपभोग की वस्तुओं का विषमता से उपभोग। (इस आज्ञा का खण्डन होने पर-ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किच्च जगत्यां जगत् तेन त्यक्तेन भुज्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।’ यजुर्वेद, 40 अध्याय, मं.1.)&lt;br /&gt;10. साधुओं की रक्षा करने के लिये एवं दुष्टों का संहार करने के लिए अवतार होता है। (‘परित्राणाय साधूना विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।’)&lt;br /&gt;11. धर्म के विनाशोन्मुख होने पर अवतार होता है।&lt;br /&gt;12. मारकाट तथा लूटपाट के बढ़ने पर अवतार होता है।&lt;br /&gt;13. युगानुसार लोगों की प्रवृत्ति को देखकर तथा उनके लिये उपदिष्ट धर्म में विश्रृड लता देखकर धर्म के पुरातन सिद्धान्तों को नया रूप देकर उनसे पालन करवाने के लिये।&lt;br /&gt;उपर्युक्त कारणों के उपस्थित होने पर अवतार होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतिम अवतार के कारण&lt;br /&gt;अवतार के कारणों का संक्षिप्त विवेचन करके अब हम आपको अन्तिम अवतार के कारणों से परिचित कराना चाहते हैं।&lt;br /&gt;1. बर्बरता का साम्राज्य - लोगों में क्रूरता की भावना तथा अपनी आत्मा के महत्व को समझना तथा दूसरों के प्राणों की परवाह न करना। राजाओं में दुष्टता का संचार, करों का बढ़ा देना। सच्चे धर्म को बताने वालों पर ईटों का प्रहार।&lt;br /&gt;2. पेड़ों का न फलना फूलना, अगर फल फूल आएं भी, तो बहुत कम।&lt;br /&gt;3. नदियों में जल की कमी।&lt;br /&gt;4. अधर्म की वृद्धि - दूसरों को मार कर उनका धन लूट लेना, अधिकतर लड़कियों को मार कर पृथ्वी में गाड़ देना।&lt;br /&gt;5. असमानता का प्रचार - समान भावना का समाप्त हो जाना, ऊँच-नीच छुआ-छूत आदि का प्रकोप।&lt;br /&gt;6. ईश्वर को छोड़कर अन्य की पूजा - यद्यपि सृष्टि का नियामक एक ही परमेश्वर है, परन्तु उसको छोड़कर अन्य देवी देवताओं की पूजा, पेड़-पौधों एवं पत्थरों को ही भगवान मानने की प्रवृत्ति।&lt;br /&gt;7. भलाई की आड़ में बुराई - भलाई का आश्वासन देकर किसी को फंसा लेना, और उसका अनिष्ट करता। इसी को कपट कहते हैं।&lt;br /&gt;8. ई र्ष्या-द्वेष तथा बाह्य आडम्बरों का प्रसार - लोगों में सहानुभूति का अभाव हो जाना। आपस में एक दूसरे को शत्रुता के भाव से देखना।&lt;br /&gt;ईश्वर के प्रति श्रद्धा का अभाव हो जाना, वेषभूषा केवल दिखावे के ही लिये हो कि वे ईश्वर के भक्त हैं:&lt;br /&gt;9. धर्म के नाम पर अधर्म करना - धर्मसे-हीनता और अधर्म से अनुराग।&lt;br /&gt;10. साधुओं की रक्षा करना - अच्छे लोगों की समाज में दुर्गति देखकर उनकी रक्षा के लिये अंतिम अवतार।&lt;br /&gt;11. ईश्वराज्ञापालन का अभाव - लोगों में वेदों के प्रति श्रद्धाहीनता, और उनकी आज्ञाओं का पालन न करना।&lt;br /&gt;अन्तिम अवतार की विशेषतायें&lt;br /&gt;1. अश्वारोहण-पुराणों में अन्तिम अवतार के विषय में जहां कहीं भी वर्णन हुआ है उनकी सवारी अश्व (भ्वतेम) ही बताई गई है। वह अश्व वेग से चलने वाला होगा। अश्व के विशेषण में देवदत्त नाम आया है। देवदत्त का अर्थ है - देवताओं द्वारा दिया गया।&lt;br /&gt;2. खड्गधारण - अश्वारोहण के अतिरिक्त अन्तिम अवतार को खड्गधारी भी बताया गया है। (‘अश्वमाशुगमारूह्म देवदत्तं जगत्पतिः। असिनासाधुदमनमष्टैश्वर्यगुणान्वितः।।’ भागवत पु. 12-2-19 आठ ऐश्वर्यों और गुणों से युक्त जगत्पालक देवताओं द्वारा दिये गये वेगगामी अश्व पर चढ़कर तलवार से दुष्टों का दम करेंगे।)&lt;br /&gt;दुष्टों का संहार अन्तिम अवतार के द्वारा तलवार से है न कि एटम बम्ब आदि से। विचारणीय है कि यह समय अणुयुग है, न कि तलवार का युग। अवतार की सबसे बड़ी विशेषता है कि अपनी वेशभूषा तथा अस्त्र देश, काल और पात्र के अनुसार उसकी वेशभूषा भी रहती है।&lt;br /&gt;3. अष्टैश्वर्यगुणान्वित - उनमें आठों सिद्धियां एवं अच्छे गुणों का सन्निधाम पुराणों में बताया गया है।&lt;br /&gt;4. जगत्पति - पति शब्द ‘पा, (रक्षा करना) धातु में ‘डति’ प्रत्यय के संयोग से बना है। जगत् का अर्थ है संसार, अतः जगत्पति’ शब्द का अर्थ हुआ, संसार की रक्षा करने वाला।&lt;br /&gt;5. असाधुदमन - अन्तिम अवतार की सबसे प्रशंसनीय विशेषता यह है कि वह दुष्टों का ही दमन करेगा, (3,4, और 5वें वैश्ष्टिय की पुष्टि के लिये देखिये भागवतपुराण 12-2-19) न कि अच्छे लोगों का।&lt;br /&gt;6. चार भ्राताओं के सहयोग से युक्त - ‘भ्राता’ शब्द का अर्थ है सहायक। अन्तिम अवतार के सहायक चार होंगे, जो हर तरह से उसे सहायता देंगे।(‘चतुर्भिभ्र्रातृभिर्देव करिष्यामि कलिक्षयमम्’ कल्किपुराण अध्याय 2, श्लोक 5 हे देव! चार सहयोगियों के साथ मैं शैतान का नाश करूंगा।)&lt;br /&gt;7. देवताओं द्वारा उसकी सहायता - धर्म के प्रसार एवं दुष्टों का दमन करने में सहायता देने के लिये देवता भी आकाश से उत्तर आएंगे।&lt;br /&gt;8. कलि का निराकरण करने वाला - जिस अर्थ में ‘कलि’ शब्द प्रयुक्त होता है, उसी अर्थ में शैतान शब्द भी प्रयुक्त होता है। अन्तिम अवतार के द्वारा कलि अर्थात् शैतान की पराजय होगी।&lt;br /&gt;9. अप्रतिमद्युति - अन्तिम अवतार के शरीर में इतनी अधिक कान्ति रहेगी, कि उसकी उपमा नहीं दी जा सकती, (‘विचरत्राशुना क्षोणयां हयेना प्रतिमद्युतिः। नृपलिडच्छदो दस्यून्कोटिशोनिहनिष्यति।।’ भागवतपुराण 12-2-20 वेगगामी अश्व से पृथिवी में विचरते हुए अप्रतिम कान्ति वाले पर राजाओं के वेष में छिपे करोड़ों दुष्टों का संहार करेंगे।) और न उनके समान कान्तिमान और कोई अवतार ही हुआ।&lt;br /&gt;10. राजाओं के वेश में छिपे हुए दस्युओं का विनाश-अन्तिम अवतार के विषय में यह भी भागवत पुराण में है कि वह राजाओं में वेश में छिपे हुए दस्युओं का संहार करेगा।&lt;br /&gt;11. शरीर से सुगन्ध का निकलना - अन्तिम अवतार के शरीर से सुगन्ध निकलेगी, (‘अथतेषां भविष्यन्ति मनांसि विश्दानि वै। वासुदेवंगरागतिपुण्यगन्धानिलस्पृशाम्।।’ भागवत पुराण 12 स्कंध, 2 अध्याय, 21वां श्लोक)&lt;br /&gt;जो हवा में मिलकर लोगों के मन की निर्मल करेगी।&lt;br /&gt;12. बहुत बड़े समाज का उपदेशक बनना - अंतिम अवतार बहुत बड़े समाज का कल्याणकारी होगा। धर्म से दूर अत्याचारियों का दमन करके उन्हें सीधे रास्ते पर लगाएगा।&lt;br /&gt;13. माधवमास की द्वादशी शुक्ल पक्ष को जन्म - अन्तिम अवतार का जन्म शुक्लपक्ष की बारहवीं तिथि को माधवमास (वैशाख) में होगा। यह कल्कि पुराण से विदित है। (द्वादशां शुक्लपक्षस्य माधवे मासि माधवमः।&lt;br /&gt;जातो ददृशतुः पुत्रां पितरौ हृष्टमानसौ।।’ कल्कि पुराण, द्वितीय अध्याय, 15वां श्लोक।)&lt;br /&gt;14. शम्भल के प्रधान पुरोहित के यहां जन्म - शम्भल स्थान के प्रमुख पुरोहित विष्णुयश (‘शम्भलग्राममुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः। भवने विष्णुयशसः कल्किः प्रादुर्भविष्यति।।’ भागवतपुराण 12-2-18) के यहां जन्म होगा और माता का नाम सुमति (‘शम्भले विष्णुयशसो गृहे प्रादुर्भवाम्यहम्।’ कल्कि. अध्याय 2, श्लोक 4 ‘सुमत्यां विष्णुयशसा गभ्रमाधत्त वैष्णवम्’। कल्कि पुराण, अध्याय 2, श्लोक 11) होगा।&lt;br /&gt;ये सभी विशेषताएं अन्तिम अवतार में होंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्तिम अवतार का समय&lt;br /&gt;भारतीय धर्मग्रन्थों ने समय को चार भागों में विभाजित किया है।&lt;br /&gt;1. सत्ययुग - इस युग का नाम कृतयुग है। इसकी अवधि सत्रह लाख अट्ठारह हजार वर्ष है।&lt;br /&gt;2. त्रेतायुग - सत्ययुग के बाद त्रेतायुग आता है। त्रेतायुग का समय बारह लाख छियानवे हजार वर्ष तक है।&lt;br /&gt;3. द्वापर युग - ‘त्रेतायुग के बाद द्वापर युग आता है, इसकी अवधि आठ लाख चैसंठ हज़ार वर्ष है।’&lt;br /&gt;4. कलियुग - कलियुग की अवधि चार लाख बत्तीस हजार वर्ष है।&lt;br /&gt;अवतार भविष्य में होगा परन्तु अवतार के पूर्व ही अत्याचारों से दबकर पृथ्वी जमलग्न हो जाय, तो भावी अवतार से लाभ ही क्या? गीता में भी कहा गया है, कि जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब तब अवतार होता है। साधुओं की रक्षा के लिये तथा दुष्टों के संहार के लिये, एवं धर्म के स्थापना के लिये युग-2 में अवतार होता है। (यदा याद हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहंम्।।’ - भगवद्गीता) अब यह देखना है, कि जिन जिन परस्थितियों के बाद अवतार होता है, क्या वे परिस्थितियां बीत चुकीं या बीत रही है? इतना तो निश्चित ही है कि अन्तिम अवतार कलियुग में होगा, और कलियुग को आरम्भ हुये आज से पांच हजार उन्हत्तर वर्ष हो गये (‘गतकलिः 5039’ पंचाग 2025 सं.)। अंतिम अवतार का समय कलियुग के प्रायः बीत जाने पर या कुछ बीत जाने पर है (‘इत्थ कलौ गतप्राये जनेषु खरधर्मणि। धर्मत्राणाय सत्वेन भगवानवतरिष्यति।।’ भागवतपुराण 12 स्कंध, 2 अध्याय, 17 वां श्लोक)। परिस्थिति वह रहेगी, कि केवल अपना ही पेट पालना लोगों को अभीष्ट रहेगा।&lt;br /&gt;दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि अन्तिम अवतार उस समय होगा जबकि युद्धों में तलवार का प्रयोग किया जाता हो, और सवारियों में अश्व का प्रयोग होता हो। क्योंकि ‘भागवत पुराण में उल्लेख है, कि देवताओं द्वारा दिये गये वेगगामी अश्व पर चढ़कर आठों ऐश्वर्यों एवं गुणों से युक्त जगत्पति तलवार से दुष्टों का दमन करेंगे। (‘अश्वमाशुगमरूह्म देवदत्त जगत्पतिः। असिनासधुदमनमष्टैंश्वगुणान्वितः।’ भागवतपुराण 12 स्कंध, 2 अध्याय, 19वां श्लोक) यह तलवारों और घोड़ों का युग नहीं है, यह तो अणुबम्ब एवं टैंकों आदि का युग है। तलवार एवं घोड़ों का समय समाप्त हो चुका है अतः अन्तिम अवतार की स्थिति तलवारों एवं घोड़ों के युग में ही होनी सिद्ध होती है। आज से लगभग 1400 वर्ष पहले घोड़ों तथा तलवारों का प्रयोग होता था और उसके लगभग 100 वर्षों बाद से बारूद का निर्माण सोडा और कोयला के संयोग से अरब में होने लगा।&lt;br /&gt;जन्मतिथि का भी निरूपण होना आवश्यक है। कल्किपुराण में अंतिम अवतार का समय माधव मास, शुक्लपक्ष की द्वादशी तिथि दिया गया है। (द्वादशां शुक्ल पक्षस्य, माघवे मासि माघवम्। जातं............।।’ कल्कि पुराण, अध्याय 2, श्लोक 15।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्थान निरूपण&lt;br /&gt;यह तो निविवाद सिद्ध है कि अन्तिम अवतार का स्थान शम्भल ग्राम होगा। (‘शम्भले विष्णुयशसो गृहे प्रादुर्मवाम्यहम्।’ कल्कि पुराण, अध्याय 2, श्लोक 4।) केवल ग्राम के नाम से ही संतोष नहीं होता, जब तक कि उसका पूरा विवरण न हो। पहले यह निश्चय करना आवश्यक है, कि शम्भल ग्राम का नाम है या किसी ग्राम का विशेषण।&lt;br /&gt;शम्भल किसी ग्राम का नाम नहीं हो सकता, क्योंकि यदि केवल किसी ग्राम विशेष को शम्भल नाम दिया गया होता तो उसकी स्थिति भी बतलाई गई होती। परन्तु पुराणों में कहीं भी शम्भल ग्राम की स्थिति नहीं बतलाई गई है। भरत में खोजने पर यदि कहीं कोई शम्भल नामक ग्राम मिलता है, तो वहां आज से लगभग चैदह सौ वर्ष पहले कोई पुरूष ऐसा नहीं पैदा हुआ जो लोगों का उद्धारक हो। फिर अंतिम अवतार कोई खेल तो नहीं है कि अवतार हो जाय और समाज में ज़रा सा परिवर्तन भी न हो, अतः ‘शम्भल’ शब्द को विशेषता मान कर उसकी व्युत्पत्ति पर विचार करना आवश्यक है।&lt;br /&gt;1. ‘शम्भल’ शब्द ‘शम्’ (शान्त करना) धातु से बना है। अर्थात जिस स्थान में शान्ति मिले।&lt;br /&gt;2. सम् उपसर्गपूर्वक ‘वृ’ धातु में अप् प्रत्यय के संयोग से निष्पन्न शब्द ‘संवर’ हुआ। ‘वबयोरभेद’ और ‘रलयोरभेद’ के सिद्धांत से शम्भल शब्द की निष्पत्ति हुई, जिसका अर्थ हुआ जो अपनी ओर लोगों को खींचता है या जिसके द्वारा किसी को चुना जाता है।&lt;br /&gt;3. ‘शम्भल’ शब्द की निघण्टु (1/12/88) में उदकनामों में पाठ है। ‘र’ और ‘ल’ में अभेद होने के कारण शम्भल का अर्थ होगा जल का समीपवर्ती स्थान।&lt;br /&gt;लोगों को यह सन्देह होगा कि जब ‘शम्भल’ का अर्थ जल निकल रहा है, तो जल का समीपवर्ती स्थान या गांव अर्थ क्यों लिया गया? इसके उत्तर में मैं इतना ही बतला रहा हूं कि प्रसंग यहां ग्राम का है न कि जल का। जब गंगा में घोष शब्द से आप यह अर्थ करते हैं, कि गंगा के समीप स्थित गांव में घोष, न कि गंगा के जल के ऊपर घोष, तो आप शम्भल शब्द से वैसे ही क्यों अर्थ नहीं निकाल लेते? यदि गंगा में घोष, वाक्य में लक्षण मानते हैं, तो यहां भी लक्षण मानिये।&lt;br /&gt;अन्तिम अवतार के स्थान के विषय में केवल इतना ही विचारणीय है कि वह स्थान, जिसके आस-पास जल हो और वह स्थान आकर्षक एवं शान्तिदायक हो। अवतार की भूमि पवित्रा होती है, अतः उस स्थान में भी पवित्राता होनी चाहिये और हिंसा आदि नहीं होनी चाहिये। साथ ही साथ वह स्थान एक तीर्थ होना चाहिये। अर्थात् लोगों का धार्मिक स्थान हो।&lt;br /&gt;‘शम्भल’ का शब्दिक अर्थ है - ‘शान्ति का स्थान’, अन्तिम अवतार का स्थान शान्तिदायक, हिंसा और द्वेष में रहित होना चाहिये।&lt;br /&gt;अन्तिम अवतार के लिये आवश्यक नहीं कि वह भारत में ही हो और संस्कृत या हिन्दी ही बोले। भाषा, वेशभूषा तो केवल देश-काल पात्र के अनुसार होती है। यदि अवतारों के लिये एक ही प्रकार की भाषा, वेशभूषा तथा एक ही भाषा के नाम प्रयुक्त होते तो सभी देशों के अंदर होने वाले अवतारों की भाषा तथा वेशभूषा एक ही होती। यह कहना अज्ञानता है, कि अवतार केवल भारत में ही हो। क्या भारत ही ईश्वर का प्रिय स्थान है, और अन्य देश नहीं, अथवा क्या सृष्टि केवल भारत ही है और दूसरे देश नहीं।&lt;br /&gt;अतः अन्तिम अवतार भारत से बाहर भी हो सकता है और वहां उस देश की भाषा, रीति-रिवाज तथा वेषभूषा के अनुरूप उसको चलना होगा, परन्तु अधर्म एवं अन्याय के विरूद्ध।&lt;br /&gt;समय को दृष्टि में रखते हुये इतना तो स्पष्ट ही है, कि भारत में आज से लगभग तेरह-चैदह सौ वर्ष पूर्व कोई ऐसा व्यक्ति नहीं हुआ, जो अन्तिम अवतार की कसौटी पर खरा उतरे।&lt;br /&gt;जितने भी पुराण हैं, कल्कि के अवतार के विषय में सभी स्थान को ‘शम्भल’ बतलाते हैं। ‘सम्भल’ या ‘शम्भल’ शब्द एक ही हैं। अन्तिम अवतार ही सिद्धि प्रकरण में स्थान आदि का निर्धारण किया जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संसार के सामाजिक और धार्मिक पतन पतन का काल&lt;br /&gt;प्रत्येक महापुरूष के जन्म के पहले काफी संकटों की परिस्थिति आती है या यों कहिये कष्टमय दशाओं के बाद ही ईश्वर किसी महापुरूष को भेजता है। भारत की भी दशा आज से लगभग दो हज़ार वर्ष पहले ख़राब थी। प्राचीन भारत के इतिहास में सबसे अधिक अन्धकार और अत्याचारों का युग है जो लगभग पांच सौ ई. से प्रारम्भ होता है। वैदिक काल में मूर्तिपूजा का अभाव था, परन्तु इस समय मंदिरों में मूर्तिपूजा का सर्वत्रा प्रचलन और स्थापन हो गया था।(A History of Civilisation in Ancient India, Vol,3, Page 281)&lt;br /&gt;मंदिरों के पुजारी तरह-तरह की त्रुटियों का उद्गम बने, जो धार्मिक आडम्बरों से भोले-भाले यात्रियों को लूटते थे। A History of Civilisation in Ancient India, Vol,3, Page 243)&lt;br /&gt;नोट:- ‘वाचस्पत्यम्’ के अनुसार शम्भल में 60 तीर्थ हैं। वहां पर लात मनात नामक तीर्थ की भी स्थिति कुछ विद्धानों ने बताई है। लात मानत तथा कनात आदि 60 प्रसिद्ध मूर्तियों की प्राप्ति का स्थान शम्भल हैं, ऐसा मुसलमान विद्धान मानते हैं। मुसलमान विद्वान दारूल अमन को ही शम्भल कहते हैं।)&lt;br /&gt;वैदिक काल में सारी हिन्दू जाति में एकता तथा समानता का व्यवहार होता था, लेकिन अब जाति-पांति के कारण अन्तरंग भेद-भाव का बोलबाला हा गया था। वैदिक काल की वर्ण-व्यवस्था, जो स्वेच्छया अपनाने पर थी, अब जाति व्यवस्था बन गई थी। इससे सामाजिक संगठन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। (A History of Civilisation in Ancient India, R.C. Dutt, Vol,3, Page 308)&lt;br /&gt;स्त्रियों को दासता का पद प्रदान किया गया। A History of Civilisation in Ancient India, R.C. Dutt, Vol,3, Page 331)&lt;br /&gt;विधान इस प्रकार का बना जो प्रत्यक्ष रूप् से पक्षपातपरक था। ब्राह्मण चाहे कितना ही अत्याचार क्यों न करे, मृत्यु दण्ड का भागी कभी नहीं होता था। निम्न जाति द्वारा उच्च वर्ग की पत्नी से व्याभिचार मृत्यु दण्ड को दिलाता था, तथा उच्च जाति द्वारा निम्न जाति की पत्नी के साथ व्याभिचार करने से कुछ अर्थदण्ड दिया जाता था। यदि निम्न जाति का पुरूष उच्च जाति के पुरूषों को उपदेश दे, तो गरम तेल उसके मुख में छोड़ने का विधान था, गाली देने पर जीभ काटने का विधान था।&lt;br /&gt;A History of Civilisation in Ancient India, R.C. Dutt, Vol,3, Page 342-343)&lt;br /&gt;शराब पीना राजाओं के महत्व की बात थी, और राजमहिपी भी शराब के नशे में मदमस्त झूमती थी A History of Civilisation in Ancient India, R.C. Dutt, Vol,3, Page 469)&lt;br /&gt;मार्गो पर व्याभिचारियों का जमघट लगा रहता था।A History of Civilisation in Ancient India, R.C. Dutt, Vol,3, Page 469)&lt;br /&gt;ईश्वर की खोज जंगलों और पहाड़ों में की जाती थी। काल्पनिक और मनगढ़न्त विचारों का एवं भूत प्रेतों की पूजा का धर्म था।&lt;br /&gt;सम्भवतः इतनी बुरी अवस्था रोमन और पर्सियन साम्राज्य की पहले कभी नहीं थी, जितनी सातवीं शताब्दी के प्रारम्भ में हुई। बाईजेण्टाइन साम्राज्य के क्षीण हो जाने से सम्पूर्ण शासन भ्रष्ट हो चुका था और पादरियों के दुष्कर्मों और दुष्टताओं का परिणाम यह हुआ कि ईसाइ धर्म बहुत गिर गया, और इतनी खराब परिस्थिती हो गई कि आज उसकी वैसी कल्पना नहीं की जा सकती। उन बुरी परिस्थितियों को यदि स्पष्ट किया जाय, तो शायद कोई उस पर विश्वास न करे। यद्यपि उन बुराइयों का ऐसा प्रबल प्रमाण है, कि सन्देह लेशमात्र भी नहीं रह सकता। पारस्परिक संघर्षों और शत्रुता के कारण समाज मार्ग को भूल चुका था। शहरों और कस्बों में रक्त की धारा बहती थी। ईसामसीह ने सच ही कहा था, कि मैं शान्ति नहीं लाया हूं, अपितु तलवार लाया हूं।( Perhaps in no previous period had the empire of the persians of the oriental part of Roman empire, been in a more deplorable or unhappy state than at the beginning of the 7th century, In consequence of the weakness of the Byzantinc despots the whole frame of their goverment was in a state of complete dis-organization of the most frightful abuses and corruption of the priests, the Christian religion had fallen into a state of degradation scareely at this day concievably and such as would be absolutely iucredible had we not evidence of it the most unquestionable, The feuds and animosities of the almost innmerable sects had risento the greatest possible heights; the whole frame of society was loosened; the towns and cities flowed with blood. well, indeed had jesuss prphesied when he said he brought not peace, but a sword.---" Apology for Mohamed" by Godfrey Higgins, Page. 1)&lt;br /&gt;इस समय अरब के एक भाग में मोहम्मद साहब का धर्म उठा, जो रोमन साम्राज्य के संघर्षों से दूर था। इस धर्म के भाग्य में यही लिखा था कि यह तूफान की तरह से सम्पूर्ण पृथ्वी में छा जायगा, और अपने समक्ष बहुत से साम्राज्यों, शासकों और प्रथाओं को इस तरह उड़ा देगा, जैसे कि आंधी मिट्टी को उड़ा देती है। ("At this time, in a remote and almost unknown colner of Arabia, at a distance from ciril broils which were tearing to piecs of Roman empire, arose the reigion of Mohamed, a religion destined to sweep like a tornado over the face of the earth to carry before it empires, Kingdoms and systems, and to scatter them like dust before tha wind." ---" Apology for Mohamed" by Godfrey Higgins, Page. 2)&lt;br /&gt;अन्य ऐतिहासिक प्रमाणों से यह भी सिद्ध है कि मोहम्मद साहब के जन्म के पहले  ईसाइयों में कितनी बुराइयां फैल गई थी। (Translation of Hloy Quran by George Sale, First translation/ Preface on pages, 25/26) इसी प्रकार सेल ने कुरआन के अनुवाद की प्रास्तावना में लिखा है - गिरजाघर के पादरियों ने धर्म के टुकड़े-टुकड़े कर डाले थे, और शांति प्रेम एवं अच्छाइयां उनमें से दूर हो गई थीं। वे ‘मूल धर्म’ को भूल गये थे। धर्म के विषय में अपने तरह-तरह के विचार बनाये हुये परस्पर कलह करते रहते थे। इसी पृथ्वी में रोमन गिरजाघरों में बहुत सी भ्रम की बातें धर्म के रूप में मानी जाने लगी और मूर्तिपूजा बहुत ही निर्लज्जता से की जाने लगी।&lt;br /&gt;मोहम्मद साहब से पहले ईसाई धर्म और मूर्तिपूजा दोनों ने मिलकर एक नवीन रूप धारण कर लिया, जिसके कारण ईसाईयों में मूर्तिपूजा सामान्य हो गई, और एक ईश्वर के स्थान पर तीन ईश्वर माननीय हो गए और मरियम (ईसामसीह की मां) को ईश्वर नहीं मां समझा जाने लगा। (The History of Struggle between Science and Religion, by Draper (Noted from Siratun Nabi, Vol. IV, Page 227)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्तिम अवतार सिद्धि&lt;br /&gt;उपर्युक्त विवरणों में यह तो स्पष्ट ही किया जा चुका है, कि कल्कि अश्वारोही तथा खड्गधारी होगा। तलवार एवं अश्व का समय बीत चुका है, और अब जो जेट विमानों एवं अणुअस्त्रों को युग आ गया है। अन्तिम अवतार का काल निर्धारण आज से पूर्व ही सिद्ध होता है। अन्तिम अवतार के पूर्व की परिस्थितियां भी सिद्ध हो चुकी है, कि धर्म की हानि और अधर्म एवं अत्याचारों की वृद्धि होने पर अन्तिम अवतार की प्रक्रिया होगी। अब हम कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब का तुलनात्मक अध्ययन उपस्थित करते हैं।&lt;br /&gt;1. अश्वारोहण एवं खड्गधारण - भागवतपुराण, द्वादश स्कन्ध द्वितीय अध्याय के उन्नीसवें श्लोक से कल्कि का देवताओं द्वारा दिये गये अश्व पर चढ़ना एवं तलवार द्वारा दुष्टों का संहार करना उल्लिखित है। (‘अश्वमाशुगारूह्य देवदत्तं जगत्पतिः। असिनासाधुदमनमष्टैश्यर्यगुणान्वितः।।’ भागवत पुराण, द्वादश स्कन्ध द्वितीय अध्याय, 19वां श्लोक।) कल्कि का घोड़ा जो देवताओं द्वारा उन्हें दिया जायगा उत्तम रहेगा, उसी पर चढ़कर वह दुष्टों का संहार करेंगे। मोहम्मद साहब को भी फरिश्तों द्वारा घोड़ा मिला था, जिसका नाम बुर्राक़ था, (The picture of Burak was published in organiser, february 8, 1969) उस पर बैठकर मोहम्मद साहब ने रात्रि को तीर्थयात्रा की थी। ("He explained to ommehani, daughter of Abu Talib that during the night he had petrformed his devotions in the temple of Jerusalem. He was going forth to make his vision known, when she confijured him not this to expose himself to the derision of the unbelievers". Life of Mohomed, ' by Sir Villiam Muir, Page 125)&lt;br /&gt;मुहम्मद साहब को घोड़े अधिक प्रिय थे। और उनके सात घोड़े थे। (Ash us-siyar page, 565, Jamaul Favaid, Vol 2, page 179)&lt;br /&gt;अनस ने कहा है कि मैंने मुहम्मद साहब को देखा कि घोड़े पर सवार थे और गले पर तलवार लटकाये हुये थे। (बुखारी की हदीस)&lt;br /&gt;मुहम्मद साहब के पास नौ तलवारें थीं।&lt;br /&gt;1. कुल परम्परा से प्राप्त &lt;br /&gt;2. जुलफ़िक़ार नामक तलवार&lt;br /&gt;3. कलई नाम वाली तलवार। (असहुस्यिर, पेज 596)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2. जगद गुरू - भागवत्पुराण में अन्तिम अवतार को जगत्पति कहा गया है। (भागवतपुराण, द्वादश स्कन्ध द्वितीय अध्याय, 19वां श्लोक) जगत् का अर्थ है संसार और पति का अर्थ है रक्षक। जगत्पति शब्द का अर्थ हुआ कि अपने उपदेशों द्वारा गिरते हुये समाज को बचाने वाला। वह समाज कोई सीमित समाज तो हैं नहीं, वह समाज है संसार। तात्पर्य यह हुआ कि जगद् का गुरू। मुहम्मद साहब के लिये भी कुरान में कहा गया है, ‘ऐ मोहम्मद ऐलान कर दो सारीदुनिया भर के लिये नबी होकर तुम आये हो’। दूसरी जगह यह भी कहा गया है कि पवित्र है वह अस्तित्व, जिसने अपने भक्त पर पवित्र ग्रन्थ उतारा, ताकि सम्पर्ण संसार के लिये वह पापों का डर दिखाने वाला हो। (कुरआन, सूरे एराफ, आयत नं. 158)&lt;br /&gt;इस प्रकार जगद् गुरूत्व का अस्तित्व एवं महत्व दोनों ही सिद्ध होते हैं।&lt;br /&gt;3. असाधुदमन - कल्कि के विषय में उल्लेख है कि वह दुष्टों का दमन करेंगे। यही बात मुहम्मद साहब पर भी घटित होती है। उन्होंने भी दमन किया, तो दुष्टों का ही। कुरआन में भी यह कहा गया है, कि जिनको सताया गया है, उनको आज्ञा दी जाती है कि वे भी लड़ें, इस कारण से कि उन पर अत्याचार किया गया है (कुरआन, सूरे फुरक़ान, आयत नं. 1) और परमेश्वर उनकी सहायता पर पूरी शक्ति रखता है। जो लोग अपने घरों से निकाले गये, केवल इस बात पर कि ईश्वर उनका पालक है। मोहम्मद साहब ने लुटेरों और डाकुओं को सुधार कर उन्हें एकेश्वरवाद की शिक्षा दी, तथा ईश्वर की पूजा में और देवताओं के मिश्रण का विरोध किया तथा मूर्तिपूजा का भी खण्डन किया। उन्होंने जिस धर्म की स्थापना की, उसके विषय में कहा कि मैं प्राचीन धर्म को ही स्थापित कर रहा हूं। कोई यह नवा धर्म नहीं। ‘इस्लाम’ शब्द का अर्थ है, ईश्वर की आज्ञा का पालन कराने वाला धर्म और वेद शब्द भी ईश्वरीय वाणी है और उनकी आज्ञा पालन कराने वाला धर्म वैदिक है, अतः वैदिक धर्म और इस्लाम धर्म में साम्य है जो वैदिक या इस्लाम धर्म के मार्ग में बाधक है, उन्हें नास्तिक या काफ़िर कहा जाता है, उनसे विरोध की बात और उनके दमन की बात स्वाभाविक ही है।&lt;br /&gt;जिस परिस्थिति में मोहम्मद साहब का जन्म हुआ, वह परिस्थिति डाकुओं और दुष्टों से युक्त थी। लड़कियों को कत्ल कर दिया जाता था।&lt;br /&gt;उनके जन्म के पहले ईरान में तो कुबाद प्रथम बादशाह हुआ था, जो भज्दक के उपदेश से प्रभावित होकर यह घोषित कर चुका था (सीरतुन्नबी, वाल्यूम 4, पेज 215) कि धन और और सभी की हैं, उन पर किसी व्यक्ति विशेष का अधिकार नहीं। इसी के परिणाम स्वरूप व्यभिचार अपनी सीमा को पार कर चुका था। बाद में मोहम्मद साहब ही ऐसे व्यक्ति हुये जिनके वर्ग ने उन आतताइयों को पराजित करके धर्म की मर्यादा स्थापित करने में सफलता प्राप्त की।&lt;br /&gt;4. स्थान सम्बंधी साम्य - कल्कि का स्थान शम्भल होगा और वह वहां के पुरोहित के यहां जन्म लेंगे। (‘शम्भलग्राममुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः। भवने विष्णुयशसः कल्किः प्रादुर्भविष्यति।।’ भागवतपुराण, द्वादश स्कन्ध, 2 अध्याय, 18वां श्लोक) पुरोहित का नाम विष्णुयश होगा। इतना तो ज्ञात ही है कि उक्त नाम संस्कृत भाषा के हैं, जो या तो अर्थ को निर्धारित करके लिखे गये हैं, या तो उन नामों का विकृत रूप अरबी भाषा में हो गया है।&lt;br /&gt;संस्कृत प्रायः अर्थप्रधान नामों को महत्व देता है, अतएव उन नामों के अर्थ को ही स्वीकार करना अधिकार उपयुक्त है। ‘शम्भल’ शब्द ‘शान्त करना’ अर्थ वाली ‘शम्’ धातु से बना हुआ है, जिसमें ‘बन’ प्रत्यय लगा हुआ है। शम्भल शब्द का अर्थ होगा ‘शान्ति का घर’ और मक्का को अरबी भाषा में ‘दारूलअमन’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ ‘शान्ति का घर’ हैं&lt;br /&gt;5. प्रधान पुरोहित के यहां जन्म - कल्कि के विषय में यह कहा गया है कि वह प्रधान पुरोहित के यहां जन्म लेंगे। मोहम्मद साहब ने भी मक्का में काबा के प्रधान पुरोहित के यहां जन्म लिया।&lt;br /&gt;6. माता पिता सम्बंधी साम्य - कल्कि की माता का नाम कल्कि पुराण में सुमति (सोमवती) अया हुआ है जिसका अर्थ है, शांति एवं मननशील स्वभाव वाली। पिता का नाम विष्णुयश आया हुआ है, जो बहुत ही पवित्र तथा ईश्वर का उपासक होगा, मोहम्मद साहब की माता का भी नाम ‘अमिना’ था जिसका अर्थ होता है, शान्ति (अमन) वाली, तथा पिता का नाम ‘अब्दुल्लाह’ था। अब्दुल्लाह का अर्थ है अल्लाह अर्थात विष्णु का बन्दा। (कल्कि अवतार के पिता का नाम विष्णुयश होगा, विष्णु - अल्लाह यश - बन्दा यानी अब्दुल्लाह, कल्कि अवतार की माता का नाम सुमति (सोमवती) होगा। सोमवती - अमन व सलामती वाली यानी आमिना। इसका पिता इसकी पैदाइश से पहले फौत हो जायेगा और बाद में माता भी फौत हो जायेगी तारीख ने इसकी ताईद की सरवरे, पेज 10-11)                            7. अन्तिम अवतार की धारणा में साम्य - कल्कि को अन्तिम युग का अन्तिम अवतार बताया है (भागवतपुराण के 24 अवतारों के प्रकरण में कल्कि सबसे अन्तिम अवतार है। भागवतपुराण प्रथम स्कन्ध, तृतीय अध्याय, 25वां श्लोक।), मोहम्मद साहब ने भी घोषणा की है, कि मैं अन्तिम सन्देष्टा हूं। यही कारण है कि मुसलमान भावी किसी सन्देष्टा या अवतार को नहीं मानते।&lt;br /&gt;‘कल्कि’ शब्द का अर्थ ‘वाचस्पत्यम्’ तथा ‘शब्दकल्पतरू’ अनार का फल खाने वाले तथा कलंक को धोने वाले किया गया है। मोहम्मद साहब भी अनार और खजूर का फल खाते थे, तथा उन्होंने प्राचीन काल से आगत मिश्रण (शर्क) और नास्तिकता (कुफ्ऱ) को धो दिया।&lt;br /&gt;8. उत्तरदिशिगमन तथा उपदेश सम्बंधी साम्य - कल्कि पुराण में उल्लिखित है, कि (सरवरे आलम, पेज 10) कल्कि पैदा होने के बाद पहाड़ी की तरफ चले जायेंगे और वहां परशुराम जी से ज्ञान प्राप्त करेंगे बाद में उत्तर की तरफ जाकर फिर लौटेंगे। मोहम्मद साहब भी जन्म लेने के कुछ समय बाद पहाड़ियों की तरफ चले गये और वहां जिब्रील द्वारा ज्ञान प्राप्त किया, अर्थात उन पर कुरआन की आयतों का उतरना शुरू हुआ। उसके बाद वे उत्तर मदीने जाकर वहां से फिर दक्षिण की ओर लौट आये और अपने स्थान को विजित किया, (‘परशुराम कल्कि अवतार को गुफा में ले जाकर तालीम देंगे, परशुराम - जिब्रील, या रूहुलकुदुस। गुफा - ग़ार यानी गारेहिरा का वाक्या।’ सवरे आलम, पेज 11) यही घटना कल्कि के विषय में भी घटने की पुराणों द्वारा घोषणा है।&lt;br /&gt;9. शिव द्वारा कल्कि को एक घोड़ा दिया जाना (शिव कल्कि अवतार को एक घोड़ा देंगे जो अजीबो ग़रीब सिफ़त रखता होगा। शिव यानि खुदा और घोड़े का इशारा बुर्राक़ की तरफ़ है। सरवरे आलम, पेज 11) शिव कल्कि को एक घोड़ा देंगे जो बहुत ही चमत्कारों से युक्त होगा। मोहम्मद साहब को भी बुर्राक़ नाम का चमत्कारी घोड़ा मिला था, जो ईश्वर से उन्हें प्राप्त हुआ था।&lt;br /&gt;10. चार भाइयों के साथ कलि का निवारण - कल्कि पुराण में उल्लेख है कि (चतुर्भिभ्र्रातृभिर्दिव करिष्यामि कलिक्षयम्। कल्कि पुराण, अध्याय 2, श्लोक 5।) चार भाइयों के साथ कल्कि कलि (शैतान) का निवारण करेंगे। मोहम्मद साहब ने भी चार साथियों के साथ शैतान का निवारण किया था। ये चार साथी थे 1. अबूबक्र 2. उमर 3. उस्मान और 4. अली। ( 632 A. D. to 661. A. D. the orthodox caliphate including the first four Calibhs.--- Encyclopedia of World History. by W. L. Langer page 184)&lt;br /&gt;बाद में ये ही ख़लीफ़ा हुये जिन्होंने मोहम्मद साहब के एकेश्वरवाद और आडम्बर विहीन धर्म का प्रचार किया।&lt;br /&gt;11. देवताओं द्वारा सहायता - कल्कि पुराण में उल्लेख है, कि देवताओं द्वारा कल्कि को युद्धों में सहायता मिलेगी (यात पूयं भुवं देवाः स्वांशावतरणे रतः। कल्कि पुराण, अध्याय 2, श्लोक 7।)। यही बात मुहम्मद साहब के भी विषय में हुई कि बद्र की लड़ाई में फरिश्ते उनकी सहायता के लिये उतरे।&lt;br /&gt;कुरआन में लिखा है कि ‘अल्लाह ने तुमको बद्र की लड़ाई में मदद दी और तुम बहुत कम तादाद (संख्या) में थे, तो तुमको चाहिये कि तुम अल्लाह ही से डरो और उसी के शुक्रगुजार होओ। जब तुम मोमिनीन से कह रहे थे कि क्या तुम्हारे लिये काफ़ी नहीं है, कि तुम्हारा रब तुमको तीन हज़ार फरिश्ते भेजकर मदद करें, बल्कि अगर तुम सब्र करो और अल्लाह से डरते रहो। तो अल्लाह तुम्हारी मदद पांच हज़ार फरिश्तों से करेगा’(कुरआन, सूनः आल इमरान आयत नं. 123,124,125।)। ‘जब तुमने अपने रब से मदद मांगी, तो तुम्हारे रब ने मंजूर किया कि मैं तुम्हारे लिये एक हज़ार फरिश्ते मदद को भेजूंगा (कुरआन, सूरे अनफाल, आयत नं. 9)।&lt;br /&gt;ऐ ईमान वालों, अल्लाह की उस कृपा का स्मरण करो, जब तुम्हारे विरूद्ध सेनायें आईं तो हमने उनमे विरूद्ध पवन और ऐसी सेनायें भेजीं, जिनको तुम नहीं देखते थे, और जो कुछ तुम कर रहे थे,वह अल्लाह देख रहा था (कुरआन, सूरः अहजाब, आयत नं. 9)।&lt;br /&gt;12. अनुपमकान्ति से युक्त - कल्कि से विषय में उल्लेख है कि वे अनुपम कान्ति से युक्त होंगी, अर्थात वे इतने अधिक सुन्दर होंगे कि उनकी उपमा नहीं दी जा सकती (‘विचरन्नाशुना क्षोणयां हयेनाप्रतिमद्युतिः। नृपलिंगप्तछदो दस्यून् कोटिशोनिहनिष्यति।।’ भागवत पुराण, द्वादश स्कन्ध, द्वितीय अध्याय, 20वां श्लोक।)। मोहम्मद साहब के भी विषय में कहा गया है कि मोहम्मद साहब सभी आदमियों से अधिक सुन्दर थे और सभी मनुष्यों में अधिक आदर्शवान् एवं योद्धा थे (जाम उल फवायद पेज 178 बुखारी की हदीस में अनस का बयान)।&lt;br /&gt;13. जन्मतिथि सम्बंधी साम्य - कल्कि पुराण में कल्कि के जन्म की तिथि के सम्बंध में लिखा है कि माधव मास में शुक्लपक्ष द्वादशी को जन्म होगा (‘द्वादश्यां शुल्कपक्षस्य माधवेमासि माधवम्’ कल्कि पुराण, अध्याय 2, श्लोक 15।) और मोहम्मद साहब का जन्म भी बाहर रबीउल अव्वल को हुआ था (असह उस्सियर, पेज 49)। बारह रबीउल अव्वल का अर्थ है, चांद की बारहवीं तिथि अर्थात शुल्कपक्ष द्वादशी।&lt;br /&gt;14. शरीर से सुगन्ध का निकलना - श्री मद्भागवत पुराण के अनुसार कल्कि के शरीर से निकली सुगन्ध से लोगों के मन निर्मल हो जाएंगे। उनके शरीर की सुगन्ध हवा में मिलकर लोगों के मन को निर्मल करेगी (‘अथ तेषां भविष्यन्ति मनांसि विशदनि वै। वासुदेवाडरागतिपुणयगन्धानिलस्पृशाम।’ भागवतपुराण, द्वादश स्कंध, द्वितीय अध्याय, 21वां श्लोक।)।&lt;br /&gt;मोहम्मद साहब के शरीर की खुश्बू तो प्रसिद्ध ही है। मोहम्मद साहब जिससे हाथ मिलाते थे, उसके हाथ से दिन भर सुगन्ध आती रहती थी (शिमाएल तिरमिज़ी - अनुवादक मौलाना मोहम्मद ज़करिया, पेज 208)। मोहम्मद साहब के नौकर ने कहा था कि मोहम्मद साहब के शरीर की सुगन्ध वायु को सुगन्धित कर देती है थी, जब वह घर से बाहर निकलते थे ("Anas, his servant, says, "We always used to know when Mohamet had issued forth fume that filled the air." IFE OF MOHAMED by Sir William Muir. page 342.)&lt;br /&gt;एक बार उम्मेसुलैन ने मोहम्मद साहब के शरीर का पसीना इकट्ठा किया। मुहम्मद साहब के पूछने पर उसने बताया कि इसे हम खुशबूओं में मिलाते हैं, क्योंकि यह सभी सुगन्धों से बढ़ कर है।&lt;br /&gt;15. अष्टैश्वर्यगुणान्वित - भागवत पुराण 12 स्कन्ध द्वितीय अध्याय में कल्कि को ‘अष्टैश्वर्यणान्वित’ (आठ ईश्वरीय गुणों से युक्त) कहा गया है। वे आठ ईश्वरीय गुण हैं - प्रज्ञा, कुलीनता, इन्द्रिय-दमन, श्रुतिज्ञान, पराक्रम, थोड़ा बोलना, दान और कृतज्ञता (‘अष्टौ गुणाः पुरूषं दीपयान्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुत च। पराक्रमश्चबहुभाषिता  च’ दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च’।। महाभारत)।&lt;br /&gt;(क) प्रज्ञा - ऊंचा ज्ञान विषयक साम्य भी मोहम्मद साहब से है। भूत, भविष्य और वर्तमान की सभी बातें बताने में मोहम्मद साहब पूर्ण समर्थ थे, इस बात के समर्थन में अनेकों उदाहरण मोहम्मद इनायत अहमद की ‘अलकलामुलमुबीन’ पुस्तक में मिल जाएंगे। प्रमाण रूप में उस पुस्तक में इतिहास संक्षेप में यह है - रोमियांे और ईरानियों की लड़ाई में रोमी जब परास्त हुये, तो मोहम्मद साहब ने अपनी परोक्षदर्शिता से इस घटना को अपने मित्रों से बताया। उनके मित्रों से इस घटना को जानकर कुरैशी (विरोधी) बहुत प्रसन्न हुआ, परन्तु एक फरिश्ते से ‘9 वर्ष के अन्दर रूमियों की होने वाली विजय’ की भविष्य वाणी को सुनकर मोहम्मद साहब के मित्रा अबूबक्र से एक दो हजार ऊंटों के हार जाने की शर्त रखी, अन्त में 9 वर्षों के अन्दर नैनवा (Ninevah)के युद्ध में रूमियों की विजय 627 ई. में हुई इसी विषय से सम्बंधित ‘सूरे रूम’ नामक कुरान की 30वीं सूरत उत्तरी है इसी प्रकार के अनेकों उदाहरण, जो उनकी दूरदर्शिता से सम्बंधित है, इतिहास से ज्ञात है।&lt;br /&gt;(ख) कुलीनता - ‘कल्कि मुख्य ब्राह्मण के परिवार से सम्बद्ध होंगे’, इसकी पुष्टि ऊपर हम कर चुके हैं। मोहम्मद साहब भी ऊंचे पुरोहित परिवार में पैदा हुये थे। उनका परिवार पवित्रा काबा का संरक्षक था (He was born in A.D. 571, and came of the noble tribe of the Koreysh, who had long been guardians of the sacred Kaaba. Page - MMVI of Intorduction. the speeches of Mohammad, by Lane-Poole, Published by macmillan and Co. (London).&lt;br /&gt;मोहम्मद साहब का जन्म 571 ई. में कुरैश की पंक्ति में हाशिम के परिवार में हुआ था, जो अरब के निवासियों द्वारा माननीय तथा काबा का परम्परागत संरक्षक था ('He sprung from  toe trible of Koretsh and the family of Hashem. the most illustrious of the Arabs, the princes of Macca, and the hereditary guadians of the Caaba'. Page- 229, Vol5, Decline and fall of the Roman Empire, by Edward Nibbon Published from E.P. eutou and Co. Newyork. 1910 A.D.)&lt;br /&gt;(ग) इन्द्रियदमन - आठ ईश्वरीय गुणों में तीसरा गुण है - इन्द्रियों को वश में करना। भारतीय धर्म ग्रन्थों में कल्कि के विषय में कहा गया है, कि कल्कि इन्द्रिय दमन करने वाले होंगे। मोहम्मद साहब के विषय में कहा गया है कि वह आत्मप्रशंसा से हीन, दयालू, शान्त, इति, इन्द्रियजीत और उदार होंगे ('Modestry and kindliness, patience, self denial, and reveted the affections off all around him.' Page 525, 'Life of Mohamet' by - Sir William Muir, Published by smith, Elder and Co. (London) 1877. A. D.)&lt;br /&gt;‘इन्द्रियदमन’ का अर्थ है, कि इन्द्रियों को वंश में करना। इन्द्रियों मन के अधीन होकर काम करतीं हैं अतएवं मन को वश में करना ही इन्द्रियों को वश में करना है। यदि कोई यह आपत्ति करे, कि जो पुरूष 9 विवाह करे, उसको घोर कामी या भोग विलासी छोड़कर इन्द्रियों को वश में करने वाला कैसे कहा जा सकता है? तो उन्हें यह ज्ञात होना चाहिये कि योगिराज श्री कृष्ण की पटरानियां क्या संख्या में छः से अधिक नहीं थीं? योगी तो सांसारिक भोग विलासों के अन्तर्गत रहकर भी निष्काम भावना के कारण मुक्त हो जाता है। जैसे कमल का पत्ता जल में रहते हुये भी जल से परे रहता है, वैसे योगी पुरूष (ईश्वर को प्राप्त करने वाला) भी संसार के भोगों द्वारा 9 पत्नियों का रखा जाना लोकोत्तर पुरूषत्व का ही द्योतक है, न कि इससे इन्द्रियदमनकारी होने में कोई कमी आती है।&lt;br /&gt;(घ) ‘श्रुतं - श्रुतं आठ ईश्वरीय गुणों में चोथा गुण है।’ ‘श्रुतं का अर्थ है, जो ईश्वर के द्वारा सुनाया गया और ऋषियों या पैगम्बरों द्वारा सुना गया हो। ‘श्रुतं शब्द ‘श्रुं’ (सुनना) धातु से बना है। ईश्वरीय ज्ञान जिस ग्रंथ में हो, उसे ‘श्रुतं कहा जाता है। मोहम्मद साहब पर फरिश्ते द्वारा ईश्वरीय ज्ञान उतारा जाता था, जिसे वह्य भी कहा जाता है। लेनपूल इस बात का समर्थन करते हैं, कि मोहम्मद साहब पर देवदूत की सहायता से ईश्वरीय वाणी का भेजा जाना निःसन्देह सत्य है ( These are the first revelations, that came to Mohammad. That he belived, he heard them , spoken an agles from heaven is beyod doube., page xxxi, Introduction, speeches of Mohammad, by Lane-poole.)।&lt;br /&gt;आर.वी. स्मिथ भी इस बात से सहमत है, कि एक वह्य में मोहम्मद साहब सन्देष्टा का पद पाने वाले घोषित किये गये है ('Upon this, Mohammad felt the heavenly inspiration, and read, as he believed, the deeres of God, which he after words, promulgated in Koran. Then came the announcement, 'O, Mohamed, of a truth thou art the prophet of God and I am his angle Gabriel" This was the crisis of Mohamed's life, It was his call to renonce and to take the office of prophet, Page 98, Mohamed and Mohamednisu. by rev. Bosworth smith)&lt;br /&gt;सर विलियम म्योर ने भी मोहम्मद साहब के विषय में लिखा है कि वह संदेष्टा तथा ईश्वर के प्रतिनिधि थे (He was now the servant, the prophet, the vice gerent of God. page 48. Life of Mohamed, by Sir William Muir.)&lt;br /&gt;इस प्रकार मोहम्मद साहब और कल्कि अवतार की समानता दृष्टिगोचर होती है।&lt;br /&gt;(ड.) पराक्रम - अष्टगुणों में ‘पराक्रम पांचवा गुण है। शारीरिक शक्ति में मोहम्मद साहब काफी बढ़े हुये थे। इसके उदाहरण के रूप में एक पहलवान जिसका नाम रकाना था, का वृतान्त उपस्थित किया जा रहा है। किसी गुफा में अकेले उपस्थित रकाना पहलवान, जो कुरैश से सम्बंधित था, से मोहम्मद साहब ने ईश्वर से न डरने और ईश्वर पर विश्वास न करने का कारण पूछा जिस पर पहलवान ने सत्य की स्पष्टता के लिए कहा। तब मोहम्मद साहब ने कहा, कि तू तो बड़ा वीर है, यदि कुश्ती में मैं तुझे नीचा दिखाऊँए तो क्या विश्वास करेगा? उसने स्वीकारात्मक उत्तर दिया, तब मोहम्मद साहब ने उसे दो बार परास्त किया, फिर भी उस पहलवान ने मोहम्मद साहब को पैग़म्बर न माना, तथा ईश्वर की सत्यता पर विश्वास न किया (देखिये ‘असह उस-सियर’, पेज 97 तथा ‘Life of Mohamed का पेज 525, by Sir W. Muir)&lt;br /&gt;(च) अबहुभाषिता - ‘अबहुभाषिता’ का अर्थ है - थोड़ा बोलना। थोड़ा बोलना महान् पुरूष का बहुत बड़ा गुण माना जाता है। मोहम्मद साहब भी अधिकतर मौन रहा करते थे, परन्तु जो कुछ बोलते थे, वह इतना प्रभावोत्पादक होता था, कि लोग उसकी बातें नहीं भूलते थे ('He was of great taciturnity, but when he spoke, it was with emphasis and deliberation, and no one could gorget what he said.' page- xxix, Introduction The speeches of Mohammad' by Lane-pool.)&lt;br /&gt;पारस्परिक वार्तालाप में मोहम्मद साहब शान्त ही रहते थे, परन्तु अरब के लोग उनकी बातें सुनना बहुत पसन्द करते थे (In his intercourse with others, he would sit silent among his companions for a long time together, but truely was more eloquent tham other men's speech, for the moment, speech was called for, it was forth coming in the shape of some weighty apothegm of proverb such as Arabs love to hear.'page- 110 ' Mohammed and Mohammadenism' by R. Bos Worth smith)&lt;br /&gt;(छ) दान - ‘दान’ धर्म का आवश्यक अंग है। दीनों को दान देना आठ गुणों में सातवां गुण है, जो पुरूष को आलोकित करता है। लगभग प्रत्येक महापुरूष ने इसे स्वीकृत किया है। कल्कि को तो ‘अष्टैश्वर्यगुणान्वित’ कह कर पुराणों द्वारा उनमें आठों गुण का सन्निवेश कर दिया गया है। मोहम्मद साहब दान देने में सतत लगे रहते थे। उनके घर में गरीबों की जमघट लगा रहती थी ('Indeed, outside the prophet's house was a bench or gallery, on which were always to be found a number of poor, who lived entirely upon his generosity and were hence called, 'the people of the bench. page - xxx Introducion, the speeches of Mohammed by _ lane-poole.)&lt;br /&gt;वे किसी को निराश नहीं करते थे। सरविलियम म्योर ने भी मोहम्मद साहब को बहुत सुन्दर स्वरूप वाला, पराक्रमी तथा दानी बताया है ( He was, says and admiring follower, the handsomest and bravest, the bright faced and most generous of men.' page 523, The life of Mohamet, by Sir William Muir)&lt;br /&gt;(ज) कृतज्ञता - आठ दैवी गुणों में कृतज्ञता (किये गये उपकार को समझना) अन्तिम गुण है। इस गुण के अभाव में कोई भी महापुरूषत्व को नहीं प्राप्त करता है। कल्कि में ‘कृतज्ञता’ को लेकर आठों गुणों की स्थिति की भविष्यवाणी पुराणों में है, जैसे कि पहले हम स्पष्ट कर चुके हैं। मोहम्मद साहब ने भी ऊपर 7 गुणों की स्थिति स्पष्ट हो चुकी, और कृतज्ञता की उनमें स्थिति को कोई भी इतिहासकार अस्वीकार नहीं कर सकता। अन्सार के प्रति कहे गये वाक्य मोहम्मद साहब की कृतज्ञता का स्पष्टीकरण करते हैं (Asah us siyar, page 343)&lt;br /&gt;16. ईश्वरीय वाणी का उपदेष्टा - कल्कि के विषय में यह बात भारत में प्रसिद्ध ही है कि वह जो धर्म स्थापित करेंगे वह वैदिक धर्म होगा और उनके द्वारा उपदिष्ट शिक्षाएं ईश्वरीय होगी। मोहम्मद साहब के द्वारा अभिव्यक्त कुरआन ईश्वरीय वाणी है, यह तो स्पष्ट ही है, भले ही हठी लोग इस बात को न मानें, क्योंकि कुरआन ने जो नीति, सदाचार, प्रेम, उपकार आदि करने के लिए प्रेरणा के स्रोत विद्यमान हैं, वही वेद भी हैं। कुरआन में मूर्ति पूजा का खण्डन, एकेश्वरवाद (तौहीद) की शिक्षा परस्पर प्रेम के व्यवहार का उपदेश है, वेद में एकं सत्’ तथा विश्वबन्धुत्व की उत्कृष्टा घोषणा है। वेदों में ईश्वर की भक्ति का आदेश है और कुरआन की शिक्षा के अनुसार मुसलमान दिन में पांच बार नमाज़ अवश्य पढ़ते हैं, जबकि ब्राह्मण वर्ग में विरले लोग ही त्रिकाल संध्या करने वाले मिलेंगे। इस प्रकार हम देखते हैं कि कल्कि और मोहम्मद साहब के विषय में एक सी बातें हैं। अब उपसंहार के रूप में हम वेदों और कुरआन की मूल शिक्षाओं की समानता पर विचार प्रस्तुत करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेदों और क़ुरआन की शिक्षायें&lt;br /&gt;1. ईश्वर वह है, जिसके अतिरिक्त कोई दूसरा पूज्य नहीं, वह सदा रहने वाला और स्वयं अपने में स्थित है और जितनी वस्तुएं हैं, उसी पर आधारित हैं। जब तक उसकी आज्ञा न हो, कोई उसके प्रबंध में व्याघात नहीं डाल सकता, वह हमारे आगे और पीछे की सब बात जानता है और उसके ज्ञान के भंडार से केवल उतना ही जान सकते हैं जितना वह चाहे, आकाश और पृथ्वी सब उसके ज्ञान के क्षेत्रा में सम्मिलित हैं, वह इन सबको संभाले हैं, वह कभी थकता नहीं, यह सबके ऊपर और सबसे बड़ा है (कुरआन 2-255)।&lt;br /&gt;उपनिषदों के ‘एक ब्रह्म द्वितीय नास्ति, मेहनानास्ति किंचन’ का अर्थ यह है कि वह ईश्वर एक है, उसके अतिरिक्त दूसरा नहीं है, यहां तो उसके बिना कुछ है ही नहीं, अर्थात जगत् का अस्तित्व तभी तक है, जब तक ईश्वर की सत्ता जगत् को संभाले है। यदि ईश्वर की सत्ता को अस्वीकृत की किया जाय, तो जगत् का अस्तित्व ही नहीं रहेगा।&lt;br /&gt;2. जिसको कोई भी चक्षु के द्वारा नहीं देख सकता अपितु जिससे नेत्रा अपने विषयों को देखता है, उसे ही तू ब्रह्म जान (यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूषि पश्यति। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदतुपासते।। - केनोपनिषद् (सामवेद तलवकार(ब्राह्मण), खण्ड 1, मंत्रा 6)। कुरआन में कहा गया है कि आंख उसे नहीं देख सकती पर वह सब आंखों को देखता है (कुरआन, 6-102 से 104।)।&lt;br /&gt;3. तू हमें सीधे रास्ते पर ले चल (कुरआन सूर 1, आयत 5)। ऋग्वेद में भी कहा गया है कि हे प्रकाशक परमेश्वर हमें सुन्दर रास्ते से ले चलो (‘अग्नेनय सुपथा राये.’ ऋग्वेद 1.181,1 वा य 3, 36, 7,43, 40, 16 तै. सं. 1.1.14, 3, 4, 43, 1, तै. ब्रा. 2.8, 2, 3 तै आ. 1.8.8, शतब्रा 14.8.3.1)&lt;br /&gt;4. कह दो कि ईश्वर एक है, बाकी सब उसी के आश्रय है। न वह कभी जन्म लेता है और न किसी को जानता है। उसके जोड़ का कोई दूसरा नहीं है। परमेश्वर एक है, सभी प्राणियों में व्याप्त है, सभी कर्मो का अध्यक्ष है, सभी के ऊपर है, सबका साक्षी (गवाह) है, सब कुछ जानता है, और निगुर्ण है (एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः, साक्षी जेता केवलो निर्गुणश्च।। श्वेताश्वतर उपनिषद् अध्याय 6, मंत्रा 11)।&lt;br /&gt;5. ईश्वर सत्य (अल्लाह हक है) (कुरआ 21.62।)। वेदान्त में कहा गया हे थ्क् ‘सत्यं ब्रह्म’ अर्थात ब्रह्म सत्य है।&lt;br /&gt;6. जिधर भी तुम मुंह करा, उधर ही परेमश्वर का मुख (कुरआन 2.115।)। गीता में कहा गया है कि ‘विश्वतोमुखम्’ अर्थात उसके सब तरफ मुख हैं (‘सहस्रशीर्षापुरूषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमि विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलाम्।।’ ऋग्वेद 10909 सामवेद 617, अर्थवेद 19.61 वा. य. 31.1, तै आ. 3-12.1)।&lt;br /&gt;7. वेदों में और गीता तथा स्मृतियों में एक ईश्वर की भक्ति करने का आदेश है तथा अपनी की हुई बुराईयों की क्षमा मांगने के लिए भी उसकी ईश्वर से प्रार्थना करने का आदेश है। कुरआन में भी कहा गया है, कि ऐ नबी कह दो! मैं तो केवल तुम्हारे जैसा एक मनुष्य हूं। मेरी ओर वह्य की जाती है कि तुम्हारा इलाज (पूज्य) अकेला पूज्य है, तो तुम सीधे उसी की ओर मुख करो और क्षमा भी उसे से मांगो (कुरआन अस-सजदः। अध्याय 41, आयत नं. 6)।&lt;br /&gt;8. वेदों (ईश्वरीय वाणी या ईश्वराज्ञा) पर श्रद्धा न करना एवं उसके उपदेशों को न मानना ‘नास्तिकता’ है। ‘नास्तिकता’ का अर्थ है कि ‘अस्वीकार करना’। कुरआन में भी काफिर शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। ‘कुफ्र’ का अर्थ है, ‘अस्वीकार करना’ या ‘भुला देना’। ईश्वर तथा पैगम्बरों का न मानने वालों के मुख से कहलाया गया है कि ‘जो कुछ तुम कहते हो उसकी तरफ से हम ‘कफिर’ हैं (अर्थात उसको हम अस्वीकार करते हैं) (कुरआन 34.34)।&lt;br /&gt;9. मुसलमान का अर्थ है कि ईश्वर की आज्ञा को मानने वाला। तात्पर्य यह कि ईश्वर पर, ईश्वरीय वाणियों पर तथा आप्त पुरूषों पर जो ईमान लाया, वही है मुसलमान। ठीक उसी शब्द के अनुरूप संस्कृत साहित्य में ‘आस्तिक’ शब्द आया है ‘आस्तिक’ का अर्थ है, ईश्वर, ईश्वरीयवाणी, आप्त पुरूषों पर श्रद्धा रखने वाला। जिस प्रकार आप्त पुरूषों की वाणी को संस्कृत साहित्य में आगम प्रमाण माना गया है। ‘काफिर’ का ठीक विलोम ‘मुसलमान’ है और ‘नास्तिक’ का ठीक विलोम आस्तिक। काफिर से कोई मुसलमान तर्क करना नहीं चाहेगा और न तो नास्तिक से कोई आस्तिक भी बात करना स्वीकार करेगा। भारत में पचहत्तर प्रतिशत आस्तिक तथा पच्चीस प्रतिशत नास्तिक हैं। पढ़े लिखे समाज में नास्तिकों की संख्या अधिक है। नास्तिक और काफिर एक दूसरे के भाषान्तर हैं और मुसलमान और आस्तिक भाषान्तर हैं।&lt;br /&gt;10. रही बात ‘हिन्दू’ शब्द की, सो यह शब्द बिल्कुल ही नवीन शब्द है। प्राचीन भारतीय धर्म को आर्य धर्म कहा जाता था या सनातन धर्म।&lt;br /&gt;आर्य धर्म का अर्थ है श्रेष्ठ धर्म (आर्यधर्मो कि ते राजन् सर्वधर्मोत्तमः स्मृतः। ईशाज्ञया कर्रिष्यामि पैशाचं धर्मदारूणम्।। भविष्यपुराण प्रतिसर्गपर्व, तृतीय खण्ड, अध्याय 3,24 वां श्लोक।), और सनातन धर्म का अर्थ है, सब दिन से चला आने वला धर्म। सना - सब दिन। तन - चला आने वाला। वेद की संस्कृत के ‘सकार’ को फारसी तथा ईरानी (ग्रीक) में हकार कहा जाता है। ग्रीक के लोग सिन्धु तट तक आते थे और ‘सिन्धु के सकार को हकार में बदल कर ‘हिन्द’ शब्द बना दिये, ‘स्थान’ को ‘स्तान’ उच्चारण करके ‘हिन्दुस्तान’ और वहां रहने वाले लोगों को ‘हिन्दू’ कहने लगे। उन्हीं लोगों से सम्पर्क से संस्कृत साहित्य से अनभिज्ञ लोग भी हिन्दू और हिन्दुस्तान का उच्चरण करने लगे। मुसमानों के राज्य से भारत को ‘हिन्दुस्तान’ और भारतीयों को हिन्दू कहा जाने लगा तथा अंग्रेजों ने ‘हिन्द’ शब्द में अपनी भाषागत विशेषता के कारण (हिन्द) ‘hind’ के ‘H’ का लोप करके Ind  इण्ड&lt;br /&gt;और indo तथा देश सूचक ia जोड़कर india (इण्डिया) शब्द बना लिया। इण्डिया में रहने वाले इण्डियन कहे जाने लगे। अतएव भारतीय, हिन्दू और इण्डियन शब्दों का एक ही अर्थ हुआ। भारत हिन्दुस्तान, इण्डिया में रहने वाला। यदि कोई भारत हिन्दुस्तान तथा इण्डिया को एकार्थक न माने तो उसकी अल्पज्ञता है। भारत में रहने वाला ईसाई, मुसलमान, द्रविड़, कोल, किरात, भिल्ल पारसी, संथाल आदि सभी हिन्दू (हिन्दी) हैं, सभी इण्डियन हैं, सभी भारतीय हैं। यह भाषा विज्ञान से सिद्ध है। हिन्दू धर्म, इण्डियन धर्म, सनातन या आर्य धर्म में भेद नहीं है। भेद केवल भाषा का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपसंहार&lt;br /&gt;केवल मैं ही नहीं, सभी शिक्षित वर्ग पक्षपात रहित होकर सम्पूर्ण राष्ट्रों की एकता के उद्देश्य से इस शोध पुस्तक को अवश्य स्वीकार करके राष्ट्र के भावी जीवन को शान्तिप्रिय बनायें। भारतीय जिन कल्कि को भगवान मानते हैं, मुसलमान उन्हीं कल्कि के चेले हैं। कल्कि के विषय में कहा गया है, कि यह भारतीयों का बहुत ही बड़ा कल्याण करेंगे, इस भावना को लेकर प्रत्येक भारतीय स्वयं को हिन्दू कहे या इण्डियन, कल्कि पर विश्वास करे, क्योंकि वही अन्तिम अवतार हैं। जो घोड़े पर चढ़ना तथा तलवार धारण करना स्वीकार करेंगे, अब जो भावी युग आ रहा है। वह घोड़ों और तलवारों के युग से काफी दूर होता जा रहा है। भारतीय मुसलमानों को दूसरा नहीं समझें, क्योंकि वे भारतीयों के सबसे बड़े हितैषी सिद्ध होंगे। इस्लाम, मुसलमान अरबी भाषा के शब्द हैं, जिनका अर्थ ईश्वराज्ञा पालन धर्म या सनातन धर्म तथा आस्तिक होता है।&lt;br /&gt;जो धर्म के अन्धे अनुयायी होकर अपने सनातन धर्म को सीमित बना देते हैं, और दूसरे धर्मों को न समझते हुए परस्पर विद्रोह करते हैं, वे ईश्वर के राज्य में अग्नि द्वारा तपाये जाते हैं। मैंने अपने इस शोधपत्रा को किसी पक्षपात की भावना से नहीं लिखा है। अन्तर्यामी का मुझे आदेश मिलता है, कि हिन्दू मुस्लिम एकता का बाधक जो विद्रोह कभी-कभी खड़ा हो जाता है, और ईश्वर की दुहाई देकर दोनों पक्ष एक दूसरे का संहार करते हैं, यह ईश्वर को बुरा लगता है। शिक्षा देना उपदेश का काम है पालन करना उपदेशक के ज़िम्मे नहीं है वह तो ईश्वर के ज़िम्मे है। एक मनुष्य क्या किसी से कुछ करायेगा? ईसा ने जिन अहमद (ईश्वर के प्रशंसक) के विषय में भविष्यवाणी की, वेदव्यास जी ने भावी वृत्तान्त के रूप में जिन कल्कि का व्याख्यान किया, उन्हीं की गवाही देना मेरा कर्म है। ईसाई कल्कि को माने या न माने, परन्तु भारतीय तो अवश्य उसे मानेंगे।&lt;br /&gt;कल्कि और मोहम्मद साहब के विषय में जो अभूतपूर्व साम्य मुझे मिला, उसे देखकर यह आश्चर्य होता है कि जिन कल्कि की प्रतीक्षा में भारतीय बैठे हैं, वे हो गये और वही मोहम्मद साहब हैं। दोनों के साम्य में यदि कहीं कोई बाधक प्रमाण मिले, तो या तो उन्हें क्षेपक समझ लेना चाहिये या ‘हरि अनन्ता हरि कथा अनन्ता’ से युगानुसार चरित वैभिन्य। मौलिक धर्म-सिद्धान्त प्रायः एक ही हैं, परन्तु अल्पबुद्धि के लोगों को वह बोध-गम्य नहीं।&lt;br /&gt;कुछ समय पहले वैदिक धर्म में मिश्रित बुराइयों का निराकरण करने वाले बुद्ध जी द्वारा उपदिष्ट धर्म एवं तद्धर्मानुयायियों को घृणा की दृष्टि से देखा जाता था और लोग यह समझते थे कि वैदिक धर्म से अतिरिक्त यह नया धर्म है, परन्तु पुराणों के चैबीस अवतारों के प्रकरण में जब यह पढ़ा गया कि बुद्ध जी तेईसवां अवतार हैं, तब लोगों की समझ में आया, कि यह धर्म अपना धर्म ही है और बुद्ध जी तो अवतार ही हैं, तब वैदिक एंव बौद्धों का भेद दूर हो गया और आज बौद्ध भी वैदिक धर्मानुगत ही आते हैं। उसी प्रकार मोहम्मद साहब द्वारा प्रदर्शित सनातन धर्म तथा उनके अनुयायियों को देखकर यह लगता है यह तो वैदिक धर्म का उल्टा ही धर्म है, परन्तु चैबीस अवतारों के प्रकरण में भागवत पुराण में जब मैंने कल्कि को देखा तथा द्वादश स्कन्ध में उनके होने वाले वृत्तान्त को पढ़ा, तब मोहम्मद साहब से पूर्ण समानता मिली और मुझे विश्वास हो गया कि यही हैं कल्कि और उनके धर्म की बाढ़ तथा अनुयायियों की वृद्धि से तो अपना वैदिक धर्म की पुष्ट होता है। अभी न सही, जब इस बात का सबको ज्ञान हो जायेगा, तब मुसलमानों का इस्लाम धर्म या आस्तिकों का ईश्वराज्ञा पालन धर्म, भारत में प्रचलित वैष्णन, शैव, शाक्त, जैन तथा बौद्ध धर्म की भांति सभी लोगों द्वारा स्वीकृत होगा, तथा भारतीयों का और मुसलमानों वर्ग मिलकर एक बहुत बड़ा समाज बनेगा। लाठी डंडों की चोट से धर्म नहीं फैलता, अपितु लोगों को जब ईश्वर की कृपा से धर्म के सत्य स्वरूप का ज्ञान हो जाता है, तो वे स्वयं श्रेष्ठ धर्म का आचरण करने लगते हैं। धर्म के जानकार का कत्र्तव्य है कि वह धर्म के सिद्धान्तों से लोगों को अवगत कराये, वे श्रद्धा उत्पन्न होने पर उसे स्वयं मानेंगे, दंगा करने पर थोड़े कोई मानता है। ईश्वरीय धर्म के प्रचारकों को तो शान्ति पूर्वक धर्म का प्रचार करना है। धर्म का सम्बंध वेषभूषा से नहीं है, धर्म को सम्बंध हृदय में सन्निहित उन विचारों से है, जिनसे जीवन की यात्रा सुचारू रूप से सम्पन्न हो।&lt;br /&gt;प्रत्येक हिन्दू, भारतीय या इण्डियन को यह ज्ञात होना चाहिये कि केवल वे ही हिन्दू नहीं है, बल्कि यहां रहने वाले मुसलमान तथा ईसाई भी हिन्दू हैं, क्योंकि हिन्दू शब्द का अर्थ होता है कि जो हिन्दुस्तान में रहे।&lt;br /&gt;मेरा मुसलमानों से भी अनुरोध है कि हिन्दू तथा हिन्दुस्तान शब्द उन्हीं की देन है, जिनका (हिन्दी) अर्थ ऊपर स्पष्ट किया जा चुका है, अतः वे भी अपने को हिन्दू कहने में संकोच न करें। भारत में जो वर्ण व्यवस्था थी, वह कर्म से थी न कि जाति से, क्योंकि ‘वरणात् वर्णः जात्या जातिः’। वर्ण शब्द किसी भी पेशा को अपनाने से है। ईश्वराधन करने वाले तथा नित्य संयम से रहने वाले मुसलमान भी ब्राह्मण हैं, तथा ईश्वर पर विश्वास करने वाले भी मुसलमान अर्थात् आस्तिक हैं। मुसलमान का यह अर्थ नहीं कि खतना कराया सो मुसलमान और आस्तिक का यह अर्थ नहीं कि चोटी रखाई तो ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र। दाढ़ी आदि तो प्राचीनकाल में मुनि लोग भी रखते थे। भारत में ऊंच-नीच का भेद भाव जब तक दूर न होगा, समानता का व्यवहार जब तक न होगा, तब तक सुख एवं शान्ति सम्भव नहीं। इस विषय पर बाद में कोई दूसरी पुस्तक लिखूंगा क्योंकि इस शोधपात्र में इतना स्थान नहीं, कि हर एक बात आ सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारस्वत-वेदान्त-प्रकाश-संध&lt;br /&gt;एक ही धर्म के अनेकों टुकड़े हो गये हैं, जिससे धर्म का स्वरूप बिगड़ गया है। आवश्यकता है उन टुकड़ों के फिर जुड़ने की, और सतयुग के सम्पादन की।&lt;br /&gt;ईश्वरीय वाणी वेदों और वेदान्त पर श्रद्धा उत्पन्न करना, इस्लाम धर्म एंव ईसाई धर्म का वैदिक धर्म से समन्वय व्यक्त करके समाज में एकता एवं एकेश्वरवाद का सन्देश देना, समाज के अन्तर्गत एवं धर्म रूपी दूध में पड़ी हुई अन्धविश्वास रूपी मक्खी को निकाल फेंकना, लकीर के फ़क़ीर एवं कूपमण्डूक लोगों को धर्म जीवन के सीमित दायरे से निकाल कर व्यापक धर्म का संसार दिखाना, धार्मिक कलहों को शान्त कराने के लिये लोगों में सद्भावना का प्रचार करना इस संघ का मूल उद्देश्य है।&lt;br /&gt;इस संघ का राजनीति से कोई सम्बंध नहीं।&lt;br /&gt;(वैदिकधर्म ईशाज्ञाधर्म और इस्लाम धर्म ईशाज्ञा-पालन धर्म में चीनी और उनकी मिठास का सम्बंध है। यदि वैदिक धर्म के एकेश्वरवाद का सन्देश है, तो इस्लाम धर्म में एकेश्वरवाद का पालन। प्रतीक्षा करें वैदिक धर्म एवं इस्लाम धर्म पुस्तक की)&lt;br /&gt;.....&lt;br /&gt;......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस्लामिक पुस्तकें   ुनिकोड ओर ईबुक में&lt;br /&gt;islaminhindi.blogspot.com&lt;br /&gt;1. मधुर संदेश संगम की वेबसाइट www.quranhindi.com पर उपलब्ध कुरआन ईबुक के रूप में उपलब्ध&lt;br /&gt;2. मौलाना कलीम सिद्दीकी की non-muslims के लिये‘‘आपकी अमानत आपकी सेवा में&lt;br /&gt;3. डा. ज़ाकिर नायक की ‘ गल्तफहमियों का निवारण‘‘ जिसमें हैं non-muslims के प्रशनों के उत्तर&lt;br /&gt;4. कादयानियों की असलियत उन्हीं की तहरीरों से पेश करने वाली पुस्तक ‘‘कादयानियत की हकीकत‘‘&lt;br /&gt;5. अल्लाह के सैंकडों चैलेंजों में से छ इस ब्लाग पर भी विस्तार से हिन्दी में उपलब्ध&lt;br /&gt;6. नव-मुस्लिम 80 महिलाओं की दास्तान मधुर संदेश संगम की प्रस्तुति ‘‘हमें खुदा कैसे मिला&lt;br /&gt;7. कुरआन और आधुनिक विज्ञान&lt;br /&gt;.................&lt;br /&gt;मुहम्मद सल्ल. को दूसरे धर्मों से भी अंतिम-अवतार अर्थात आखरी नबी साबित करने वाली पुस्तकें पढने के लिये देखें&lt;br /&gt;antimawtar.blogspot.com&lt;br /&gt;1. ‘&lt;a href="http://antimawtar.blogspot.com/2009/06/blog-post.html"&gt;‘नराशंस और अंतिम ऋषि‘&lt;/a&gt;‘- ऐतिहासिक शोध - लेखक डा. वेद प्रकाश उपाघ्याय&lt;br /&gt;2. ‘‘कल्कि अवतार और मुहम्मद सल्ल.‘‘--लेखक डा. वेद प्रकाश उपाघ्याय&lt;br /&gt;3. &lt;a href="http://antimawtar.blogspot.com/2009/06/blog-post_22.html"&gt;‘‘हज़रत मुहम्मद सल्ल. और भारतीय धर्मग्रन्थ‘‘&lt;/a&gt; --लेखक डा. एम. ए. श्रीवास्तव&lt;br /&gt;इस विषय से संबन्धित 5 पुस्तकों की एक अंग्रेजी ईबुक भी उपलब्ध&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4148684920008435142-7226410943407356967?l=antimawtar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://antimawtar.blogspot.com/feeds/7226410943407356967/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4148684920008435142&amp;postID=7226410943407356967' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4148684920008435142/posts/default/7226410943407356967'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4148684920008435142/posts/default/7226410943407356967'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://antimawtar.blogspot.com/2009/07/kalki-avtar-book.html' title='कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब-kalki-avtar-book'/><author><name>Mohammed Umar Kairanvi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06899446414856525462</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_6kacm3QiWSA/Sxd7Q7WZMqI/AAAAAAAAAVY/iETHamqjm0M/S220/cyber-maulan-umar-kairanvi-new-dec09-c.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_6kacm3QiWSA/SlQ2cRwJnJI/AAAAAAAAAHc/b6MPVYzZ9Tw/s72-c/kalki-avtar-aur-mohamad.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4148684920008435142.post-5267565958196517171</id><published>2009-06-22T17:01:00.005+05:30</published><updated>2011-04-28T14:26:05.871+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इस्लामीकरण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindu'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='antim rishi'/><category 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वाला  (3‍) सुन्‍दर कान्ति के धनी  (4‍) पापों का निवारक   (5‍) पत्नियों की साम्‍यता  (6‍) स्‍थानगत साम्‍यता  (7‍) अन्‍य साम्‍यताएँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3. पुरणणों के प्रमाण&lt;br /&gt;भविष्‍य पुराण और हज़रत मुहम्‍मद (सल्ल.)  * संग्राम पुराण की पूर्वृ-सूचना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4. कल्कि अवतार और हज़रत मुहम्‍मद (सल्ल.)&lt;br /&gt;* अवतार का तात्‍पर्य * अ‍ंतिम अवतार के आने का लक्षण, * कल्कि का अवतार-स्‍थान *जन्‍मतिथि * अंतिम अवतार की विशेषताएँ--&lt;br /&gt;(1‍) अश्‍वारोही और खड्गधारी (2). दुष्‍टों का दमन‍ (3‍) जगत्‍पति (4‍) चार भाइयों के सहयोग से युक्‍त (5) अंतिम अवतार (6‍) उपदेश और उत्‍त्‍र दिशा की ओर जाना (7) आठ सिद्धियों और गुणों से युक्‍त (8) शरीर से सुगन्‍ध का निकलना (9‍) अनुपम कान्ति से युक्‍त (1‍0) ईश्‍वरीय वाणी का उपदेष्‍टा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5. उपनिषद् में भी मुहम्‍मद (सल्ल.) की चर्चा&lt;br /&gt;6. प्राणना‍थी (प्रणामी) सम्‍प्रदाय की शिक्षा&lt;br /&gt;7. हज़रत मुहम्‍मद (सल्ल.) और बोद्ध धर्म ग्रन्‍थ&lt;br /&gt;अंतिम बुद्ध-मैत्रेय मुहम्‍मद (सल्ल.) *मैत्रेय की मुहम्‍मद (सल्ल.)  से समानता&lt;br /&gt;8. जैन धर्म और हज़रत मुहम्‍मद (सल्ल.)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमुख&lt;br /&gt;अल्लाह अत्यंत कृपाशील और दयावान है। वही दृष्टि का निर्माता है। उसने अपने सर्जित जीवों में इनसान को श्रेष्ठ और महिष्ठ बनाया है। अल्लाह के सभी उदार अनुग्रहों और उसकी अनुकंपाओं की गणना करनी कठिन है, जो उसने इनसानों पर की है। उसकी इनसानों पर विशेष कृपा यह रही कि उनके मार्गदर्शक का प्रबंध किया और उन्हें सही रास्ता दिखाने के लिए अपने पैग़म्बरों, रसूलों और अवतारों को प्रत्येक क़ौम और समुदाय में भेजा। क़ुरआन में हैः ‘‘कोई क़ौम ऐसी नहीं गुजरी, जिसमें कोई सचेत करने वाला न आया हो।’’ (35: 24)&lt;br /&gt;‘‘अवतार’’ का अर्थ यह कदापि सही नहीं है कि ईश्वर स्वयं धरती पर सशरीर आता है, बल्कि सच्चाई यह है कि वह अपने पैग़म्बर और अवतार भेजता है। उसने इनसानों के उद्धार, कल्याण और मार्गदर्शन के लिए अपने  अवतार पैग़म्बर और रसूल भेजे। यह सिलसिला हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर समाप्त कर दिया गया। स्वामी विवेकानन्द और गुरुनानक सरीखे महानुभावों ने भी पैग़म्बरी और ईशदूतत्व की धारणा का समर्थन किया है। वरिष्ठ विद्वानों में पं. सुन्दर लाल, श्री बलराम सिंह परिहार, डा. वेद प्रकाश उपाध्याय, डा. पी.एच. चैबे, डा. रमेश प्रसाद गर्ग, पं. दुर्गा शंकर सत्यार्थी आदि ने ‘‘अवतार’’ का अर्थ ईश्वर द्वारा मानव-कल्याण के लिए अपने पैग़म्बर और दूत भेजा जाना बताया है। प्राणनाथी सम्प्रदाय के प्रसिद्ध चिंतक श्री कश्मीरी लाल भगत ने भी इस तथ्य का स्पष्ट समर्थन किया है।&lt;br /&gt;हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के आगमन की पूर्व सूचना हमें बाइबिल, तौरेत और अन्य धर्मग्रन्थों में मिलती है, यहाँ तक कि भारतीय धर्मग्रन्थों में भी आप (सल्ल.) के आने की भविष्यवाणियाँ मिलती हैं। हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्म की पुस्तकों में इस प्रकार की पूर्व-सूचनाएं मिलती हैं। इस पुस्तिका में सबको एकत्र करके पेश करने का प्रयास किया गया है।&lt;br /&gt;पैग़म्बरों और अवतारों के भेजे जाने का विशिष्ट औचित्य होता है। लोगों में अधर्म की प्रवृत्ति पैदा हो जाने, धर्म के वास्तविक स्वरूप से हट जाने और मूल धर्म में मिलावट हो जाने के कारण पैग़म्बर एवं अवतार भेजे गए, जिन्होंने धर्म को फिर से मौलिक रूप में पेश किया और एक ईश्वर की ओर लोगों को बुलाया। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) उस समय भेजे गए, जब हज़रत ईसा मसीह (अलैहि.) को आए हुए पाँच सौ से अधिक वर्ष बीत चुके थे। नबियों (अलैहि.) की शिक्षाएँ नष्ट अथवा विकृत हो चुकी थीं, सनातन धर्म पर अधार्मिकता छा गई थी, ईशभय और ईशपरायणता समाप्त हो चुकी थी। इनसान अपने पैदा करनेवाले को भूला हुआ था। उसने अनेक ईश्वर बना डाले और अपनी दशा इतनी पतित कर डाली कि पेड़, पहाड़, आग, पानी, हवा, धरती, चांद, सूरज आदि चीज़ों को पूजने में लिप्त हो गया।&lt;br /&gt;इन विकट और विषम परिस्थितियों में हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) का आगमन हुआ। आप (सल्ल.) ने अल्लाह के पैग़म्बर के रूप में महान और अनुपम सद्क्रान्ति कर दिखाई। आप (सल्ल.) कोई नया धर्म लेकर नहीं आए थे, बल्कि मानव जाति के आरंभ से चले आ रहे सनातन धर्म (इस्लाम) में आई ख़राबियों और विकृतियों को दूर कर उसे मौलिक रूप में पेश किया। आप (सल्ल.) ने इनसानों को उनकी अस्ल हैसियत बताई और उनकी मिथ्या धारणाओं का उन्मूलन किया। आप (सल्ल.) ने बताया कि इनसान का ईश्वर केवल एक है, वह निराकार है। इनसान को उसी की ही दासता अपनानी चाहिए, उसी की ही इबादत करनी चाहिए। यदि वह इस धारणा और भक्ति-कर्म का इनकार करता है, तो अपने को ग़लत जगह खड़ा कर लेता है, जिसके कारण उसके क़दम ग़लत दिशा में उठने लगते हैं। ऐसे में भला उसकी जीवन-यात्रा कैसे सफल हो सकती है?&lt;br /&gt;जीवन की सुगम, सार्थक, सफल और फलदाई यात्रा के लिए अल्लाह के अंतिम पैग़म्बर और दूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) द्वारा पेश की गई शिक्षाओं को अपनाया जाए एवं आप (सल्ल.) के बताए मार्ग पर चला जाए, तभी पारलौकिक जीवन को भी सफल बनाया जा सकता है। अब यह सच्चाई छिपी नहीं रही कि भारतीय धर्मग्रन्थों में जिस अवतार (पैग़म्बर) के आने की पूर्व-सूचना दी गई थी, वे हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ही हैं। यह पुस्तिका सच्चाई उजागर करने की दिशा में एक प्रयास है। इसका उद्देश्य सत्य को समझाना है। अतः इसमें वर्णित तथ्यों के सिलसिले में कोई न्यूनता और त्रुटि रह गई हो, तो हमें अवगत कराने का कष्ट करें। अल्लाह हमारी कोशिशों को क़बूल फ़रमाए, आमीन।&lt;br /&gt;डा. एम. ए. श्रीवास्तव&lt;br /&gt;स्थान - नई दिल्ली&lt;br /&gt;दिनांक-12 सितंबर 1997&lt;br /&gt;---------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) और भारतीय धर्मग्रन्थ&lt;br /&gt;सत्य हमेशा स्पष्ट होता है। उसके लिए किसी तरह की दलील की ज़रूरत नहीं होती। यह बात और है कि हम उसे न समझ पाएँ या कुछ लोग हमें इससे दूर रखने का कुप्रयास करें। अब यह बात छिपी नहीं रही कि वेदों, उपनिषदों और पुराणों में इस दृष्टि के अन्तिम पैग़म्बर (संदेष्टा) हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के आगमन की भविष्यवाणियां की गई हैं। मानवतावादी सत्य गवेषी विद्वानों ने ऐसे अकाट्स प्रमाण पेश कर दिए, जिससे सत्य खुलकर सामने आ गया है।&lt;br /&gt;वेदों में जिस उष्ट्रारोही (ऊँट की सवारी करनेवाले) महापुरुष के आने की भविष्यवाणी की गई है, वे मुहम्मद (सल्ल.) ही है। वेदों के अनुसार उष्ट्रारोही का नाम ‘नराशंस’ होगा। ‘नराशंस’ का अरबी अनुवाद ‘मुहम्मद’ होता है। ‘नराशंस’ के बारे में वर्णित समस्त क्रियाकलाप हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के आचरणों और व्यवहारों से आश्चर्यजनक साम्यता रखते हैं। पुराणों और उपनिषदों में कल्कि अवतार की चर्चा है, जो हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ही सिद्ध होते हैं। कल्कि का व्यक्तित्व और चारित्रिक विशेषताएं अंतिम पैग़म्बर (सल्ल.) के जीवन-चरित्र को पूरी तरह निरूपित करती हैं। यही नहीं उपनिषदों में साफ़ तौर से हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) का नाम आया है और उन्हें अल्लाह का रसूल (संदेशवाहक) बताया गया है। पुराण और उपनिषदों में यह भी वर्णित है कि ईश्वर एक है। उसका कोई भागीदार नहीं है। इनमें ‘अल्लाह’ शब्द का उल्लेख कई बार किया गया है। बौद्धों और जैनियों के धर्मग्रन्थों में भी हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के बारे में भविष्यवाणियां की गई हैं।&lt;br /&gt;इन सच्चाइयों के आलोक में मानवमात्र को एक सूत्र में बांधने और मानव एकता एवं अखण्डता को मज़बूत करने के लिए सार्थक प्रयास हो सकते हैं। यह समय की मांग भी है। वैमनस्यता और साम्प्रदायिकता के इस आत्मघाती दौर में ये सच्चाइयां मील का पत्थर साबित हो सकती हैं। भाई-भाई को गले मिलवा सकती हैं और एक ऐसे नैतिक और सद् समाज का निर्माण कर सकती है, जहां हिंसा, शोषण, दमन और नफ़रत लेशमात्र भी न हो। इन्हीं उद्देश्यों को लेकर सभी सच्चाईयों को एक साथ आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है। इस कोशिश में हमें कितनी सफलता मिली यह आप ही बताएंगे। उम्मीद है कि ये सच्चाइयाँ दिल की गहराइयों में उतरकर हम सभी को मानव कलयाण के लिए प्रेरित करेंगी। प्रस्तुत पुस्तिका में डा. वेद प्रकाश उपाध्याय के शोध ग्रन्थों ‘नराशंस और अंतिम ऋषि’ और ‘कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब’ के अलावा अन्य स्रोतों से प्राप्त तथ्यों एवं सामग्रियों का समावेश किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुहम्मद (सल्ल.) और वेद&lt;br /&gt;वेदों में नराशंस या मुहम्मद के आने की भविष्यवाणी कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है, बल्कि धार्मिक ग्रन्थों में ईशदूतों (पैग़म्बरों) के आगमन की पूर्व सूचना मिलती रही है। यह ज़रूर चमत्कारिक बात है कि हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के आने की भविष्यवाणी जितनी अधिक धार्मिक ग्रन्थों में की गई है उतनी किसी अन्य पैग़म्बर के बारे में नहीं की गई। ईसाइयों, यहूदियों और बौद्धों के धार्मिक ग्रन्थों में हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के अंतिम ईशदूत के रूप में आगमन की भविष्यवाणियाँ की गई हैं।&lt;br /&gt;वेदों का ‘नराशंस’ शब्द ‘नर’ और ‘आशंस’ दो शब्दों से मिलकर बना है। ‘नर’ का अर्थ मनुष्य होता है और ‘आशंस’ का अर्थ ‘प्रशंसित’। सायण ने ‘नरशंस’ का अर्थ ‘मनुष्यों द्वारा प्रशंसित’ बताया है(नराशंस: यो नरै: प्रशस्यते। (सायण भाष्य, ऋग्वेद संहिता, 5/5/2)। मूल मंत्र इस प्रकार है - ‘‘नराशंस: सुषूदतीमं यज्ञामदाभ्यः । कविर्हि मधुहस्त्य।’’ ‘‘नराशंस’’ शब्द का अर्थ स्वामी दयानन्द सरस्वती ने भी मनुष्यों द्वारा प्रशंसित बताया है) (ऋग्वेद हिन्दी भाष्य, पृ. 25, प्रकाशक: सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा)। यह शब्द कर्मधारय समास है, जिसका विच्छेद ‘नरश्चासौ आशंसः’ अर्थात प्रशंसित मनुष्य होगा। डा. वेद प्रकाश उपाध्याय कहते हैं कि ‘‘इसी लिए इस शब्द से किसी देवता को भी न समझना चाहिए। ‘नराशंस’ शब्द स्वतः ही इस बात को स्पष्ट है। यदि कोई ‘नर’ शब्द को देववाचक मानें तो उसके समाधान में इतना स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि ‘नर’ शब्द न तो देवता का पर्यायवाची शब्द ही है और न तो देवयोनियों के अंतर्गत कोई विशेष जाति।’’ (‘नराशंस और अंतिम ऋषि’, पृ. 5।)।&lt;br /&gt;‘नर’ शब्द का अर्थ मनुष्य होता है, क्योंकि ‘नर’ शब्द मनुष्य के पर्यायवाची शब्दों में से एक है। ‘नराशंस’ की तरह ‘मुहम्मद’ शब्द का अर्थ ‘प्रशंसित’ होता है। ‘मुहम्मद’ शब्द ‘हम्द’ धातु से बना है, जिसका अर्थ प्रशंसा करना होता है। ऋग्वेद में ‘कीरि’ नाम आया है, जिसका अर्थ है ईश्वर प्रशंसक। अहमद शब्द का भी यही अर्थ है। अहमद, मुहम्मद साहब का एक नाम है। (पं. रवीन्द्रनाथ त्रिपाठी ‘कान्ति’ के 28 अक्तूबर-4 नवम्बर 1990 के अंक में। ऋग्वेद का मूल श्लोक यह है-यो रघ्रस्योचोदिताय: कृशस्य यो ब्रह्मणो नाधमानस्य कीरेः।।) (ऋग्वेद, 2/12/6)&lt;br /&gt;वेदों में ऋग्वेद सबसे पुराना है। उसमें ‘नराशंस’ शब्द से शुरू होनेवाले आठ मंत्र हैं। ऋग्वेद के प्रथम मंडल, 13वें सूक्त, तीसरे मंत्र और 18वें सूक्त, नवें मंत्रा तथा 106वें सूक्त, चैथे मंत्रा में ‘नरांशस’ का वर्णन आया है। ऋग्वेद के द्वितीय मंडल के तीसरे सूक्त, दूसरे मंत्र, 5वें मंडल के पांचवें सूक्त, दूसरे मंत्र, सातवें मंडल के दूसरे सूक्त, दूसरे मेंत्रा, 10वें, मंडल के 64वें सूक्त, तीसरे मंत्र और 142वें सूक्त, दूसरे मंत्र में भी ‘नराशंस’ विषयक वर्णन आए हैं। सामवेद संहिता के 1319वें मंत्र में और वाजसनेयी संहिता के 28वें अध्याय के 27वें मंत्र में भी ‘नराशंस’ के बारे में ज़िक्र आया है। तैत्तिरीय आरण्यक और शतपथ ब्राह्मण ग्रन्थों के अलावा यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी ‘नराशंस’ का उल्लेख किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘नराशंस’ की चारित्रिक विशेषताओं की हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) से साम्यता&lt;br /&gt;वेदों में ‘नराशंस’ की स्तुति किए जाने का उल्लेख है। वैसे ऋग्वेद काल या कृतयुग में यज्ञों के दौरान ‘नराशंस’ का आह्नान किया जाता था। इसके लिए ‘प्रिय’ शब्द का इस्तेमाल होता था। ‘नराशंस’ की चारित्रिक विशेषताओं की हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) से तुलना इस प्रकार है-&lt;br /&gt;1. वाणी की मधुरता&lt;br /&gt;ऋग्वेद में ‘नराशंस’ को ‘मधुजिह्न’ कहा गया है, (नराशंस मिहप्रियम स्मिन्यज्ञ उप ह्नये। मधुजिह्नं हविष्कृतम्।) (ऋग्वेद संहिता 1/13/3) यानी उसमें वाणी की मधुरता होगी। मधुर-भाषिता उसके व्यक्तित्व की ख़ास पहचान होगी। सभी जानते हैं कि मुहम्मद (सल्ल.) की वाणी में काफ़ी मिठास थी।&lt;br /&gt;2. अप्रत्यक्ष ज्ञान रखनेवाला&lt;br /&gt;‘नराशंस’ को अप्रत्यक्ष ज्ञान रखनेवाला बताया गया है। इस ज्ञान को रखनेवाला कवि भी कहलाता  है। ऋग्वेद संहिता में ‘नराशंस’ को कवि बताया गया है (नराशंस: सुदूषूदतीमं यज्ञमदाम्य:। कविर्हि मधुहास्त्यः।) (ऋग्वेद संहिता 5/5/2)। मुहम्मद (सल्ल.) को अल्लाह ने कुछ अवसरों पर परोक्ष बातों की जानकारी प्रदान की थी अतः पैग़म्बरे इस्लाम (सल्ल.) ने रोमियों और ईरानियों के युद्ध में रूमियों की हार और नव वर्ष के अंदर ही रूमियों की होनेवाली विजय की पूर्व जानकारी दी थी। नैनवा की लड़ाई में रूमियों की जीत 657 ई. में हुई थी। पवित्र कुरआन की सूरा रूम इसी से सम्बंधित है। रूमियों की पराजय के पश्चात पुनः विजय प्राप्त कर लेने का उल्लेख आया है। इनके साथ ही निकट भविष्य में इनकार करनेवालों पर मुसलमानों के विजयी होने की भविष्यवाणी की गई है।&lt;br /&gt;वे ईश्वर को सबसे अधिक प्यारे और उसे जाननेवाले थे। वे नबी थे। ‘नबी’ शब्द ‘नबा’ धातु से बना हुआ शब्द है, जिसका अर्थ संदेश देनेवाला होता है। आप (सल्ल.) ईश्वर के सन्देशवाहक थे। आचार्य रजनीश के शब्दों में ‘‘आप ईश्वर तक पहुंचने की ‘बांसुरी’ हैं जिसमें फूंक किसी और की है।’’&lt;br /&gt;3. सुन्दर कान्ति के धनी&lt;br /&gt;‘नराशंस’ को सुन्दर कान्तिवाला बताया गया है। इस विशेषता का उल्लेख करते हुए ऋग्वेद में ‘स्वर्चि’ शब्द आया है (नराशंस: प्रति धामान्य××ान तिस्रो दिव: प्रति महा स्वर्चिः।।) (ऋग्वेद संहिता 2/3/2)।&lt;br /&gt;‘स्वर्चि’ शब्द का विच्छेद है ‘शोभना अर्यिर्यस्य सः’ यानी सुन्दर दीप्ति या कान्ति से युक्त। इस शब्द का तात्पर्य यह है कि इतने सुन्दर स्वरूप का व्यक्ति जिसके चेहरे से रौशनी-सी निकलती हो। ऋग्वेद में ही बता दिया गया है कि वह अपने महत्व से घर-घर को प्रकाशित करेगा। (नराशंसःप्रतिधामान्यज्‍जन तिस्रो दिव: प्रति मह्ना स्वर्चिः।।) (ऋग्वेद संहिता 2/3/2) स्पष्ट है कि हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने घर-घर में ज्ञान की ज्योति जलाई, अज्ञान को खत्म कर दिया और अंधकार में भटक रहे लोगों को नई रौशनी दी।&lt;br /&gt;ऋग्वेद में ही कहा गया है कि ‘अहमिद्धि पितुष्परि मेधामृतस्य जग्रभ। अहं सूर्य इवाजनि।।’&lt;br /&gt;सामवेद में भी है: ‘आहमिधि पितुः परिमेधामृतस्य जग्रभ। अहं सूर्य इवाजनि।। (सामवेद प्र. 2 द. 6 मं. 8) अर्थात, अहमद (मुहम्मद) ने अपने रब से हिकमत से भरी जीवन व्यवस्था को हासिल किया। मैं सूरज की तरह रौशन हो रहा हूं।’&lt;br /&gt;मुहम्मद साहब इतने सुन्दर थे कि लोग स्वतः आपकी तरफ खिंच आते थे। इस संदर्भ में रेवरेंड बासवर्थ स्मिथ ‘मुहम्मद एण्ड मुहम्मेदनिज़्म’ में लिखा है कि मुहम्मद साहब साहब के विरोधी भी उनकी आकर्षण शक्ति तथा उनकी गरिमा से प्रभावित होकर उनका सम्मान करने को बाध्य हो जाते थे। तमाम बाधाओं और विरोध के बावजूद मुहम्मद साहब घर-घर में ज्ञान की ज्योति प्रकाशित करते रहे।’’&lt;br /&gt;4. पापों का निवारक&lt;br /&gt;ऋग्वेद में नराशंस को ‘पापों से लोगों को हटानेवाला’ बताया गया है। (नराशंस वाजिनं वाजयन्निह क्षयद्वीरं पूषणं सुम्नैरीमहे - ऋग्वेद, 1/106/4) यह कहने की ज़रूरत ही नहीं है कि हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) की समस्त शिक्षाएं और आप पर अवतरित क़ुरआन समग्र जीवन को पापों से उबार देता है। यह सन्मार्ग का आईना (दर्पण) है जिसे ‘देखकर’ और उसपर अमल करके व्यक्ति को तमाम पापों से छूटकारा मिल जाता है। उसकी दुनियावी और मरने के बाद की ज़िन्दगी खुशहाल हो जाती है। इस्लाम जुआ, शराब और अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से लोगों को रोकता है तथा अवैध कमाई से प्राप्त धन को खाने, ब्याज लेने और किसी का हक़ मारने को निषिद्ध ठहराता है। वह अत्याचार, दमन और शोषण से मुक्त समाज की स्थापना करता है।&lt;br /&gt;5. पत्नियों की साम्यता&lt;br /&gt;‘नराशंस’ के पास 12 पत्नियां होंगी, इस बात की पुष्टि भी अथर्ववेद के उसी मंत्र से होती है जिस मंत्र से होती है जिस मंत्र में उसके द्वारा सवारी के रूप में ऊँट के प्रयोग करने की बात का उल्लेख है। यह मंत्र इस प्रकार है-&lt;br /&gt;उष्ट्रा यस्य प्रवाहिणो वधूमन्तों द्विर्दश।&lt;br /&gt;वर्ष्‍मा रथस्य नि जिहीडते दिव ईषमाण उपस्पृशः।&lt;br /&gt;-अथर्ववेद कुन्ताप सूक्त 20/127/2&lt;br /&gt;अर्थात, जिसकी सवारी में दो खूबसूरत ऊंटनियां हैं। या तो अपनी बारह पत्नियों समेत ऊंटों पर सवारी करता है उकसी मान-प्रतिष्ठा की ऊंचाई अपनी तेज़ रफ्तार से आसमान को छूकर नीचे उतरती है।&lt;br /&gt;इस मंत्र के अनुरूप हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) की बारह पत्नियां थीं।&lt;br /&gt;आप (सल्ल.) की पत्नियों के नाम क्रम से इस प्रकार हैं - 1. हज़रत ख़दीजा (रज़ि), 2. हज़रत सौदा (रजि.), 3. हज़रत आइशा (रजि.), 4. हज़रत हफ़्सा (रजि.), 5. हज़रत उम्मे सलमा (सल्ल.), 6. हज़रत उम्मे हबीब (रजि.), 7. हज़रत ज़ैनब बिन्त जहश (रजि.), 8. हज़रत ज़ैनब बिन्त खुज़ैमा (रजि.), 9. हज़रत जुवैरिया (रजि.), 10. सफ़ीया (रजि.), 11. हज़रत रैहाना (रजि.), और 12. हज़रत मैमूना (रजि.) (अल्लामा इब्ने ज़री की किताब में यही क्रम है।)&lt;br /&gt;उल्लेखनीय है कि और किसी भी धार्मिक व्यक्ति की बारह पत्नियां नहीं थीं। हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों में कुछ महापुरुषों के पास सैकड़ों पत्नियां होने का विवरण होने के कारण मिलता है।&lt;br /&gt;6. स्थानगत साम्यता&lt;br /&gt;अथर्ववेद के उपर्युक्त मंत्र में नराशंस द्वारा सवारी के रूप में ऊंटों के उपयोग की जो बात कही गई है, उससे नराशंस की पहचान के साथ उसके आगमन के स्थान का भी बोध होता है। ऊंट की सवारी का अर्थ यह हुआ कि नराशंस जिस स्थान में पैदा होगा वहां ऊंटों की प्रचुरता होगी। ऊंट रेगिस्तानी क्षेत्रा में अधिक पाए जाते हैं। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) का जन्म अरब के रेगिस्तान क्षेत्रा में हुआ।&lt;br /&gt;7. अन्य साम्यताएं&lt;br /&gt;अथर्ववेद में अन्योक्ति अलंकार के माध्यम से नराशंस के बारे में पहचान की कतिपय बातें भी बताई गई हैं।&lt;br /&gt;कुन्ताप सूक्त में है-&lt;br /&gt;इदं जना उप श्रुत नराशंस स्तविष्यते।&lt;br /&gt;इसका अर्थ बताते हुए पं. क्षेम करण दास त्रिवेदी लिखते हैं-‘‘हे मनुष्यो! यह आदर से सुनो कि मनुष्यों में प्रशंसावाला पुरुष बड़ाई किया जाएगा।’’ (अथर्ववेद हिन्दी भाष्य, पृ. 1401, सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, नई दिल्ली।)&lt;br /&gt;एक अन्य मंत्र में कहा गया है-&lt;br /&gt;एष इषाय मामहे शतं निष्कान् दश स्रजः।&lt;br /&gt;त्रीणि शतान्यर्वतां सहस्रा दश गोनाम्।। (अथर्ववेद 20, 127, 3)&lt;br /&gt;अर्थात, ईश्वर मामहे ऋषि को सौ सोने के सिक्के देगा, दस हज़ार गायें देगा, तीन सौ अरबी घोड़े देगा और दस हार।&lt;br /&gt;यहां मामहे ऋषि से मतलब मुहम्मद (सल्ल.) से है। आप (सल्ल.) ईश्वर द्वारा सौ स्वर्ण मुद्राएं देने का तात्पर्य ऐसे श्रेष्ठ व्यक्ति से है जो रत्नवत महत्व के हों। मुहम्मद (सल्ल.) जो शिक्षाएं लोगों को देते थे उनकी सुरक्षा का कार्य सौ व्यक्ति करते थे। ये अस्हाबे सुफ़्फ़ः कहलाते थे। ये लोगों को शिक्षाओं की जानकारी भी देते थे और शिक्षाओं की रक्षा भी करते थे।&lt;br /&gt;इसी प्रकार दस हज़ार गो प्रदान किए जाने का अर्थ ‘अच्छे व्यक्ति दिए जाने से है। ‘गो’ अलंकारिक शब्द है, जो साधारणतया अच्छे व्यक्ति के अर्थ में प्रयुक्त होता है। मुहम्मद (सल्ल.) की शिक्षाओं के अनुयायियों की संख्या आपके जीवन काल के अंतिम चरण में दस हज़ार थी। मक्का को जीतने के लिए मदीना से जाते समय आपके सहायकों की संख्या दस हज़ार थी। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के दस हज़ार अनुयायी जब मक्का पहुंचे तो वहां न किसी प्रकार का युद्ध हुआ न ही किसी अनुयायी को नष्ट किया, इसी कारण से उन दस हज़ार लोगों को गो कहा गया।&lt;br /&gt;नराशंस को तीन सौ अर्वन की प्राप्ति का अर्थ ऐसे वीर योद्धाओं की प्राप्ति है जो घोड़े की तरह तेज़ हों। ‘अर्वन’ शब्द का शाब्दिक अर्थ घोड़ा होता है। यह भी गो की भांति अलंकारिक शब्द है। ब्रद की लड़ाई में मुहम्मद (सल्ल.) के साथियों (सहाबा) की संख्या तीन सौ थी।&lt;br /&gt;नराशंस को दस स्रजः या गले का हार दिए जाने से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति हैं जो गले के हार के समान हों और नराशंस का प्रिय हों। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के दस ऐसे व्यक्ति थे, जो उनपर अपने प्राणों को भी समर्पित करने को तैयार रहते थे। वे गले के हार की तरह मुहम्मद (सल्ल.) के चारों तरफ़ हमेशा रहते थे। ये दसों व्यक्ति अशरः मुबश्शरः कहे जाते हैं। ये हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के वे साथी (सहाबी) हैं, जिन्हें जन्नत की खुश्खबरी दी गई।&lt;br /&gt;इनके नाम हैं-अबूबक्र (रजि.), उमर (रजि.), उसमान बिन अफ़फ़ान (रजि.), तल्हा (रजि.), अली (रजि.), सअद बिन अबी वक्‍कास (रजि.), सईद बिन ज़ैद (रजि.), अब्दुर्रहमान बिन औफ़ (रजि.), अबू उबैदा बिन जर्राह (रजि.) और ज़ुबैर (रजि.)।&lt;br /&gt;अथर्ववेद के एक मंत्र में कहा गया है कि ‘ऐ लोगों, यह (खुशख़बरी) ध्यानपूर्वक सुनो, नराशंस की प्रशंसा की जाएगी। साठ हज़ार नब्बे दुश्मनों में इस हिजरत करनेवाले, अमल फैलानेवाले को हम (सुरक्षा) में लेते हैं। ऋग्वेद के एक मंत्र में भी मामहे ऋषि के दस हज़ार साथियों (सहाबा) का ज़िक्र आया है। मंत्र इस प्रकार है-&lt;br /&gt;अनस्वन्ता सतपतिर्मामहे मे गावा चेतिष्ठो असुरो मघोनः।&lt;br /&gt;त्रौवृष्णो अग्ने दशभिः सहस्रैर्वैश्वानरः त्रयरुणाश्चिकेत।।&lt;br /&gt;(ऋग्वेद म. 5, सू. 27, मंत्र 1)&lt;br /&gt;अर्थात, हक़परस्त, अत्यन्त विवेकशील, शक्तिशाली, दानी मामहे ऋषि ने कलाम (वाणी) के साथ मुझे सुशोभित किया। सर्वशक्तिमान, सब खूबियां रखनेवाला, सारे संसार के लिए ‘कृपामय’ दस हज़ार सहयोगियों (सहाबा) के साथ मशहूर हो गया।&lt;br /&gt;मामहे ऋषि हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ही हैं। डा. वेद प्रकाश उपाध्याय ने भी मामहे ऋषि को मुहम्मद (सल्ल.) ही माना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुराणों के प्रमाण&lt;br /&gt;भविष्य पुराण और हज़रत मुहम्मद (सल्ल.)&lt;br /&gt;केवल वेद ही नहीं बल्कि पुराणों में भी मुहम्मद साहब का कार्यस्थल रेगिस्तानी क्षेत्रा में होने का उल्लेख आता है। भविष्य पुराण में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि ‘एक दूसरे देश में एक आचार्य अपने मित्रों के साथ आएंगे। उनका नाम महामद होगा। वे रेगिस्तानी क्षेत्र में आएंगे।(एतस्मिन्नन्तिरे म्लेच्छ आचाय्र्येण समन्वितः।। महामद इति ख्यातः शिष्यशाखा समन्वितः।।)’ इस अध्याय का श्लोक 6,7,8 भी मुहम्मद साहब के विषय में है। पैग़म्बरे इस्लाम (सल्ल.) के जन्म स्थान सहित अन्य साम्यताएं कल्कि अवतार से भी मिलती हैं, जिसका वर्णन कल्कि पुराण में है। इसकी चर्चा बाद में की जाएगी।&lt;br /&gt;यहां यह उल्लेख कर देना उचित होगा कि भविष्य पुराण में कई नबियों (ईशदूतों) की जीवन गाथा है। इस्लाम पर भी विस्तृत अध्याय है। इस पुराण में एकदम सटीक तौर पर हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के विषय की बातें आती हैं। इसमें जहां महामद आचार्य के नाम की मुहम्मद शब्द से निकटता है, वहीं पैग़म्बरे इस्लाम (सल्ल.) की पहचान की अन्य बातें बिल्कुल सत्य उतरती हैं। इनमें ज़रा भी व्याख्या की ज़रूरत नहीं है। भविष्य पुराण के अनुसार, शालिवाहन (सात वाहन) वंशी राजा भोज दिग्विजय करता हुआ समुद्र पार (अरब) पहुंचेगा। इसी दौरान (उच्च कोटि के) आचार्य शिष्यों से घिरे हुए महामद (मुहम्मद सल्ल.) नाम से विख्यात आचार्य को देखेगा। (प्रतिसर्ग पर्व 3, अध्याय 3, खंड 3, कलियुगीतिहास समुच्चय) भविष्य पुराण में कहा गया है-&lt;br /&gt;लिंड्गच्छेदी शिखाहीनः श्मश्रुधारी स दूषकः।&lt;br /&gt;उच्चालापी सर्वभक्षी भविष्यति जनो मम। 25।&lt;br /&gt;विना कौलं च पश्वस्तेषां भक्ष्या मता मम।&lt;br /&gt;मुसलेनैव संस्कारः कुशैरिव भविष्यति। 26।।&lt;br /&gt;तस्मान्मुसलवन्तो हि जातयो धर्मदूषकाः।&lt;br /&gt;इति पैशाचधर्मश्च भविष्यति मया कृतः । 27 ।।&lt;br /&gt;(भ.पु. पर्व 3, खण्ड 3, अध्याय 1, श्लोक 25, 26, 27)&lt;br /&gt;इन श्लोकों का भावार्थ इस प्रकार है-‘हमार लोगों का ख़तना होगा, वे शिखाहीन होंगे, वे दाढ़ी रखेंगे, ऊंचे स्वर में आलाप करेंगे यानी अज़ान देंगे। शाकाहारी मांसाहारी (दोनों) होंगे, किन्तु उनके लिए बिना कौल यान मंत्र से पवित्र किए बिना कोई पशु भक्ष्य (खाने) योग्य नहीं होगा (वे हलाल मांस खाएंगे)। इसक प्रकार हमारे मत के अनुसार हमारे अनुयायियों का मुस्लिम संस्कार होगा। उन्हीं से मुसलवन्त यानी निष्ठावानों का धर्म फैलेगा और ऐसा मेरे कहने से पैशाच धर्म का अंत होगा।’&lt;br /&gt;भविष्य पुराण की इन भविष्यवाणियों की हर चीज़ इतनी स्पष्ट है कि ये स्वतः ही हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) पर खरी उतरती हैं। अतः आप (सल्ल.) की अंतिम ऋषि (पैग़म्बर) के रूप में पहचान भी स्पष्ट हो जाती है। ऐसी भी शंका नहीं है कि इन पुराणों की रचना इस्लाम के आगमन के बाद हुई है। वेद और इस तरह के कुछ पुराण इस्लाम के काफ़ी पहले के हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संग्राम पुराण की पूर्व-सूचना&lt;br /&gt;संग्राम पुराण की गणना पुराणों में की जाती है। इस पुराण में भी ईश्वर के अंतिम ईशदूत और पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के आगमन की पूर्व-सूचना मिलती है। पंडित धर्मवीर उपाध्याय ने अपनी मशहूर किताब ‘‘अंतिम ईशवरदूत’’ (यह किताब 1927 ई. में नेशनल प्रिंटिंग प्रेस, दरियागंज, दिल्ली से सर्वप्रथम प्रकाशित हुई थी।) में लिखा हैः ‘‘कागभुसुन्डी और गरुड़ दोनों राम की सेवा में दीर्घ अवधि तक रहे। वे उनके उपदेशों को न केवल सुनते ही रहे, बल्कि लोगों को सुनाते भी रहे।  इन उपदेशों की चर्चा तुलसीदास जी ने ‘संग्राम पुराण’ के अपने अनुवाद में की है, जिसमें शंकर जी ने अपने पुत्र षण्मुख को आनेवाले धर्म और अवतार (ईशदूत) के विषय में पूर्व-सूचना दी है।’’ अनुवाद इस प्रकार है-&lt;br /&gt;यहां न पक्षपात कछु राखहुं।&lt;br /&gt;वेद, पुराण, संत मत भाखहुं।।&lt;br /&gt;संवत विक्रम दोऊ अनड़गा।&lt;br /&gt;महकोक नस चतुर्पतड़गा।।&lt;br /&gt;राजनीति भव प्रीति दिखावै।&lt;br /&gt;आपन मत सबका समझावै।।&lt;br /&gt;सुरन चतुसुदर सतचारी।&lt;br /&gt;तिनको वंश भयो अति भारी।।&lt;br /&gt;तब तक सुन्दर मद्दिकोया।&lt;br /&gt;बिना महामद पार न होया।।&lt;br /&gt;तबसे मानहु जन्तु भिखारी।&lt;br /&gt;समरथ नाम एहि व्रतधारी।।&lt;br /&gt;हर सुन्दर निर्माण न होई।&lt;br /&gt;तुलसी वचन सत्य सच होई।।&lt;br /&gt;(संग्राम पुराण, स्कन्द, 12, कांड 6: पद्यानुवाद, गोस्वामी तुलसीदास)&lt;br /&gt;पंडित धर्मवीर उपाध्याय ने इनका भावानुवाद इस प्रकार किया है- ‘‘(तुलसीदास जी कहते हैं: ) मैंने यहां किसी प्रकार का पक्षपात न करते हुए संतों, वेदों और पुराणों के मत को कहा है। सातवीं विक्रमी सदी में चारों सूर्यों के प्रकाश के साथ वह पैदा होगा। राज करने में जैसी परिस्थितियां हों, प्रेम से या सख़्ती से वह अपना मत सभी को समझा सकेगा। उसके साथ चार देवता (प्रमुख सहयोगी) होंगे, जिनकी सहायता से उनके अनुयायियों की संख्या काफ़ी हो जाएगी। जब तक सुन्दर वाणी (कुरआन) धरती पर रहेगी (उसके) और महामद (हज़रत मुहम्मद सल्ल.) के बिना मुक्ति (निजात) नहीं मिलेगी। इनसान, भिखारी, कीड़े-मकोड़े और जानवर इस व्रतधारी का नाम लेते ही ईश्वर के भक्त हो जाएंगे। फिर कोई उसकी तरह का पैदा न होगा (अर्थात्) कोई रसूल नहीं आएगा), तुलसीदास जी ऐसा कहते हैं कि उनका वचन सिद्ध होगा।’’ (कोष्ठक में दिए गए शब्द व्याख्या के लिए लिखे हैं।। यहां एक और मंतव्य स्पष्ट करना प्रासंगिक होगा कि संग्राम पुराण की गणना भले ही अर्वाचीन पुराणों में की जाती हो, लेकिन इसका आधार प्राचीन हिन्दू धर्मग्रंथ ही हैं, जैसा कि अन्य पुराणों व ग्रंथों एवं विचारों के आधार पर अर्थात भूतकालिक प्रमाणों की रौशनी में हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के आगमन की सूचना दी गई है। अतः पुराण के अर्वाचीन अथवा प्राचीन होने से संबंधित तथ्य के निरूपण नहीं पैदा होता।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कल्कि अवतार और हज़रत मुहम्मद (सल्ल.)'&lt;br /&gt;संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान डा. वेद प्रकाश उपाध्याय ने अपने एक शोधपत्र में मुहम्मद (सल्ल.) को कल्कि अवतार बताया है। कल्कि और मुहम्मद (सल्ल.) की विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन करके डा. उपाध्याय ने यह सिद्ध कर दिया है कि कल्कि का अवतार हो चुका है और वे हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ही हैं। इस शोधपत्र की भूमिका में वे लिखते हैं-&lt;br /&gt;‘‘वैज्ञानिक अणु विस्पफोटों से जो सत्यानाश संभव है, उसका निराकरण धार्मिक एकता सम्बंधी विचारों से हो जाता है। जल में रहकर मगर से बैर उचित नहीं, इस कारण मैंने वह शोध किया जो धार्मिक एकता का आधार है। राष्ट्रीय एकता के समर्थकों द्वारा इस शोधपत्र पर कोई आपत्ति नहीं होगी। आपत्ति होगी तो कूपमण्डूक लोगों को, यदि वे कूप के बाहर निकलकर संसार को देखें तो कूप को ही संसार मानने की उनकी भावना हीन हो जाएगी।’’ .... ‘‘मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस शोध पुस्तक के अवलोकन से भारतीय समाज में ही नहीं बल्कि अखिल भूमण्डल में एकता की लहर दौड़ पड़ेगी और धर्म के नाम पर होनेवाले कलह शांत होंगे।’’&lt;br /&gt;यहां पर इस शोधपत्र की ख़ास बातें और अन्य स्रोतों से प्राप्त तद् विषयक सामग्री पेश की जा रही है।&lt;br /&gt;अवतार का तात्पर्य&lt;br /&gt;अवतार शब्द ‘अव’ उपसर्गपूर्वक ‘तृ’ धातु में ‘घज्‍ज्' प्रत्यय लगाकर बना है। इसका अर्थ पृथ्वी पर आना है। ‘ईश्वर का अवतार’ शब्द का अर्थ है- सबको संदेश देनेवाले महात्मा का पृथ्वी पर जन्म लेना। कल्कि अवतार को ईश्वर का अन्तिम अवतार बताया गया है। ‘ईश्वर का अवतार’ शब्द में ‘का’ शब्द सम्बंधकारक चिन्ह है, अतः ज़ाहिर है कि ईश्वर से संबद्ध व्यक्ति का अवतीर्ण होना। ईश्वर से संबद्ध कौन है? उसका भक्त ही सबसे संबद्ध हो सकता है। ऋग्वेद में ऐसे व्यक्ति को ‘कीरि’ कहा गया है। हिन्दी में ‘कीरि’ शब्द का अर्थ ‘ईश्वर का प्रशंसक’ और अरबी में ‘अहमद’ होता है। लेकिन क्या ईश्वर का प्रशंसक ‘कीरि’ या ‘अहमद’ एक नहीं हो सकता। हर देश और समय के लिए अलग-अलग अवतार हुए हैं क्योंकि एक अवतार से पूरे विश्व का कल्याण नहीं हो सकता था। कुरआन में है कि हर भाग में रसूल (संदेशवाहक) भेजे गए। अंतिम अवतार कल्कि की अलग विशेषता है। वे किसी एक हिस्से के लिए नहीं वरन् समय विश्व के लिए भेजे गए।&lt;br /&gt;जब लोग वास्तविक धर्म से विमुख होकर अधर्म की राह पकड़ लेते हैं या धर्म को अपने स्वार्थ के लिए तोड़-मरोड़ देते हैं, तो उन्हें फिर सही मार्ग दिखाने के लिए ईश्वर अपने अवतार या पैग़म्बर भेजता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतिम अवतार के आने का लक्षण&lt;br /&gt;कल्कि के अवतरित होने का समय उस माहौल में बताया गया है, जबकि बर्बरता का साम्राज्य होगा। लोगों में हिंसा व अराजकता का बोलबाला होगा। पेड़ों का न फलना, न फूलना। अगर फल-फूल आएं भी तो बहुत कम। दूसरों को मारकर उनका धन लूट लेना और लड़कियों को पैदा होते ही पृथ्वी में गाड़ देना। एक ईश्वर को छोड़कर कई देवी-देवताओं की पूजा, पेड़-पौधों एवं पत्थरों को भगवान मानने की प्रवृत्ति, भलाई की आड़ में बुराई करने की प्रवृत्ति, असमानता आदि है। ऐसे ही नाजुक दौर में हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) भेजे गए थे।&lt;br /&gt;सातवीं शताब्दी के शुरू में रोमन और पर्सियन साम्राज्यों की जितनी बुरी अवस्था थी, उतनी शायद कभी नहीं हुई। बाइजेन्टाइन साम्राज्य के क्षीण हो जाने से सम्पूर्ण शासन नष्ट हो चुका था। पादरियों के दुष्कर्मों और दुष्टताओं के फलस्वरूप ईसाई धर्म बहुत गिर गया था। पारस्परिक संघर्षों और शत्रुता के कारण अफ़रा-तफ़री का आलम था। इस समय हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) भेजे गए। इस्लाम धर्म रोमन साम्राज्य के संघार्षों से दूर था। इस धर्म के भाग्य में यही लिखा था कि यह तूफ़ान की तरह से सम्पूर्ण पृथ्वी पर छा जाएगा और अपने समक्ष बहुत-से साम्राज्यों, शासकों और प्रथाओं को इस तरह उड़ा देगा जैसे कि आंधी मिट्टी को उड़ा देती है। ('Apology for Mohammed' b Gofrey Higgins,2) इसी प्रकार सेल ने कुरआन के अनुवाद की प्रस्तावना में लिखा है-‘‘गिरजाघर के पादरियों ने धर्म के टुकड़े-टुकड़े कर डाले थे और शांति प्रेम एवं अच्छाइयां लुप्त हो गई थीं। वे मूल धर्म को भूल गए थे। धर्म के विषय में अपने तरह-तरह के विचार बनाए हुए परस्पर कलह करते रहते थे। इसी पृथ्वी में रोमन गिरजाघरों में बहुत-सी भ्रम की बातें धर्म के रूप में मानी जाने लगीं और मूर्ती-पूजा बहुत ही निर्लज्जता से की जाने लगी। (Translation of the Qur'an, by Gorage Sale, First Tranlation/Preface on pages 25/26)’’ इसके परिणामस्वरूप एक ईश्वर के स्थान पर तीन ईश्वर हो गए और मरयम को ईश्वर की मां समझा जाने लगा। अज्ञानता के इस दौर में अल्लाह ने अपना अंतिम रसूल भेजा।&lt;br /&gt;दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि अंतिम अवतार उस समय होगा जबकि युद्धों में तलवार का इस्तेमाल होता होगा और घोड़ों की सवारी की जाती हो। भागवत पुराण में उल्लेख है कि ‘देवताओं द्वारा दिए गए वेगगामी घोड़े पर चढ़कर आठों ऐश्वर्यों और गुणों से युक्त जगत्पति तलवार से दुष्टों का दमन करेंगे। (अश्वमाशुगमारुह्य देवदत्तं जगत्पतिः। असिनासाधुदमनमष्टैश्वर्य गुणान्वितः।।) (भागवत् पुराण, 12 स्कंध, 2 अध्याय, 19वां श्लोक) तलवारों और घोड़ों का युग तो अब समाप्त हो चुका है। आज से लगभग चैदह सौ वर्ष पूर्व तलवारों और घोड़ों का प्रयोग होता था। उसके लगभग सौ वर्ष बाद से बारूद का निर्माण सोडा और कोयला मिलाकर होने लगा था। वर्तमान समय में तो घोड़ों और तलवारों का स्थान टैंकों और मिसाइलों आदि ने ले लिया है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल्कि का अवतार-स्थान&lt;br /&gt;कल्कि के अवतार का स्थान शम्भल ग्राम में होने का उल्लेख कल्कि एवं भागवत् पुराण में किया गया है। यहां पहले यह निश्चय करना आवश्यक है कि शम्भल ग्राम का नाम है या किसी ग्राम का विशलेषण। डा. वेद प्रकाश उपाध्याय के मतानुसार ‘शम्भल’ किसी ग्राम का नाम नहीं हो सकता, क्योंकि यदि केवल किसी ग्राम विशेष को ‘शम्भल’ नाम दिया गया होता तो उसकी स्थिति भी बताई गई होती। भारत में खोजने पर यदि कोई ‘शम्भल’ नामक ग्राम लिखता है तो वहां आज से लगभग चौदह सौ वर्ष पहले कोई पुरुष ऐसा नहीं पैदा हुआ जो लोगों का उद्धारक हो। फिर अंतिम अवतार कोई खेल तो नहीं है कि अवतार हो जाए और समाज में ज़रा-सा परिवर्तन भी न हो, अतः ‘शम्भल’ शब्द को विशेषण मानकर उसकी व्युत्पत्ति पर विचार करना आवश्यक है।&lt;br /&gt;(1) ‘शम्भल’ शब्द ‘शम्’ (शांत करना) धातु से बना है अर्थात, जिस स्थान में शान्ति मिले।&lt;br /&gt;(2) सम् उप सर्गपूर्वक ‘वृ’ धातु में अप् प्रत्यय के संयोग से निष्पन्न शब्द ‘संवर’ हुआ। वबयोरभेदः और रलयोरभेदः के सिद्धांत से शम्भल शब्द की निष्पत्ति हुई, जिसका अर्थ हुआ ‘जो अपनी ओर लोगों को खींचता है या जिसके द्वारा किसी को चुना जाता है’।&lt;br /&gt;(3) ‘शम्वर’ शब्द का निघण्टु (1/12/88) में उदकनामों के पाठ हैं। ‘र’ और ‘ल’ में अभेद होने के कारण शम्भल का अर्थ होगा जल का समीपवर्ती स्थान’। (कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब, पृ. 30)&lt;br /&gt;इस प्रकार वह स्थान जिसके आसपास जल हो और वह स्थान अत्यंत आकर्षण एवं शांतिदायक हो, वही शम्भल होगा। अवतार की भूमि पवित्र होती है। ‘शम्भल’ का शाब्दिक अर्थ है- शांति का स्थान। मक्का को अरबी में ‘दारूल अमन’ कहा जाता है, जिसका अर्थ शांति का घर होता है। मक्का मुहम्मद (सल्ल.) का कार्यस्थल रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्म तिथि&lt;br /&gt;कल्कि पुराण में अंतिम अवतार के जन्म का भी उल्लेख किया गया है। इस पुराण के द्वितीय अध्याय के श्लोक 15 में वर्णित है-&lt;br /&gt;‘‘द्वादश्यां शुक्ल पक्षस्य, माधवे मासि माधवम्।&lt;br /&gt;जातो ददृशतुः पुत्रं पितरौ ह्रष्टमानसौ।।&lt;br /&gt;अर्थात ‘‘जिसके जन्म लेने से दुखी मानवता का कल्याण होगा, उसका जन्म मधुमास के शुक्ल पक्ष और रबी फसल में चंद्रमा की 12वीं तिथि को होगा।’’ एक अन्य श्लोक में है कि कल्कि शम्भल में विष्णुयश नामक पुरोहित के यहां जन्म लेंगे। (शम्भलग्राममुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः। भवने विष्णुयशसः कल्किः प्रादुर्भविष्यति।।) (भागवत पुराण, द्वादश स्कंध, 2 अध्याय, 18वाँ श्लोक)&lt;br /&gt;मुहम्मद साहब (सल्ल.) का जन्म 12 रबीउल अव्वल को हुआ। रबीउल अव्वल का अर्थ होता हैः मधुमास का हर्षोल्लास का महीना। आप मक्का में पैदा हुए। विष्णुयशसः कल्कि के पिता का नाम है, जबकि मुहम्मद साहब के पिता का नाम अब्दुल्लाह था। जो अर्थ विष्णुयश का होता है वही अब्दुल्लाह का। विष्णु यानी अल्लाह और यश यानी बन्दा = अर्थात अल्लाह का बन्दा = अब्दुल्लाह।&lt;br /&gt;इसी तरह कल्कि की माता का नाम सुमति (सोमवती) आया है जिसका अर्थ है - शांति एवं मननशील स्वभाववाली। आप (सल्ल.) की माता का नाम भी आमिना था जिसका अर्थ है शांतिवाली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्तिम अवतार की विशेषताएं&lt;br /&gt;कल्कि की विशेषताएं हज़रत मुहम्मद साहब (सल्ल.) के जीवन (सीरत) से मिलती-जुलती हैं। इन विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन यहां पेश किया जा रहा है।&lt;br /&gt;1. अश्वारोही और खड्गधारी - पहले लिखा जा चुका है कि भागवत पुराण में अंतिम अवतार के अश्वारोही और खड्गधारी होने का उल्लेख है। उसकी सवारी ऐसे घोड़े की होगी जो तेज़ गति से चलने वाला होगा और देवताओं द्वारा प्रदत्त होगा। तलवार से वह दुष्टों का संहार करेगा। घोड़े पर चढ़कर तलवार से दुष्टों का दमन करेगा। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) को भी फ़रिश्तों द्वारा घोड़ा प्राप्त हुआ था, जिसका नाम बुर्राक़ था। उसपर बैठकर अंतिम रसूल ने रात्रि को तीर्थयात्रा की थी। इसे ‘मेराज’ भी कहते हैं। इस रात आपकी अल्लाह से बातचीत हुई थी और आपको बैतुलमक्‍किदस (यरूशलम) भी ले जाया गया था।&lt;br /&gt;मुहम्मद साहब को घोड़े अधिक प्रिय थे। आपके पास सात घोड़े थे। हज़रत अनस (रजि.) से रिवायत है कि मैंने मुहम्मद (सल्ल.) को देखा कि घोड़े पर सवार थे और गले में तलवार लटकाए हुए थे। (बुख़ारी शरीफ़ की हदीस) आपके पास नौ तलवारें थीं। कुल परम्परा से प्राप्त तलवारें जुल्फ़िक़ार नामक तलवार, क़लईया नामवाली तलवार।&lt;br /&gt;2. दुष्टों का दमन - कल्कि के प्रमुख विशेषताओं में एक विशेषता यह भी है कि यह दुष्टों का ही दमन करेगा। (भागवत पुराण 12-2-19) धर्म के प्रसार और दुष्टों के दमन में मदद के लिए देवता भी आकाश से उतर आएंगे; (यात यूयं भुवं देवाः स्वांशावतरणे रताः।) (कल्कि पुराण, अध्याय 2, श्लोक 7) हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने दुष्टो का दमन किया। उन्होंने डकैतों, लुटेरों और अन्य असामाजिक तत्वों को सुधारकर मानवता का पाठ पढ़ाया और उन्हें सत्य मार्ग दिखाया। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने ऐसे कुसंस्कृत लोगों का सुसंस्कृत से रहना सिखाया। औरतों को उनका हक़ दिलाया। एकेश्वर के साथ तमाम देवताओं के घालमेल का आपने ज़ोरदार खंडन किया तथा कहा कि इस्लाम कोई नया धर्म नहीं है, बल्कि सनातन धर्म है। दुष्टों के दमन में आपको फ़रिश्तों की मदद मिली। कुरआन मजीद में अल्लाह कहता है कि अल्लाह ने तुमको बद्र की लड़ाई में मदद दी और तुम बहुत कम संख्या में थे, तो तुमको चाहिए कि तुम अल्लाह ही से डरो और उसी के शुक्रगुज़ार होओ। जब तुम मोमिनों से कह रहे थे कि क्या तुम्हारे लिए काफ़ी नहीं है कि तुम्हारा रब तुमको तीन हज़ार फरिश्ते भेजकर करे, बल्कि अगर उसपर सब्र करो और अल्लाह से डरते रहो, तो अल्लाह तुम्हारी मदद पांच हज़ार फ़रिश्तों से करेगा। (कुरआन, सूरा आले इमरान, आयत संख्या 123, 124 और 125)।&lt;br /&gt;सूरा अहज़ाब में भी हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) को ईश्वर की मदद मिलने का उल्लेख है। इस सूरह की आयत संख्या 9 में वर्णित है कि ‘‘ऐ ईमानवालों! अल्लाह की उस कृपा का स्मरण करो, जब तुम्हारे विरूद्ध सेनाएं आईं तो हमने भी उनके विरुद्ध पवन और ऐसी सेनाएं भेजीं, जिनको तुम नहीं देखते थे, और जो कुछ तुम कर रहे थे, वह अल्लाह देख रहा था।’’ इस प्रकार दुष्टों का नाश करने में ईश्वर ने हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) की मदद के लिए अपने फ़रिश्ते और अपनी सेनाएं भेजी।&lt;br /&gt;3. जगत्पति - पति शब्द ‘पा’ (रक्षा करना) धातु में उति ‘प्रत्यय’ के संयोग से बना है। जगह का अर्थ है संसार। अतः जगत्पति का अर्थ हुआ संसार की रक्षा करने वाला। भागवत पुराण में अंतिम अवतार कल्कि को जगत्पति भी कहा गया है। (भागवत पुराण, द्वादश स्कंध, द्वितीय अध्याय, 19 वां श्लोक)&lt;br /&gt;हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) जगत्पति (संस्कृत के व्याकरणाचार्य वामन शिवराम आप्टे ने ‘‘पति’’ शब्द का अर्थ ‘‘प्रधानता करनेवाला’’ भी बताया है (देखिए, संस्कृत हिन्दी कोश, पृ. 568, मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स संस्करण 1989)। इस प्रकार जगत्पति का अर्थ हुआ: संसार में प्रधानता करनेवाला। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) जिस इस्लाम धर्म को लेकर आए, वह यद्यपि मानव जीवन के आरंभ से विद्यमान था, परन्तु आप (सल्ल.) के ज़रिए इसे पूर्णता और प्रधानता प्राप्त हुई। कुरआन में अल्लाह का कथन है: ‘‘आज मैंने तुम्हारे लिए पूर्ण कर दिया और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी, और तुम्हारे लिए इस्लाम को ‘‘दीन’’ (धर्म) की हैसियत से पसंद किया।’’) (5ः3)&lt;br /&gt;(अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने संसार में सत्य को प्रधानता दी, उसे फैलाया और लोगों को इसके लिए उभारा कि स्वयं भी सत्य का अनुसरण करें और दूसरों तक सत्य-संदेश पहुंचाएं। आप (सल्ल.) के द्वारा नेकियों और अच्छाइयों को प्रधानता मिली। अच्छे शील स्वभाव और नैतिकता की पूर्ति हुई। एक हदीस में आप (सल्ल.) ने कहा: ‘‘अल्लाह ने मुझे नैतिक गुणों और अच्छे कामों की पूर्ति के लिए भेजा है।’’) (शरहुस्सुन्नह) हैं, क्योंकि उन्होंने पतनशील समाज को बचाया। उसकी रक्षा की और संमार्ग दिखाया। आप सारे संसार के लोगों के लिए ईश्वर का संदेश लेकर आए। कुरआन में है-‘‘ऐ मुहम्मद एलान कर दो कि सारी दुनिया के लिए नबी होकर तुम आए हो।’’ (कुरआन, सूरा आराफ़, आयत संख्या 158) एक अन्य स्थान पर है-‘‘अत्यंत बरकतवाला है वह जिसने अपने बंदे पर पवित्रा ग्रन्थ कुरआन उतारा ताकि सम्पूर्ण संसार के लिए वह पापों का डर दिखानेवाला हो।’’ (कुरआन, सूरा फुरक़ान, आयत संख्या 1)&lt;br /&gt;4. चार भाइयों के सहयोग से युक्त - कल्कि पुराण के अनुसार चार भाइयों के साथ कल्कि कलि (शैतान) का निवारण करेंगे। (चतुर्भिभ्र्रातृभिर्देव करिष्यामि कलिक्षयम्।) (कल्कि पुराण अध्याय 2, श्लोक 5)&lt;br /&gt;मुहम्मद (सल्ल.) ने भी चार साथियों के साथ शैतान का नाश किया था। ये चार साथी थे-अबू बक्र (रजि.), उमर (रजि.), उसमान (रजि.) और अली (रजि.)।&lt;br /&gt;5. अंतिम अवतार - कल्कि को अंतिम युग का अंतिम अवतार बताया है। (भागवत पुराण के 24 अवतारों के प्रकरण में कल्कि सबसे अंतिम अवतार हैं।) (भा.पु. प्रथम स्कंध, तृतीय अध्याय, 25वां श्लोक) मुहम्मद (सल्ल.) ने भी एलान किया था कि मैं अंतिम रसूल हूं।&lt;br /&gt;‘कल्कि’ शब्द का अर्थ ‘वाचस्पत्यम्’ तथा ‘शब्दकल्पतरु’ में अनार का फल खानेवाले तथा कलंक को धोनेवाले किया गया है। पैग़म्बर (सल्ल.) भी अनार और खजूर का फल खाते थे तथा प्राचीन काल में आगत मिश्रण (शिर्क) और नास्तिकता (कुफ्र) को धो दिया। (कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब पृ. 41)&lt;br /&gt;6. उपदेश और उत्तर दिशा की ओर जाना - कल्कि पैदा होने के पश्चात पहाड़ी की तरफ़ चले जाएंगे और वहां परशुराम जी से ज्ञान प्राप्त करेंगे। बाद मंे उत्तर की तरफ़ जाकर फिर लौटेंगे। मुहम्मद (सल्ल.) भी जन्म के कुछ समय बाद पहाड़ियों की तरफ़ चले गए और वहां जिबरील (अलैहि.) के ज़रिए अल्लाह का ज्ञान प्राप्त किया। उसके बाद वे उत्तर मदीने जाकर वहां से फिर दक्षिण लौटे और अपने को जीत लिया। पुराणों में कल्कि के बारे में ऐसा भी लिखा है।&lt;br /&gt;7. आठ सिद्धियों और गुणों से युक्त - कल्कि अवतार को भागवत पुराण 12 स्कन्ध, द्वितीय अध्याय में ‘अष्टैश्वर्यगुणान्वितः’ (आठ ईश्वरीय गुणों से युक्त) बताया गया है। ये आठ ईश्वरीय गुण महाभारत में भी उल्लेख किए गए हैं। ये गुण निम्मन हैं-&lt;br /&gt;1. वह महान ज्ञानी होगा।&lt;br /&gt;2. वह उच्च वंश का होगा।&lt;br /&gt;3. वह आत्मनियंत्रक होगा।&lt;br /&gt;4. वह श्रुतिज्ञानी होगा।&lt;br /&gt;5. वह पराक्रमी होगा।&lt;br /&gt;6. वह अल्पभाषी होगा।&lt;br /&gt;7. वह दानी होगा और&lt;br /&gt;8. वह कृतज्ञ होगा। (अष्टौगुणा: पुरुषं दीपयन्ति, प्रज्ञा च कौल्यं च दम श्रुतंच। पराक्रमश्चा बहुभाषिता च, दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च। - महाभारत)&lt;br /&gt;अब हम इन गुणों को पैग़म्बरे इस्लाम (सल्ल.) के गुणों से क्रमवार साम्यता करेंगे। मुहम्मद (सल्ल.) महान ज्ञानी थे। उनमें प्रज्ञा दृष्टि थी।&lt;br /&gt;आप (सल्ल.) ने भूत और भविष्य की अनेक बातें बताईं, जो एकदम सत्य सिद्ध हुईं।&lt;br /&gt;पहले उल्लेख किया गया है कि रूमियों की हार और बाद में उनकी जीत की भविष्यवाणी मुहम्मद (सल्ल.) ने की थी। आपकी दूरदर्शिता से संबंधित अनेक उदाहरण हैं, जो आपके उच्च ज्ञान को सिद्ध करते हैं।&lt;br /&gt;मुहम्मद (सल्ल.) उच्च वंश में पैदा हुए। आपका जन्म 571 ई. में कुरैश की पंक्ति में हाशिम परिवार में हुआ था, जो अरब के निवासियों द्वार माननीय और काबा का परम्परागत संरक्षक था।&lt;br /&gt;हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) को इन्द्रियदमन या आत्मनियंत्राण का ईश्वरीय गुण भी प्राप्त था। आप आम्प्रशंसा से हीन, दयालु, शांत, इन्द्रियजीत और उदार थे। (Modesty and kinliness, patience, self deanial and riveted the affections off all around him, p.525, Life of Mohamed' by Sir Willaim Muir.)&lt;br /&gt;आप श्रुतिज्ञानी भी थे। श्रुत का अर्थ है, ‘जो ईश्वर के द्वारा सुनाया गया और ऋषियों द्वारा सुना गया हो।’ मुहम्मद (सल्ल.) पर जिबरील (अलैहि.) नामक फ़रिश्ते के ज़रिए ईश्वरीय ज्ञान भेजा जाता था। लेनपूल अपनी पुस्तक ''Introduction, Speeches of Muhammad" में लिखते हैं कि मुहम्मद (सल्ल.) को देवदूत की सहायता से ईश्वरीय वाणी का भेजा जाना निस्संदेह सत्य है। सर विलियम म्योर ने भी लिखा है कि वे सन्देष्टा और ईश्वर के प्रतिनिधि थे। (He was now the Servant, the Prophet, the vice gerent of God.)&lt;br /&gt;पराक्रम अष्टगुणों में पांचवां गुण है। रसूलुल्लाह (सल्ल.) काफ़ी पराक्रमी भी थे। आपके पराक्रम को दर्शाते हुए डा. वेद प्रकाश उपाध्याय ने एक घटना का ज़िक्र किया है जो इस प्रकार है-&lt;br /&gt;‘किसी गुफा में अकेले उपस्थित पहलवान, जो कुरैश से सम्बंधित था, से मुहम्मद (सल्ल.) ने ईश्वर से न डरने और ईश्वर पर विश्वास ने करने का कारण पूछा, जिसपर पहलवान ने सत्य की स्पष्टता के लिए कहा। तब मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा कि तू बड़ा वीर है, यदि कुश्ती में मैं तुझे नीच दिखाऊँ तो क्या विश्वास करेगा? उसेन स्वीकारात्मक उत्तर दिया। तब हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने उसे हरा दिया। (अल्लामा क़ाज़ी सलमान मंसूरपुरी ने अपनी सीरत की किताब ‘‘रहमतुललिल आलमीन’’ में ‘‘शिफ़ा’’ नामक पुस्तक के पृष्ठ 64 के हवाले से लिखा है कि आप (सल्ल.) ने उसे तीन बार हराया, फिर भी उस पहलवान ने मुहम्मद (सल्ल.) को पैग़म्बर न माना तथा ईश्वर की सत्यता पर विश्वास ने किया।&lt;br /&gt;आठ गुणों में अल्पभाषी होना एक विशिष्ट गुण है। अल्लाह के रसूल (सल्ल.) कम बोलते थे। अधिकतर मौन रहते परन्तु जो कुछ बोलते थे, वह इतना प्रभावोत्पादक होता था कि लोग आपकी बातें नहीं भूलते थे। (Introduction The speeches of Mohammad by Lane-Pool page-24)&lt;br /&gt;दान देना महापुरुषों का एक प्रमुख गुण रहा है। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) दान देने से पीछे नहीं हटते। यही कारण था कि आपके घर पर ग़रीबों की भीड़ लगी रहती थी। आपके घर से कभी कोई निराश होकर नहीं लौटा।&lt;br /&gt;मुहम्मद (सल्ल.) के गुणों में कृतज्ञता भी थी। वे किसी के उपकार को नहीं भूलते। अनसार के प्रति कहे गए वाक्य आपकी कृतज्ञता का प्रमाण पेश करते हैं। (असह उस सियर, पृ. 343) इस प्रकार यह सिद्ध हो गया कि मुहम्मद (सल्ल.) में आठों ईश्वरीय गुणों का समावेश था।&lt;br /&gt;8. शरीर से सुगन्ध का निकलना - भागवत पुराण में भविष्यवाणी की गई है कल्कि के शरीर से ऐसी सुगंध निकलेगी, जिससे लोगों के मन निर्मल हो जाएंगे। उनके शरीर की सुगंध हवा में मिलकर लोगों के मन को निर्मल करेगी। (अथ तेषां भविष्यन्ति मनांसि विशदानि वै। वासु देवांगरागति पुण्यगन्धानिल स्पृशाम्।) (भागवत पुराण, द्वादश स्कंध, द्वितीय अध्याय, 21वां श्लोक) शिमायल तिरमिज़ी में लिखा है कि मुहम्मद (सल्ल.) के शरीर की खुशबू तो प्रसिद्ध ही है। मुहम्मद (सल्ल.) जिससे हाथ मिलाते थे, उसके हाथ से दिनभर सुगन्ध आती रहती थी। (पृष्ठ 208, शिमाएल तिरमिज़ी, अनुवाद: मौलाना मुहम्मद ज़करिया)&lt;br /&gt;एक बार उम्मे सुलैत ने मुहम्मद (सल्ल.) के शरीर का पसीना एकत्रा किया। आप (सल्ल.) के पूछने पर उन्होंने बताया कि इसे हम खुशबूओं में मिलाते हैं क्योंकि यह सभी सुगन्ध से बढ़कर है।&lt;br /&gt;9. अनुपम कान्ति से युक्त - कल्कि अनुपम कान्ति से युक्त होंगे। (विचरन्नाशुना क्षोण्यां हयेनाप्रतिमद्युतिः। नृपलिंगच्छदो दस्यून्कोटिशोनिहनिष्यति।।) (भा.पु., द्वादश स्कंध, द्वितीय अध्याय, 20वां श्लोक) बुख़ारी शरीफ़ की हदीस के मुताबिक़ मुहम्मद (सल्ल.) सभी व्यक्तियों में अधिक सुंदर थे और सभी मनुष्यों में अधिक आदर्शवान एवं योद्धा थे। (हज़रत अनस (रजि.) की रिवायत, जमउल फ़वायद, पेज 178) सर विलियम म्योर ने भी मुहम्मद (सल्ल.) को बहुत सुंदर स्वरूपवाला, पराक्रमी और दीनी बताया है। ('e was' says and admiring follwen, the handsomest and bravest, the bright faced and most generous of men, P. 523, The Life of Mohammad')&lt;br /&gt;10. ईश्वरीय वाणी का उपदेष्टा - डा. वेद प्रकाश उपध्याय ‘कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब’ के पृष्ठ 50, 51 पृष्ठ पर लिखते हैं कि ‘कल्कि के विषय में यह बात भारत में प्रसिद्ध ही है कि वह जो धर्म स्थापित करेंगे वह वैदिक धर्म होगा और उनके द्वारा उपदिष्ट शिक्षाएं ईश्वरीय शिक्षाएं होगी। मुहम्मद (सल्ल.) के द्वारा अभिव्यक्त कुरआन ईश्वरीय वाणी है, यह तो स्पष्ट ही है, भले ही हठी लोग इस बात को न मानें। क़ुरआन में जो नीति, सदाचार, प्रेम, उपकार आदि करने के लिए प्रेरणा के स्रोत विद्यमान हैं, वही वेद में भी है। कुरआन में मूर्ति पूजा भी खण्डन, एकेश्वरवाद (तौहीद) की शिक्षा, परस्पर प्रेम के व्यवहार का उपदेश है। वेद में ‘एकम् सत्’ तथा विश्वबन्धुत्व की उत्कृष्ट घोषणा है। वेदों में ईश्वर की भक्ति का आदेश है और कुरआन की शिक्षा के द्वारा मुसलमान दिन में पाँच बार नमाज़ अवश्य पढ़ते हैं, जबकि ब्राह्मण वर्ग में बिरले लोग ही त्रिकाल संध्या करनेवाले मिलेंगे।&lt;br /&gt;यहाँ यह तथ्य उजागर करना उचित होगा कि वेदों और कुरआन की शिक्षाओं में भी बहुत कुछ समानता है। मिसाल के तौर पर वेद, गीता और स्मृतियों में एक ईश्वर की भक्ति करने का आदेश है और अपनी की हुई बुराइयों की क्षमा माँगने के लिए भी उसी ईश्वर से प्रार्थना करने का आदेश है। क़ुरआन में है: ‘‘ऐ नबी! कह दो, मैं तो केवल तुम्हारे जैसा एक मनुष्य हूं। मेरी ओर वह्य (प्रकाशना) की जाती है कि तुम्हारा पूज्य अकेला पूज्य है, तो तुम सीधे उसी की ओर मुख करो और क्षमा भी उसी से माँगो। (हा. मीम. अस सजदा आयत संख्या 6।) डा. उपाध्याय कहते हैं कि कल्कि और मुहम्मद (सल्ल.) के विषय में जो अभूतपूर्व साम्य मुझे मिला उसे देखकर आश्चर्य होता है कि जिन कल्कि की प्रतीक्षा में भारतीय बैठे हैं, वे आ गए और वही मुहम्मद साहब हैं। (कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब, पृ. 59)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद् में भी मुहम्मद (सल्ल.) की चर्चा&lt;br /&gt;उपनिषदों में भी मुहम्मद साहब और इस्लाम के बारे में जहाँ-तहाँ उल्लेख मिलता है। नागेंद्र नाथ बसु द्वारा संपादित विश्वकोष के द्वितीय खण्ड में उपनिषदों के वे श्लोक दिए गए हैं, जो इस्लाम और पैग़म्बर (सल्ल.) से ताल्लुक़ रखते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख श्लोक और उनके अर्थ प्रस्तुत किए जा रहे हैं ताकि पाठकों वास्तविकता का पता चल सके-&lt;br /&gt;अस्माल्लां इल्ले मित्रावरुणा दिव्यानि धत्त&lt;br /&gt;इल्लल्ले वरुणो राजा पुनर्दुदः।&lt;br /&gt;हयामित्रो इल्लां इल्लां वरुणो मित्रास्तेजस्कामः ।। 1 ।।&lt;br /&gt;होतारमिन्द्रो होतारमिन्द्र महासुरिन्द्राः।&lt;br /&gt;अल्लो ज्येष्ठं श्रेष्ठं परमं पूर्ण बह्माणं अल्लाम् ।। 2 ।।&lt;br /&gt;अल्लो रसूल महामद रकबरस्य अल्लो अल्लाम् ।। 3 ।।&lt;br /&gt;(अल्लोपनिषद 1, 2, 3)&lt;br /&gt;अर्थात, ‘‘इस देवता का नाम अल्लाह है। वह एक है। मित्रा वरुण आदि उसकी विशेषताएँ हैं। वास्तव में अल्लाह वरुण है जो तमाम सृष्टि का बादशाह है। मित्रो! उस अल्लाह को अपना पूज्य समझो। यह वरुण है और एक दोस्त की तरह वह तमाम लोगों के काम संवारता है। वह इंद्र है, श्रेष्ठ इंद्र। अल्लाह सबसे बड़ा, सबसे बेहतर, सबसे ज़्यादा पूर्ण और सबसे ज़्यादा पवित्रा है। मुहम्मद (सल्ल.) अल्लाह के श्रेष्ठतर रसूल हैं। अल्लाह आदि, अंत और सारे संसार का पालनहार है। तमाम अच्छे काम अल्लाह के लिए ही हैं। वास्तव में अल्लाह ही ने सूरज, चांद और सितारे पैदा किए हैं।’’&lt;br /&gt;उपयुक्त उद्धरणों से यह निर्विवाद रूप से स्पष्ट हुआ कि सर्वशक्तिमान अल्लाह एक है और मुहम्मद (सल्ल.) उसके सन्देशवाहक (पैग़म्बर) हैं। इस उपनिषद के अन्य श्लोकों में भी इस्लाम और मुहम्मद (सल्ल.) की साम्यगत बातें आई हैं। इस उपनिषद में आगे कहा गया है-&lt;br /&gt;आदल्ला बूक मेककम्। अल्लबूक निखादकम् ।। 4 ।।&lt;br /&gt;अलो यज्ञेन हुत हुत्वा अल्ला सूय्र्य चन्द्र सर्वनक्षत्राः ।। 5 ।।&lt;br /&gt;अल्लो ऋषीणां सर्व दिव्यां इन्द्राय पूर्व माया परमन्तरिक्षा ।। 6 ।।&lt;br /&gt;अल्लः पृथिव्या अन्तरिक्ष्ज्ञं विश्वरूपम् ।। 7 ।।&lt;br /&gt;इल्लांकबर इल्लांकबर इल्लां इल्लल्लेति इल्लल्लाः ।। 8 ।।&lt;br /&gt;ओम् अल्ला इल्लल्ला अनादि स्वरूपाय अथर्वण श्यामा हुद्दी जनान पशून सिद्धांत&lt;br /&gt;जलवरान् अदृष्टं कुरु कुरु फट ।। 9 ।।&lt;br /&gt;असुरसंहारिणी हृं द्दीं अल्लो रसूल महमदरकबरस्य अल्लो अल्लाम्&lt;br /&gt;इल्लल्लेति इल्लल्ला ।। 10 ।।&lt;br /&gt;इति अल्लोपनिषद&lt;br /&gt;अर्थात् ‘‘अल्लाह ने सब ऋषि भेजे और चंद्रमा, सूर्य एवं तारों को पैदा किया। उसी ने सारे ऋषि भेजे और आकाश को पैदा किया। अल्लाह ने ब्रह्माण्ड (ज़मीन और आकाश) को बनाया। अल्लाह श्रेष्ठ है, उसके सिवा कोई पूज्य नहीं। वह सारे विश्व का पालनहार है। वह तमाम बुराइयों और मुसीबतों को दूर करने वाला है। मुहम्मद अल्लाह के रसूल (संदेष्टा) हैं, जो इस संसार का पालनहार है। अतः घोषणा करो कि अल्लाह एक है और उसके सिवा कोई पूज्य नहीं।’’ (बहुत थोड़े से विद्वान, जिनका संबंध विशेष रूप से आर्यसमाज से बताया जाता है, अल्लोपनिषद् की गणना उपनिषदों में नहीं करते और इस प्रकार इसका इनकार करते हैं, हालांकि उनके तर्कों में दम नहीं है। इस कारण से भी हिन्दू धर्म के अधिकतर विद्वान और मनीषी अपवादियों के आग्रह पर ध्यान नहीं देते। गीता प्रेस (गोरखपुर) का नाम हिन्दू धर्म के प्रमाणिक प्रकाशन केंद्र के रूप में अग्रगण्य है। यहां से प्रकाशित ‘‘कल्याण’’ (हिन्दी पत्रिका) के अंक अत्यंत प्रामाणिक माने जाते हैं। इसकी विशेष प्रस्तुति ‘‘उपनिषद अंक’’ में 220 उपनिषदों की सूची दी गई है, जिसमें अल्लोपनिषद् का उल्लेख 15वें नंबर पर किया गया है। 14वें नंबर पर अमत बिन्दूपनिषद् और 16वें नंबर पर अवधूतोपनिषद् (पद्य) उल्लिखित है। डा. वेद प्रकाश उपाध्याय ने भी अल्लोपनिषद को प्रामाणिक उपनिषद् माना है। ‘देखिए: वैदिक साहित्य: एक विवेचन, प्रदीप प्रकाशन, पृ. 101, संस्करण 1989।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राणनाथी (प्रणामी) सम्प्रदाय की शिक्षा&lt;br /&gt;हिन्दुओं के वैष्णव समुदाय में प्राणनाथी सम्प्रदाय उल्लेखनीय है। इसके संस्थापक एंव प्रवर्तक महामति प्राणनाथ थे। आपका जन्म का नाम मेहराज ठाकुर था। प्राणनाथ जी का जन्म 1618 ई. में गुजरात के जामनगर शहर में हुआ था। आपने इन्सानों को एकेश्वरवाद की शिक्षा दी और एक ही निराकार ईश्वर की पूजा-उपासना पर बल दिया। आपने नुबूव्वत अर्थात ईशदूतत्व की धारणा का समर्थन किया और इसे सही ठहराया। प्राणनाथ जी कहते हैं-&lt;br /&gt;कै बड़े कहे पैगमंर, पर एक महमंद पर खतम।&lt;br /&gt;अर्थात, धर्मग्रंथों में अनेकों पैग़म्बर बड़े कहे गए, किन्तु मुहम्मद साहब पर ईशदूतों की श्रृंखला समाप्त हुई। रसूल मुहम्मद (सल्ल.) आख़िरी पैग़म्बर हुए। (मारफ़त सागर, पृ. 39, श्री प्राणनाथ मिशन, नई दिल्ली।)&lt;br /&gt;प्राणनाथ जी ने एक स्थान पर लिखा-&lt;br /&gt;रसूल आवेगा तुम पर, ले मेरा फुरमान।&lt;br /&gt;आए मेर अरस की, देखी सब पेहेचान।।&lt;br /&gt;अर्थात, (ईश्वर ने कहाः) मेरा रसूल मुहम्मद तुम्हारे पास मेरा संदेश लेकर आएगा। वह संसार में आकर तुम्हें मेरे अर्श या परमधाम की सब तरह से पहचान कराने के लिए कुछ संकेत देगा। (मारफ़त सागर, पृ. 19, श्री प्राणनाथ मिशन, नई दिल्ली।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) और बौद्ध धर्म ग्रन्थ&lt;br /&gt;अंतिम बुद्ध-मैत्रेय और मुहम्मद (सल्ल.)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बौद्ध ग्रन्थों में जिस अंतिम बुद्धि मैत्रेय के आने की भविष्यवाणी की गई है, वे हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ही सिद्ध होते हैं। ‘बुद्ध’ बौद्ध धर्म की भाषा में ऋषि होते हैं। गौतम बुद्ध ने अपने मृत्यु के समय अपने प्रिय शिष्य आनन्दा से कहा था कि ‘‘नन्दा! इस संसार में मैं न तो प्रथम बुद्ध हूं और न तो अंतिम बुद्ध हूं। इस जगत् में सत्य और परोपकार की शिक्षा देने के लिए अपने समय पर एक और ‘बुद्ध’ आएगा। यह पवित्र अन्तःकरणवाला होगा। उसका हृदय शुद्ध होगा। ज्ञान और बुद्धि से सम्पन्न तथा समस्त लोगों का नायक होगा। जिस प्रकार मैंने संसार को अनश्वर सत्य की शिक्षा प्रदान की, उसी प्रकार वह भी विश्व को सत्य की शिक्षा देगा। विश्व को वह ऐसा जीवन-मार्ग दिखाएगा जो शुद्ध तथा पूर्ण भी होगा। नन्दा! उसका नाम मैत्रेय होगा। (Gospel of Buddha, by Carus, P-217) बुद्ध का अर्थ ‘बुद्धि से युक्त’ होता है। बुद्ध मनुष्य ही होते हैं, देवता आदि नहीं। (It is only a human being tha can be a Buddha, a deity can not. 'Mohammad in the Buddist Scriputures P.1')&lt;br /&gt;मैत्रेय का अर्थ 'दया से युक्‍त' होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैत्रेय की मुहम्मद (सल्ल.) से समानता&lt;br /&gt;अंतिम बुद्ध मैत्रेय में बुद्ध की सभी विशेषताओं का पाया जाना स्वाभाविक है। बुद्ध की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं।&lt;br /&gt;1. वह ऐश्वर्यवान् एवं धनवान होता है।&lt;br /&gt;2. वह सन्तान से युक्त होता है।&lt;br /&gt;3. वह स्त्री और शासन से युक्त रहता है।&lt;br /&gt;4. वह अपनी पूर्ण आयु तक जीता है। (Warren,P. 79)&lt;br /&gt;5. वह अपना काम खुद करता है। ( The Dhammapada, S.B.E Vol. X.P.P. 67)&lt;br /&gt;6. बुद्ध केवल धर्म प्रचारक होते हैं। (The Tathgatas are only preaches, 'The Dhammapada S.B.E. Vol X. P.67)&lt;br /&gt;7. जिस समय बुद्ध एकान्त में रहता है, उस समय ईश्वर उसके साथियों के रूप में देवताओं और राक्षसों को भेजता है। (Saddharma-Pundrika, S.B.E. Vol XXI., P. 225)&lt;br /&gt;8. संसार में एक समय में केवल एक ही बुद्ध रहता है। (The life and teachings of Buddha, Anagarika Dhammapada P. 84)&lt;br /&gt;9. बुद्ध के अनुयायी पक्के अनुयायी होते हैं, जिन्हें कोई भी उनके मार्ग से विचलित नहीं कर सकता। (Dhammapada, S.B.E. Vol. X. P. 67)&lt;br /&gt;10. उसका कोई व्यक्ति गुरु न होगा। (Romantic History of Buddha, by Beal, P.241)&lt;br /&gt;11. प्रत्येक बुद्ध अपने पूर्णवर्ती बुद्ध का स्मरण कराता है और अपने अनुयायियों को ‘मार’ से बचने की चेतावनी देता है। (Dhammapada, S.B.E. Vol. X1, P. 64) मार का अर्थ बुराई और विनाश को फैलनेवाला होता है। इसे शैतान कहते हैं।&lt;br /&gt;12. सामान्य पुरुषों की अपेक्षा बुद्धों की गर्दन की हड्डी अत्यधिक दृढ़ हाती थी, जिससे वे गर्दन मोड़ते समय अपने पूरे शरीर को हाथी की तरह घुमा लेते थे।&lt;br /&gt;अंतिम बुद्ध मैत्रेय की इनके अलावा अन्य विशेषताएं भी हैं। मैत्रेय के दयावान होने और बोधि वृक्ष के नीचे सभा का आयोजन करनेवाला भी बताया गया है। इस वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति होती है।&lt;br /&gt;डा. वेद प्रकाश उपाध्याय ने यह सिद्ध किया है ये सभी विशेषताएँ मुहम्मद (सल्ल.) के जीवन में मिलती है। तथा अंतिम बुद्ध मैत्रेय हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ही हैं। डा. उपाध्याय द्वारा इस विषय में प्रस्तुत तथ्य यहाँ ज्यों के त्यों प्रस्तुत किए जा रहे हैं-&lt;br /&gt;‘कुरआन में मुहम्मद साहब के ऐश्वर्यवान और धनवान होने के विषय में यह ईश्वरीय वाणी है कि ‘तुम पहले निर्धन थे, हमने तुमको धनी बना दिया।’ मुहम्मद साहब ऋषि पद प्राप्त करने के बहुत पहले धनी हो गए थे। (‘व-व-ज-द-क-आ-इलन फ़अग्ना’) (और तुमको निर्धन पाया, बाद में तुमको धनी कर दिया) मुहम्मद साहब के पास अनेक घोड़े थे। उनकी सवारी के रूप में प्रसिद्ध ऊंटनी ‘अलकसवा’ थी, जिस पर सवार होकर मक्का से मदीना गए थे और बीस की संख्या में ऊंटनियां थीं, जिसका दूध मुहम्मद साहब और उनके बाल-बच्चों के पीने के लिए पर्याप्त था, साथ ही साथ सभी अतिथियों के लिए भी पर्याप्त था। ऊंटनियों का दूध ही मुहम्मद साहब व उनके बाल-बच्चों का प्रमुख आहार था। मुहम्मद साहब के पास सात बकरियां थीं, तो दूध का साधन थीं। मुहम्मद साहब दूध की प्राप्ति के लिए भैंसे नहीं रखते थे, इसका कारण यह है कि अरब में भैंसे नहीं होती। (Life of Mohomet-Sir William Muir 'Cambridge, Edition P. 545-54) उनकी सात बाग़ें खजूर की थीं जो बाद में धार्मिक कार्यों के लिए मुहम्मद साहब द्वारा दे दी गई थीं।&lt;br /&gt;मुहम्मद साहब के पास के पास तीन भूमिगत सम्पत्तियां थीं, जो कई बीघे के क्षेत्रा में थीं। मुहम्मद साहब के अधिकार में कई कुएं भी थे। इतना स्मरणीय है कि अरब में कुआँ का होना बहुत बड़ी सम्पत्ति समझी जाती थी, क्योंकि वहां रेगिस्तानी भू-भाग है। मुहम्मद साहब की 12 पत्नियां, चार लड़कियां और तीन लड़के थे। बुद्ध के अंतर्गत पत्नी और संतान का होना द्वितीय गुण है। मुहम्मद साहब के पूर्ववर्ती भारतीय बुद्धों में यह गुण नाम मात्र को पाया जाता था, परन्तु मुहम्मद साहब के पास उसका 12 गुना गुण विद्यमान था। (Life of Mahomet-Sir William Muir (Cambridge Edition) P. 547)&lt;br /&gt;मुहम्मद साहब ने शासन भी किया। अपने जीवनकाल में ही उन्होंने बड़े-बड़े राजाओं को पराजित करे उनपर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। अरब के सम्राट होने पर भी उनका भोज्य पदार्थ पूर्ववत् था। (The fare of the desert seemed most congenial to hi, even when he was sovereign of Arabia.)&lt;br /&gt;मुहम्मद साहब अपनी पूर्ण आयु तक जीवित रहे। अल्पायु में उनका देहावसान न
